मुंह के बल गिरीं सीक्वल फ़िल्मेंं

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इस साल रिलीज़ हुई फ्रेंचाइजी फ़िल्में टिकट खिड़की पर कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पाईं.

साल 2016 में आधा दर्जन सीक्वेल फ़िल्में रिलीज हुईं, जिन्हें भारी नुक़सान उठाना पड़ा.

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‘क्या कूल हैं हम 3’, ‘तेरा सुरूर’, 'जय गंगाजल', ‘घायल वंस अगेन’, 'तेरे बिन लादेन डेड ऑर अलाइव' और '1920 लंदन' सरीखी फ्रेंचाइजी फ़िल्में रिलीज़ तो हुईं, लेकिन इनका बॉक्स अॉफ़िस कलेक्शन निराशाजनक रहा.

जाने-माने फ़िल्म विश्लेषक और लेखक जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, "इस साल रिलीज़ हुई इन तमाम फ़िल्मों का बॉक्स ऑफिस पर बुरा हाल रहा."

वे बताते हैं कि फ़िल्म 'क्या कूल हैं हम' और 'घायल वंस अगेन' ने बेशक अपनी लागत निकाल ली थी, लेकिन कमाई के मामले में कोई मापदंड नहीं स्थापित कर पाई.

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चौकसे बताते हैं, "इन फ़िल्मों के वितरकों को काफ़ी नुकसान हुआ है.'' वे हिमेश रेशमिया की 'तेरा सुरूर' को भी बेहद ख़राब फ़िल्म मानते हैं.

निर्देशक प्रकाश झा की 'जय गंगाजल' के बारे में वे कहते हैं, ''प्रकाश अपने फ़ार्मूले में क़ैद हो गए हैं. वे फ़िल्म में समस्या तो उठाते हैं, लेकिन उसका निदान नहीं दिखाते.''

वे आगे कहते हैं कि झा की पहली फ़िल्म 'गंगाजल' मजबूत पटकथा औऱ बोल्ड थी, लेकिन इस बार पूरा काम सतही तौर पर हुआ था.

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सनी देओल की 'घायल वंस अगेन' लागत निकालने में कामयाब तो रही, लेकिन सफ़लता का परचम नहीं फहरा सकी.

चौकसे इसकी वजह छोटे शहरों में देओल परिवार की प्रसिद्धि को बताते हैं.

'तेरे बिन लादेन' के पहले भाग में पूरी तरह नवीनता के चलते फ़िल्म काफ़ी पसंद की गई, लेकिन असल ज़िंदगी में लादेन की मौत के बाद दूसरे भाग का बनना बेतुका था.

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यह फ़िल्म पूरी तरह घाटे का सौदा साबित हुई थी. विक्रम भट्ट की '1920 लंदन' में भी घाटा हुआ. इसके बावजूद फ़िल्म का अगला सीक्वेल बनाने की बातें चल रही हैं.

आखिर असफ़ल होने के बाद भी निर्माता सीक्वेल क्यों बना रहे हैं?

इसते जवाब में चौकसे कहते हैं, ''निर्माता-निर्देशकों की कल्पना शक्ति उनका साथ नहीं दे रही है. तभी तो वो सफलतापूर्वक बिके ब्रांड की क़ीमत के सहारे आगे बढ़ना चाह रहें हैं.''

वे आगे कहते हैं कि निर्माता-निर्देशकों के पास मौलिक कहानियां नहीं है. अब देखते हैं कि पुरानी कहानी को रबर की तरह खींचने का काम कब तक चलेगा?

फ़िल्मकारों को सलाह देते हुए वे कहते हैं कि कोई भी सीक्वेल ओरिजिनल फ़िल्म के मुक़ाबले कम से कम डेढ़ गुना अच्छा और रोचक होना चाहिए.

फ़िल्म समीक्षक और लेखक रवि बुले बताते हैं,''इन फ़िल्मों की वजह से साल 2016 में अब तक डिस्ट्रीब्यूटर को भारी नुक़सान उठाना पड़ा है.''

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वे कहते हैं, "फ़िल्म का सारा खेल कहानियों का होता है और बिना अच्छी कहानी के फ़िल्मों की फ्रेंचाइजी पर काम ही नहीं होना चाहिए.''

आने वाले महीनों में भट्ट कैम्प की 'राज़ रिबूट', साजिद नाडियाडवाला की मल्टीस्टारर 'हाउसफुल 3', इंद्र कुमार की 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती', फ़िरोज़ नाडियाडवाला फ़िल्म्स की 'हेरा फेरी 3',

फरहान अख़्तर की 'रॉक ऑन 2', सुजॉय घोष की 'कहानी 2' और अनुभव सिन्हा की 'तुम बिन 2' रिलीज़ होंगी.

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