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शनिवार, 31 जुलाई, 2004 को 08:15 GMT तक के समाचार
 
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प्रेमचंद की 'रंगभूमि' को लेकर विवाद
 

 
 
रंगभूमि
रंगभूमि को पाठ्यक्रम से हटाने की मांग की जा रही है
प्रेमचंद का उपन्यास 'रंगभूमि' रचना के 80 साल बाद विवादों में है.

भारतीय दलित साहित्य अकादमी इस उपन्यास में जाति विशेष के लिए उपयोग किए गए कुछ शब्दों के खिलाफ है. संगठन ने प्रेमचंद के जन्मदिवस 31 जुलाई पर इस रचना की लगभग दो दर्जन प्रतियाँ दिल्ली के जंतर-मंतर पर जलाईं.

दिल्ली सरकार ने रंगभूमि को इस साल बारहवीं के पाठ्यक्रम में जोड़ा है.

इसका विरोध कर रहे इस अकादमी के अध्यक्ष सोहनलाल सुमनाक्षर का कहना है कि इससे स्कूल जाने वाले बच्चों में ऊँच-नीच की भावना आ सकती है, उनकी माँग है कि ऐसे उपन्यासों को पाठ्यक्रम से तुरंत हटाना चाहिए.

संगठन ने इसे पाठ्यक्रम से बाहर करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की है.

सोहनलाल सुमनाक्षर का तर्क है, "जो ऊँचे वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं वो जिस जाति का नाम इसमें है वो चिढ़ाएँगे, व्यंग कसेंगे और इससे जो हमारे दलित समाज के बच्चे हैं उनमें हीनता आएगी. जो साहित्य समाज में विषमता पैदा करे, वो कोई साहित्य नहीं होता वो रचना साहित्य नहीं कहलाया जा सकता."

सोहनलाल सुमनाक्षर
सुमनाक्षर का कहना है कि जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करने वाले सभी लेखकों का बहिष्कार होना चाहिए

सोहनलाल सुमनाक्षर का कहना है, "ऐसा साहित्य चाहे कही भी हो, प्रेमचंद का ही नहीं जितने भी लेखक हैं, हिंदी के या अन्य भारतीय भाषाओं के, उन सबका बहिष्कार होना चाहिए."

दो दशक पहले भारत सरकार ने क़ानून बनाकर जाति सूचक शब्दों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है. लेकिन जिस ज़माने में प्रेमचंद ने रंगभूमि की रचना की थी उस समय जाति को लेकर समाज की संवेदनशीलता दूसरे तरह की थी.

वैसे तो कुछ साहित्यकार अभी भी अपनी रचनाओं में अभी भी जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं.

विरोध

कई साहित्यकार इस तरह के प्रेमचंद को विवादों में घसीटने की कोशिश को गलत मानते हैं. उनका मानना है कि प्रेमचंद ने दबे कुचले वर्ग को अपने साहित्य में जगह दी है.

 प्रेमचंद की जो समग्र दृष्टि है वो तो दलितों, शोषितों और वंचितों के पक्ष की दृष्टि है उस दृष्टि को आप अनदेखा करके और कहीं-कहीं उन्होंने किसी शब्द का इस्तेमाल कर दिया है उस पर आपत्ति करें तो बात मुझे समझ में नहीं आती
 
अशोक वाजपेयी

अशोक वाजपेयी कहते हैं, "प्रेमचंद का तो कुछ बिगड़ता नहीं आप प्रेमचंद के उपन्यासों की प्रतियाँ जला दीजिए. उस पर थूक दीजिए उस पर प्रहार कीजिए. प्रेमचंद को अगर आप उसकी समग्रता में देखें तो जो मेरी समझ है और जो उनके लाखों पाठकों की समझ है कि प्रेमचंद किसी तरह की जातिवाद, धर्मोन्माद, किसी तरह की सांप्रदायिकता इत्यादि से मुक्त मानवधर्मी लेखक रहे हैं."

वे कहते हैं, "प्रेमचंद की जो समग्र दृष्टि है वो तो दलितों, शोषितों और वंचितों के पक्ष की दृष्टि है उस दृष्टि को आप अनदेखा करके और कहीं-कहीं उन्होंने किसी शब्द का इस्तेमाल कर दिया है उस पर आपत्ति करें तो बात मुझे समझ में नहीं आती."

कहा जाता है साहित्य समाज का आईना होता है, अगर प्रेमचंद ने अपने साहित्य में समाज को समेटा है लेकिन आज अगर समाज का चेहरा बदल चुका है तो क्या प्रेमचंद के साहित्य को ही बदल देना उचित होगा?

 
 
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