टीवी को 'सेंसर' कौन करता है?

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सेंसर बोर्ड द्वारा फ़िल्म ‘उड़ता पंजाब’ में 89 कट्स लगाए जाने की मांग के बाद 'फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड' की भूमिका और विचारों की स्वतंत्रता पर बहस को फिर से हवा मिली है.

जहां कुछ लोग फ़िल्म में क्रिएटिव फ़्रीडम के नाम पर कुछ भी दिखाये जाने पर आपत्ति कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग 'सेंसर' का काम दर्शकों के विवेक पर छोड़ देना चाहते हैं.

'सेंसर' के विवाद में फ़ंसी फ़िल्मों की सूची लंबी है, जहां शाहरूख़ ख़ान को अपनी फ़िल्म 'बिल्लू बार्बर' में से 'बार्बर' शब्द हटाना पड़ा था, वहीं दीपा मेहता तो अपनी फ़िल्म 'वाटर' को रिलीज़ ही नहीं कर पा रही थीं.

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'परज़ानिया', 'ब्लैक फ़्राईडे', 'पांच' जैसी कितनी ही फ़िल्में इस सूची में गिनाई जा सकती हैं, जिन्हें 'सेंसर बोर्ड' ने रोका और 'मोहल्ला अस्सी' के तो ट्रेलर के लीक हो जाने पर ही इस फ़िल्म पर रोक लगाने की मांग शुरू हो गई.

लेकिन ऐसा लगता है कि 'सेंसर' करने के मामले में हम सिनेमा के प्रति थोड़े पक्षपाती हैं क्योंकि सिनेमा भले ही बड़ा माध्यम है, पर इसकी पहुंच सीमित है.

वहीं घर-घर में दख़ल रखने वाले टीवी पर आ रहे कंटेंट को लेकर नाराज़गी कम ही देखी जाती है और निर्माता-निर्देशक यहां क्रिएटिव फ़्रीडम की आज़ादी ले जाते हैं.

करीब 3 साल तक बच्चों के चैनलों पर दिखाए गए जापानी कार्टून 'शिन चेन' के कंटेंट में हमेशा से सेक्स की ओर ईशारा रहा है और कई बार एक बच्चे के तौर पर शिन चेन अपनी महिला मित्रों, शिक्षिकाओं से कई आपत्तिजनक बातें कह जाता है.

टीएलसी पर देर रात आने वाले धारावाहिक 'गेट आउट' में कई बार नग्नता दिखाई जाती है या फिर इस और ईशारा होता है.

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फ़िल्मों में किसी राज्य या किसी समाज विशेष के लोगों का नाम आ जाने पर विरोधी हो जाने वाले संगठन धारावाहिक 'बेगुसराय' में एक तथाकथित ठाकुर परिवार की इलाक़े में दंबंगई पर कुछ नहीं कहते.

वहीं 'चिड़ियाघर' जैसे धारावाहिक में एक स्टेशन मास्टर को घोड़े से मिलाए जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं उठाई जाती.

'अग्निपथ' जैसी फिल्में और ज़ी टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक 'लाजवंती' लिख चुकी लेखिका इला दत्ता बेदी कहती हैं, "लाजवंती पर ब्रेक लगने का कारण हिंदु-मुस्लिम प्रेम कथा थी और हमने भी वही लिखा था वही दिखाया था जो बीत चुकी बात है, लेकिन फिर भी लोगों के विरोध को देखते हुए सीरियल लाजवंती पर ब्रेक लगा दिया गया."

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टीवी को वो सेंसर से दूर रखने की सिफ़ारिश करते हुए कहती हैं, "हम पहले से ही कई सारी गाईड लाईन का पालन करते हैं, जिस वजह से भी हमें कठनाईयां भी होती हैं. इसलिए टीवी का सेंसर नहीं होना चाहिए.”

टीवी के लिए मानक के तौर पर इस्तेमाल होने वाली इन गाईडलाईन्स के बारे में टीवी निर्माता निर्देशक (न बोले तुम न मैने कुछ कहा) सुधीर शर्मा कहते हैं, "हम रेप, शराब, महिलाओं के साथ मारपीट नहीं दिखा सकते. गाड़ी चलाते समय बेल्ट पहनना, हेल्मेट पहने दिखाया जाना ज़रूरी है."

लेकिन यह भी सही है कि इन गाईडलाईन्स का कई बार पालन नहीं होता, बेगूसराय धारावाहिक में श्वेता तिवारी को न सिर्फ़ मार खाते बल्कि उनका सार्वजनिक 'चीर हरण' यानी कपड़े उतारते दिखाया गया.

धारावाहिकों में भूत-प्रेत और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले पौराणिक धारावाहिक, ससुराल सिमर का, नागिन और अब कवच जैसे धारावाहिक जबरस्त टीआरपी बटोर रहे हैं, बिना किसी गाईडलाईन की चिंता किए.

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टीवी निर्माता हेमल ठक्कर इस बात पर सफ़ाई देते हैं, "छोटे पर्दे का कंटेंट बहुत सीमित हो गया है और छोटे पर्दे पर सास-बहू, भूत-प्रेत लोगों को पसंद आ रहा है, हालांकि दर्शकों को कॉमेडी भी दिखानी चाहिए, लेकिन छोटे पर्दे के लिए सेंसर नही होना चाहिए."

हालांकि, टीवी निर्माताओं का पक्ष रखते हुए निर्माता सुधीर शर्मा कहते हैं, "हम वही दिखाते हैं जो दर्शक पसंद करते हैं और अगर किसी धारावाहिक के कंटेंट को लेकर कोई आपत्ति है तो दर्शक आईबीएफ़ (इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फ़ांउनडेशन) को कम्पलेन कर सकते हैं. ऐसी शिकायतें आती भी हैं, जिसका हल निकाल लिया जाता है, इसके लिए सेंसर की आवश्कता नहीं है और अक्सर टेलीविज़न गाईड लाईन का पालन करता है."

हैरानी की बात है कि जहां फ़िल्मों पर सर्टिफ़िकेशन बोर्ड रोक तक लगा देता है, वहीं टीवी पर दिखाए जाने वाले सीन और डायलॉग पर जांच पड़ताल करने वाला कोई नही है.

टीवी निर्माता पहले से दिए गए गाईडलाईंस के तहत अपनी स्क्रिप्ट पर स्व: नियंत्रण रखते हैं

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इस मसले पर वरिष्ठ टीवी पत्रकार श्राबंती चक्रवर्ती कहती हैं, "भारतीय दर्शक सास-बहू, भूत-प्रेत, नागिन जैसे धारावाहिक ही पसंद करते हैं, इसलिए सेंसर की आवश्यकता नही है. छोटे पर्दे को थोड़ी आज़ादी मिलनी चाहिए.''

टीवी के सेंसर में एक समस्या यह भी है कि टीवी के धारावाहिक दिनों के हिसाब से बनते हैं और कई बार स्क्रिप्ट शूट से कुछ घंटो पहले ही बनती है ऐसे में 'सेंसर अप्रूवल' आ जाने पर भारी मुश्किल खड़ी हो सकती है.

इसी समस्या से उबरने के लिए कुछ पहले से निर्धारित गाईडलाईन्स टीवी धारावाहिक निर्माताओं को दी जा चुकी हैं और उनसे आशा की जाती है कि वो इनका पालन करेंगे.

लेकिन पालन हो रहा है या नहीं इसका चेक अभी सिर्फ़ दर्शक ही कर रहे हैं और टीवी 'सेंसर फ़्री' घूम रहा है.

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