सेल्फ़ी ने ले ली रोज़ी रोटी !

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

सेल्फ़ी कल्चर के आ जाने के बाद पर्यटन स्थलों पर फ़ोटो खींचने का काम करने वाले फ़ोटोग्राफ़रों की ज़िंदगी बेहद मुश्किल हो गई है, लेकिन शायद इस तरफ़ किसी का ध्यान नहीं जाता.

गले में कैमरा लटकाए, हाथ में कुछ लोगों की खुशनुमा तस्वीरें लिए, सिर पर एक ख़ास हैटनुमा टोपी लगाए इन फ़ोटोग्राफ़रों को आप दूर से पहचान सकते हैं.

मुंबई के जूहू बीच पर ऐसे 412 कैमरामैन हैं जो 10 रुपए से लेकर 30 रुपए प्रति फ़ोटो के हिसाब से आपकी तस्वीर का प्रिंट निकाल सकते हैं.

27 साल के मंसूर ने चार साल पहले बिहार में 'खेती मजदूरी' छोड़कर बेहतर ज़िंदगी की तलाश में मुंबई का रुख़ किया और यहां अपने साथियों से मिलने के बाद वो 'फ़ोटो की लाइन' में आ गए.

मंसूर बताते हैं, "हम यहां आए, कुछ दिन मजदूरी की फिर जूहू में एक सेठ के पास कैमरा का काम सीखा और कुछ समय बाद अपना कैमरा ख़रीद लिया."

साल 2012 में ग्राहकों से 10 से 20 रुपए प्रति फ़ोटो लेने वाले मंसूर ने बताया कि पहले किसी छुट्टी वाले दिन में कई सौ ग्राहक मिल जाते थे लेकिन आजकल पूरे दिन घूमने पर भी 10 या 20 लोग ही तस्वीर खिंचवाते हैं.

मंसूर ने बताया कि इस बीच प्रिंट की लागत भी बढ़ी है, ऐसे में वो 30 रुपए प्रति फ़ोटो चार्ज करते हैं, लेकिन इसमें से उन्हें 10 या 15 रुपए ही मिल पाते हैं.

मंसूर और देशभर में उनके जैसे इन 'पर्यटन स्थल फ़ोटोग्राफ़रों' की रोज़ी रोटी 'सेल्फ़ी' ने कब छीन ली, किसी को मालूम नहीं हुआ.

बिना पेंशन, मेडिकल और बीमा जैसी सुविधाओं के असंगठित तौर पर काम कर रहे है ये कैमरामैन 20 से 25 लोगों के छोटे छोटे समूहों में काम करते हैं.

इनकी कोई 'असोसिएशन' या 'पार्टी' नहीं है और इन फ़ोटोग्राफ़रों में अधिकांश वो लोग हैं जो या तो बिहार, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, बंगाल जैसे राज्यों से पलायन कर यहां आए हैं या फिर शहर के कुछ बेरोज़ग़ार युवा हैं जो कैमरा ख़रीद सकने में सक्षम हैं.

उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड से मुंबई आ गए 21 साल के निज़ाम बताते हैं, "मेरे बड़े भाई ने मुझे यह काम दिलाया, कैमरा भी उन्हीं का है और वो अब रिक्शा चलाते हैं."

वो बताते हैं, "भाई के समय पर काम अच्छा चलता था लेकिन सेल्फ़ी आ जाने के बाद से तो लोग हमें देखते ही मुंह फेर लेते हैं. ऊपर से अब यहां 400 से 500 लोग फ़ोटो का काम कर रहे हैं, ऐसे में कॉम्पिटिशन भी बढ़ गया है."

लेकिन सच्चाई यह भी है कि डिजिटल हो चुकी दुनिया में प्रिंटेड फ़ोटो बीते ज़माने की बात हो चुकी है और रही सही कसर निकाल देते हैं अच्छे कैमरा फ़ोन.

21 साल की प्रिया मुंबई से हैं और कहती हैं, "मेरे पास 21 मेगापिक्सल का फ़ोन है और इसमें इंटरनेट भी है, फ़ोटो लो और फ़ेसबुक पर डालो, प्रिंट कौन लेता है ?"

वहीं एक कैमरामैन से झगड़ रहे पंजाब से आए ग्रुप कैप्टन कुलदीप सिंह के पास इन कैमरामैन को लेकर शिकायत थी.

वो कहते हैं, "हमारी एक फ़ोटो की बात हुई थी लेकिन फिर ये (फ़ोटोग्राफ़र) कहने लगा कि ऐसे पोज़ बनाओ, ऐसे भी एक खिंचवा लो और अब तीन फ़ोटो के पैसे मांग रहा है."

यह शिकायत बिल्कुल जायज़ है और कई बार ऐसे झगड़े पास ही बने जूहू चौपाटी पुलिस चौकी तक भी पहुंचते हैं.

नाम न बताने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, "हमें मालूम है कि कई बार यह कैमरामैन अपने ग्राहकों को ज़्यादा फ़ोटो खींचने के लिए ज़ोर देते हैं और इस बात पर विवाद भी होते हैं लेकिन 40 डिग्री तापमान में दिनभर घूमने के बाद जब एक ग्राहक मिलता है तो यह लोग उससे थोड़ा पैसा बनाने की कोशिश करते हैं."

वो बताते हैं, "हम ऐसे मामलों से वाक़िफ़ हैं और यह क़ानूनी मामले से ज़्यादा आपसी समझ के मामले होते हैं और हम पर्यटक की शिकायत को तवज्जो देते हैं, कई बार शिकायत होने पर कुछ दिनों के लिए कैमरा ज़ब्त भी करते हैं ताकि दोबारा ऐसा न हो."

पुलिस अधिकारी पूरे आश्वासन के साथ कहते हैं कि इन फ़ोटोग्राफ़रों को लेकर अभी तक कोई आपराधिक मामला सामने नहीं आया है क्योंकि यह आसपास के फ़ोटोशॉप से जुड़े होते हैं और ऐसी किसी गतिविधि में फंसने से दुकानदार का लाइसेंस भी जा सकता है.

लेकिन इस सबसे 'सेल्फ़ी' के आगे हारते मंसूर और निज़ाम जैसे फ़ोटोग्राफ़रों की समस्या कम नहीं हो जाती.

मंसूर कहते हैं, "मैं मुंबई का वोटर हूं लेकिन मेरे काम के लिए कोई नेता बात नहीं करता, कई दिन ऐसे भी बीते हैं जब एक भी फ़ोटो नहीं खींच पाए और पैदल घर गए ताकि पैसे बचें."

मंसूर तीन बच्चों के पिता हैं और कहते हैं, "मेरा महीने का खर्चा 9000 रुपए प्रतिमाह है लेकिन मुझे नहीं पता कि हर महीने मेरी आमदनी कितनी होगी."

उनका कहना है, "हम दो जोड़ी कपड़े में रहते हैं और दुआ करते हैं कि बस परिवार में कोई बीमार न पड़े क्योंकि यकीन मानिए दवा का पैसा नहीं है हमारे पास."

मंसूर और उनके साथियों को सेल्फ़ी से शिकायत नहीं है लेकिन वो चाहते हैं कि सरकार उनके लिए भी कुछ करे, "मोबाईल से कोई शिकायत नहीं है सर, वो तो लोगो की अपनी मर्जी है लेकिन हम चाहते हैं कि हमारे लिए भी एक स्टैंड बनाया जाए जहां से सिर्फ़ फ़ोटोग्राफ़र ही फ़ोटो खींच सके."

जाते जाते मंसूर पूछते हैं कि इस इंटरव्यू से उनके ऊपर कोई कार्रवाई तो नहीं होगी, "मेरी बच्ची का अभी एडमिशन हुआ है सर, देखिएगा हमारा काम नहीं जाए, अभी कुछ दूसरा काम भी नहीं है."

मंसूर फिर वापस अपने नियमित चक्कर पर 'फ़ोटो, फ़ोटो' कहते निकल जाते हैं और मेरे आसपास खड़े कई लोग सेल्फ़ी लेने में मशगूल रहते हैं, इस बात से अंजान की मंसूर का आज ये 35वां चक्कर है और उसकी बेटी के स्कूल का पहला दिन.

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