कोरियाई फ़िल्म की रीमेक 'तीन' को कितने स्टार?

इमेज कॉपीरइट Universal PR

फिल्म:तीन

निर्माता: सुजॉय घोष

निर्देशक: रिभु दासगुप्ता

कलाकार: अमिताभ बच्चन, विद्या बालन, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सब्यासाची चक्रवर्ती

रेटिंगः ***

इस फ़िल्म में थके हारे, धूल में लथपथ, तोंद लिए, लुटे पिटे दिखते अभिताभ बच्चन, काफी कुछ उस 'कलकत्ता' से लगते हैं जैसा कि इस शहर का चरित्र इस फिल्म में दिखाया गया है.

अंग्रेजों की राजधानी रहे इस शहर की गलियों, गोदामों, चर्च, इमामबाड़ा और पुराने दफ़्तरों की सैर करते हुए इस फ़िल्म में कैमरा आपको दहला देने वाले पुराने और सुनसान इलाकों में ले जाता है.

दृश्यों का यह तानाबाना बेहद बारीक तरीके बुना गया है.

इन्हें देखते हुए बाखूबी समझ में आ जाता है कि यह काम कोई जानकार ही कर सकता है.

इस फ़िल्म के निर्देशक रिभु दासगुप्ता हैं. सुजॉय घोष इसके निर्माता हैं.

कलकत्ता की पृष्ठभूमि वाली इस सस्पेंस थ्रिलर में अभिताभ के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी और विद्या बालन अहम किरदारों में हैं.

सुजॉय के कारण इस फ़िल्म को कहानी (2012) से जोड़कर भी देखा जाएगा. पर क्या इसे वाकई सस्पेंस थ्रिलर कहा जा सकता है. शायद नहीं.

लेकिन अपनी सुस्त गति के बावजूद यह फिल्म हमें बांधे रखती है.

फिल्म में अभिताभ उम्रदराज मध्यवर्गीय आदमी हैं, जिसकी नातिन का आठ वर्ष पहले अपहरण हुआ था.

इमेज कॉपीरइट Universal

तबसे वो शख्स इस रहस्यमय केस को सुलझाने के चक्कर में भाग दौड़ कर रहा है.

यह केस पुलिस अफ़सर (नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी) के जिम्मे था. यह अफ़सर अब पुलिस की नौकरी छोड़ चर्च में पादरी बन गया है.

इसी बीच एक बच्चे का अपहरण उसी तरीके से होता है जैसे अमिताभ की नातिन का हुआ था.

इस बार अपहरण की तहकीक़ात सलवार कमीज़ पहनी विद्या बालन कर रही हैं.

यह फ़िल्म दर्शकों को सीट से जकड़ने में कामयाब रही है, लेकिन कहीं कहीं इसकी पकड़ कमजोर भी हुई है.

लेकिन अमिताभ बच्चन के कारण यह फ़िल्म दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखती है.

बच्चन का अभिनय हमें 70 के दशक से ज़्यादा अब चौंकाता है.

इस बार बूढ़े कूबड़े जॉन के क़िरदार में वह हमें अपनी तरफ खींच लेते हैं.

इमेज कॉपीरइट Universal PR

खटारा स्कूटर पर धीमी रफ्तार चक्कर काटता जॉन और उसका शहर हमें पकड़े रहता है.

'तीन' 2013 में आई कोरियन फिल्म 'मोंताज' का रिमेक है. कोरियाई फ़िल्मों की तरह, इस फ़िल्म में भी रिश्तों की गहराई का अभाव महसूस होता है.

वर्ष 2000 की शुरुआत में दक्षिण कोरियाई सरकार ने फ़िल्मों में जबसे भारी निवेश करना शुरू किया तब से बॉलीवुड में कोरियाई फ़िल्मों को लाने प्रचलन बढ़ा है.

हॉल फिलहाल रिलीज़ हुई फ़िल्म 'दो लफ़्जों की कहानी' भी कोरियाई फ़िल्म 'आॅलवेज़' का रिमेक है. इसे कन्नड़ में 'बॉक्सर' के नाम से रिलीज़ किया जा चुका है.

क्योंकि हर फ़िल्म और रिव्यू को अंतत: स्टार रेटिंग की गिरफ़्त में फंसना होता है सो, मेरी तरफ़ से तीन को मिलते हैं तीन स्टार.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार