क्या हाउसफुल3 देखने जा रहे हैं..

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'हाउसफ़ुल3' साजिद ख़ान की फिल्म 'हाउसफ़ुल' का तीसरा सीक्वल है. इसका निर्देशन 'चुटकुला लेखक' साजिद और फरहाद ने किया है और इसके प्रोड्यूसर साजिद नाडियावाला हैं.

शुक्र है कि साजिद-वाजिद ने इसमें संगीत नहीं दिया है. अगर आपने हाउसफ़ुल 1 और 2 देखी हैं तो फिर हो सकता है कि आपको यह फिल्म देखने की ज़रूरत ना पड़े.

वाक़ई यह नया सिक्वल इन्हीं दोनों फिल्मों जैसा ही है. लगता है फिल्मकार ने जानबूझकर यह पैटर्न अपनाया है.

महिलाओं, काले, नेत्रहीन, अपाहिज़, शारीरिक और मानिसक रूप से विकलांग लोगों का मज़ाक बनाना इस फिल्म में भी जारी है.

ऐसा महसूस होगा कि हम एक धुंधली याद के साथ हाउसफ़ुल का पिछला सिक्वल ही देख रहे हैं और आगे क्या होने वाला इसका अंदाज़ा लगाते रहते हैं.

पिता बोमन ईरानी ब्रिटेन की एक हवेली में रहते हैं और अपनी तीन बेटियों (जैकलीन फर्नांडीस, नर्गिस फाकरी, लीसा हैडन) को तीन धूर्तों (अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख) से बचाने की कोशिश कर रहे हैं जो गूंगा, बहरा और लंगड़ा बनकर इन लड़कियों को अपने जाल में फंसाने में लगे हुए हैं.

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और इस चक्कर में जबरदस्ती कॉमेडी पैदा करने की कोशिश की जा रही है. भले ही आपको बुरा लग रहा हो लेकिन फिल्म में कहीं-कहीं पर आप हंसते भी हैं.

इसमें कोई शक़ नहीं है कि फिल्म के तीनों हीरो ने अच्छा काम किया है. कॉमेडी रोल में अक्षय की अब तक की यह सबसे बेहतरीन भूमिका रही है. हीरोइनों ने ही सहज अभिनय किया है.

फिल्म में कहीं-कहीं पर तो इतनी ऊब पैदा होती है कि आप अपने मोबाइल फोन को देखने पर भी मजबूर हो जाते हैं.

जैसे-जैसे हमारा मोबाइल स्मार्ट होता जा रहा है वैसे-वैसे लगता है कि हमारे अंदर हास्य का बोध ख़त्म होता जा रहा है.

मैं यहां नीचे फिल्म के कुछ डॉयलॉग दे रहा हूं जो फिल्म की हीरोइनों ने अंग्रेजी के वाक्यों को हिंदी में अनुवाद करते हुए कही हैं. शायद आपको कुछ हंसी आ जाए.

"नौकरी नीचे" : काम डाउन

"हम बच्चे नहीं कर रहे हैं." : नो किडींग

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"पाल पोस के बड़े हो जाओ" : ग्रो अप

"ठंडी वाली दवा खा लो": टेक ए चिल पील

"बाहर लटकते हैं.": लेट अस हैंग आउट

"काम वाली गई तो काम वाली गई ": लेट बीगोंस बी बींगोंस

"हम बहनों ने सांडों की आंख मार दी": हीट द बुल्स आई

"बंदूक के बच्चे": सन ऑफ गन

"एक बार घड़ी के ऊपर": वंस अपॉन ए टाइम

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बोमन ईरानी ने फिल्म की हीरोइनों को अपने कुछ इन डॉयलॉग से पछाड़ने की कोशिश की है.

"इंसान में अक्ल होनी चाहिए. सूरत तो गुजरात में भी है."

"संस्कार बड़े होने चाहिए. छोटा तो भीम भी है."

"हीरा क्यों? इंसान को इंसान होना चाहिए. कोहिनूर तो चावल भी होता है."

हां तो अब आप समझ सकते हैं कि मेरे कहने का क्या मतलब है. अब समय आ गया है कि मैं 'बंद ऊपर' या शट अप हो जाऊं.

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