सरकार की उपेक्षा की शिकार 'पपेट्री कला'

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'ही ही लिज्जत पापड़' कहता वो पपेट और उस जैसे तमाम चरित्र गढ़ने वाले 'पाध्ये' परिवार का मानना है कि सरकार इस कला को लेकर उदासीन है.

पपेट्री कला में माहिर 'पाध्ये' परिवार की तीसरी पीढ़ी के सत्यजीत पाध्ये मानते हैं, "भारत में इस कला का भविष्य बेहद उज्जवल है, बशर्ते लोग इस कला को मन लगाकर सीखें और सरकार इस ओर ध्यान दे."

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सत्यजीत पाध्ये बताते हैं कि भारत के कई हिस्सों में इस कला को अलग-अलग रूप-रंग में दिखाया जाता है. इसके बावज़ूद इसमें पारंगत कलाकारों की कमी है.

वो कहते हैं, ''लोग शैाकिया तो सीखने आतें है, लेकिन बहुत कम लोग ही इसे बतौर पेशा अपनाते हैं.''

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सत्यजीत, सरकार की भूमिका को लेकर भी ख़ासे उदास दिखे.

बीबीसी से उन्होंने कहा, "सरकार को अन्य कलाओं की तरह इस कला को भी प्रोत्साहन देना चाहिए."

पेशे से चार्टेड अकाउंटेट सत्यजीत बताते हैं, "साल 1965 को मुंबई में मेरे दादा स्वर्गीय यशवंत पाध्ये ने इस कला को उस वक़्त शुरू किया था, जब भारत में इसे कोई जानता भी नहीं था.''

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वे बताते हैं, "दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इंग्लैंड से भारत आए एक कलाकार की इस कला को देखकर वो बहुत प्रभावित हुए."

इसके बाद उन्होंने मुखौटों के ज़रिए इस विदेशी कला को भारतीय रंग में रंगकर अपनी शैली तैयार की.

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सत्यजीत बताते हैं कि लोकप्रियता बढ़ने के बाद उनके दादा जी ने लंदन से और भी कई पुतले मंगवाएं, जिन्हें लोगों नें ख़ूब पसंद किया.

निर्जीव मुखौटों को एक ख़ास अंदाज में आवाज़ देकर सजीव बनाने की इस कला ने देश के लोगों का दिल ऐसा जीता कि फ़िल्मों और विज्ञापनों में भी इनका इस्तेमाल किया जाने लगा.

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सत्यजीत बताते हैं, "दादा जी के काम में हाथ बंटाते-बंटाते उनके इंजीनियर पिता रामदास पाध्ये ने इस कला को एक अलग मुक़ाम पर पहुंचाया और अब मेरी बारी है."

हिंदी और मराठी फ़िल्मों सहित 'लिज्जत पापड़', 'क्रैकजैक बिस्किट' और 'टाटा स्काई' जैसे कई विज्ञापनो में पाध्ये परिवार के पपेट ख़ासे चर्चित हुए.

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पपेट्री कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे इस परिवार की पुरुषों के आलावा महिलाएं भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.

सत्यजीत बताते हैं कि फ़िलहाल पूरा परिवार इस कला के 100 साल पूरा होने के ज़श्न की तैयारियों में जुटा है.

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पपेट्री कला के लिए देश-विदेश में तमाम सम्मान हासिल कर चुका पाध्ये परिवार बदलते समय को लेकर चिंतित है.

सत्यजीत कहते हैं, "मेरा प्रयास लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के साथ ऑफ़ बीट इस आर्ट को नया बनाने का है."

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वो कहते हैं कि भले ही बदलते दौर में गुड्डे-गुड़ियों की जगह बार्बी डॉल और आई पैड के अनगिनत गेम्स ने ले ली हो, लेकिन आज भी हाथ में एक मुखौटा पकड़ कर ख़ु़द की आवाज़ निकालने वाली इस कला का अपना आकर्षण है.

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