फ़ैन रिव्यू: दो-दो शाहरुख़ कितने असरदार?

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फ़िल्मः फ़ैन

निर्देशकः मनीष शर्मा

अभिनेताः शाहरुख़ खान

रेटिंगः ***

क्या आपने शाहरुख़ खान की कोई ऐसी फ़िल्म देखी है जिसमें कोई गाना न हो? एक फ़िल्म की याद हम दिलाते हैं, वो थी 1989 में आई 'इन विच एनी गिव्स इट दोज़ वन', जिसके बारे में कम ही लोगों ने सुना है.

तो शाहरुख़ और यशराज की इस फ़िल्म के बारे में सबसे पहली चीज़ यही ध्यान में आती है कि इसमें कोई गाना नहीं है (जबरा फ़ैन, प्रमोशनल गाना है जो फ़िल्म के आख़िर में ही आता है) और ये पूरी तरह शाहरुख़ के कंधों पर टिकी फ़िल्म है.

वैसे फ़िल्म 'फ़ैन' में दो शाहरुख ख़ान हैं. एक तो फ़िल्म स्टार के किरदार में और दूसरा उनका सबसे बड़ा भक्त.

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शाहरुख़ खान इससे पहले दो फ़िल्मों में सुपर स्टार का किरदार निभा चुके हैं. एक 'ओम शांति ओम' जिसके निर्माता खुद शाहरुख़ थे , दूसरी 'बिल्लू बारबर' जो दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत की 'कुसेलन' की रीमेक थी.

शाहरुख़ पर आधारित दो डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में आ चुकी हैं, 'इनर एन्ड आउटर वर्ल्ड ऑफ़ शाहरुख़ खान' के दो भागों के अलावा डिस्कवरी चैनल के लिए डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'शाहरुख़ खान रिवील्ड' में उनके निजी जीवन को बहुत करीब से दिखाया गया था.

इसके अलावा शाहरुख़ ने 'लक बाय चांस' और अन्य फ़िल्मों में कैमियो किए हैं.

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फ़िल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' और 'दिलवाले' जैसी उनकी हालिया फ़िल्मों के बाद कहा जा रहा है कि शाहरुख़ एक से रोल कर रहे हैं.

अगर आप शाहरुख के बहुत बड़े फ़ैन नहीं हैं तो आपको फ़िल्म 'फ़ैन' देखने से पहले दो-दो शाहरुख़ खान वाली ये फ़िल्म देखने पर बोर होने का डर सता सकता है. लेकिन ये डर बेबुनियाद साबित हो जाता है.

फ़िल्म में कहीं कहीं उनके आत्म मुग्ध होने की झलक ज़रूर दिखती है लेकिन ज़्यादातर वक्त के लिए फ़िल्म आपको बांधे रखेगी और अंत में अपनी गहरी छाप छोड़ जाती है.

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अपने फ़ैन के किरदार में शाहरुख़ ने ज़बरदस्त काम किया है. फ़िल्म 'चक दे इंडिया' के बाद उनका ये बेहतरीन रोल है.

फ़िल्म में शाहरुख़ का फ़ैन गौरव चंदना दिल्ली में मध्यवर्गीय कॉलोनी इंदिरा विहार में रहता है. वह अपनी पूरी ज़िंदगी अपने पसंदीदा फ़िल्म स्टार के इर्दगिर्द बुन लेता है.

वो आस-पास के इलाके में फ़िल्म स्टार्स के हमशक्लों की प्रतियोगिताएं जीतता है और स्थानीय बाज़ार में साइबर कैफ़े चलाता है.

उसकी पहली छवि फ़िल्म स्टार के लिए दीवाने एक लड़के की बनती है, लेकिन उसकी दीवानगी एक जुनून की हद तक बढ़ जाती है.

एक बारगी फ़िल्म को देखकर यश चोपड़ा की वो फ़िल्म याद आ जाती है जिसने शाहरुख को बॉलीवुड में ऊंचा मुकाम दिलवाया था, ये फ़िल्म थी 'डर'.

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ये सवाल भी मेरे मन में आया कि क्या 'फ़ैन' 'डर' के यश चोपड़ा को श्रद्धांजलि है?

किसी भी मर्द या औरत से प्यार और उसके लिए जुनून के बीच एक बारीक लकीर होती है. लेकिन कई बार ये लकीर धुंधली हो जाती है.

फ़िल्म स्टार के लिए फ़ैन का प्यार और जुनून भी इसी तरह का हो सकता है. फ़ैन्स का जुनून, सेलेब्रिटी होने का ख़तरा है.

फ़िल्म स्टार बनने की चाह में हर दिन बॉलीवुड का दरवाज़ा खटखटाने वाले अभिनेताओं के हमशक्लों के साथ भी ऐसे कई किस्से जुड़े होते हैं.

फ़िल्म 'फ़ैन' में गौरव फ़िल्म स्टार आर्यन के हमशक्ल हैं और कभी-कभी लोग उन्हें आर्यन समझ लेते हैं.

फ़िल्म शाहरुख़ को 25 साल के गौरव का रूप देना सबसे बड़ी चुनौती थी.

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शाहरुख़ को गौरव का रूप देने के लिए हॉलीवुड फ़िल्म 'मिसेज डाउटफ़ायर' और 'द क्यूरियस केस ऑफ़ बेन्जामिन बटन' में कमाल दिखा चुके मेक-अप आर्टिस्ट बुलाए गए थे. शाहरुख का मेक-अप अच्छा है और अपने मकसद में काफ़ी हद तक कामयाब है लेकिन पर्दे पर उम्र घटाकर दिखाना आसान नहीं होता.

और मेक-अप में जो खामियां रह गई हैं वो शाहरुख़ ने अपने अभिनय से पूरी की हैं.

गौरव के जुनून का आलम ये होता है कि वो अपने पसंदीदा हीरो के जीवन के सफ़र की हुबहू नकल करना चाहता है.

वो अपने हीरो की तरह दिल्ली से मुंबई बिना टिकट सफ़र करता है (जबकि वो टिकट खरीदने के काबिल होता है), उसी होटल में ठहरता है जिसमें कभी उसका हीरो ठहरा था, उन शहरों में जाता है जहां उसका हीरो जाता है.

उसने आर्यन की हर फ़िल्म कई बार देखी है. उसका जुनून इस हद तक बढ़ जाता है कि वो ये मानने लगता है कि हीरो को उसकी सारी जानकारी है.

मैं इस फ़िल्म को देखकर ये कहना चाहूंगा कि दक्षिण भारत में फ़िल्म 'फ़ैन' का रीमेक ज़रूर बनाया जाना चाहिए.

बड़े पर्दे और विशाल पोस्टरों पर फ़िल्म स्टार की तस्वीरों की चकाकौंध से अंधे भक्तों के मन में कई बार ऐसा सामूहिक प्यार उमड़ता है कि फ़ैन ग्रुप्स बनाते हैं.

ये फ़ैन ग्रुप अपने हीरो के काल्पनिक आलोचकों या प्रतियोगियों पर निशाना साधते हैं. ये ट्रेंड आजकल सोशल मीडिया पर भी देखने को मिलता है और असल ज़िन्दगी में भी. फ़िल्म 'फ़ैन' में गौरव भी ऐसा ही कुछ करता है.

वो उस हद तक पहुंच जाता है जहां से वो ठोकर खाकर गिर सकता है. लेकिन फ़िल्म देखते हुए उस पर बहुत ज़्यादा तरस भी नहीं आता.

फ़िल्म में फ़ैन का ये किरदार हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि फ़ैन्स की दीवानगी की क्या हद हो सकती है.

फ़ैन पर आधारित इस फ़िल्म की ज़रूरत तो थी ही क्योंकि कभी-कभी प्रशंसक के बारे में जब तक जानकारी हो पाती है तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है.

मैं तो सलमान भाई के फ़ैन्स को ये फ़िल्म देखने की सलाह देता हूं.

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