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शुक्रवार, 29 जुलाई, 2005 को 19:36 GMT तक के समाचार
 
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'प्रेमचंद दलित लेखन के विकल्प नहीं'
 
प्रेमचंद
दलित लेखक श्योराज सिंह बेचैन का कहना है कि प्रेमचंद ने दलित समाज के बारे में बहुत लिखा लेकिन क्योंकि वह ख़ुद दलित नहीं थे, इसलिए उन्होंने दलितों को ग़ैर-दलित की ही तरह देखा.

वे मानते हैं कि प्रेमचंद ने दलित समाज के साथ न्याय नहीं किया.

दिल्ली में सूफ़िया शानी ने श्योराज सिंह बेचैन से लंबी बात की. पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश...

प्रेमचंद ने दलित समाज को किस तरह देखा? इस बारे में आपकी क्या राय है?

जवाब : इसमें कोई शक नहीं है कि प्रेमचंद ने दलित समाज के बारे में बहुत लिखा लेकिन क्योंकि वह ख़ुद दलित नहीं थे, इसलिए उन्होंने दलितों को ग़ैर-दलित की ही तरह देखा. वैसे भी हर बाहरी आदमी चीज़ों को दूर से देखकर ही लिख पाता है, जिस पर बीत रही होती है,उसका सबसे प्रभावशाली वर्णन वही कर सकता. प्रेमचंद दलितों के बारे में, बाक़ी लोगों से अच्छा इसलिए लिख पाए कि वह ख़ुद कायस्थ थे और अन्य दलित जातियों की तरह कायस्थ भी ब्रम्हणों के विरुध्द लड़ रहे थे. यानी दलितों की तरह कायस्थ भी ब्रम्हणों के शोषण का शिकार हो रहे थे. लेकिन प्रेमचंद को दलित लेखकों का विकल्प नहीं माना जा सकता. प्रेमचंद के ज़माने में, लम्ही से ही स्वामी अच्युत्यानंद दलितों का अख़बार " आदि हिंदू " निकाल रहे थे. स्वामीजी डॉ.आम्बेडकर के काफ़ी नज़दीक थे. जब गांधी और आम्बेडकर का मामला आया तो प्रेमचंद गांधी के साथ खड़े थे. इसीलिए प्रेमचंद को सामंतों का मुंशी कहा गया है. उस ज़माने में सामंत दलित महिलाओं का शोषण करते थे और अपनी अवैध संतानों को दलितों की तरह पालते थे.

प्रेमचंद भी उसे दलित की तरह नहीं देख पाए. प्रेमचंद एक बड़े लेखक थे, बड़ी बात है कि उन्होंने ग़रीबों और किसानों के बारे में लिखा लेकिन वह दलितों के बारे में ज़्यादा जानते भी नहीं थे.

अपनी कहानी " कफ़न" में "घीसू और माधव" के बारे में लिखा है, लेकिन हिन्दी के विख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव ने लिखा कि अगर " धीसू और माधव" लिखते तो यह कहानी कुछ ओर होती. इसमें प्रामचंद की ग़लती नहीं है,चीज़ों को बाहर से और अन्दर से देखने का का फ़र्क़ तो हर जगह रहता ही है.

प्रेमचंद की रचनाओं के दलित समाज और हमारे समय के दलित समाज में आपको क्या फ़र्क़ लगता है?

जवाब : प्रेमचंद के साहित्य में जो दलित समाज की तस्वीर है, उसमें और आजके दलित समाज में बहुत बड़ा फ़र्क़ आ चुका है. उस ज़माने में दलितों पर लिखने वाले लेखकों की और ख़ुद दलित लेखकों की बड़ी कमी थी. तब दलितों में केवल स्वामी अच्युत्यानंद थे, आज "घीसू और माधव" ख़ुद लिखने लगे हैं. प्रेमचंद के बाद की पीढ़ी ने, ख़ासकर दलित लेखकों ने दलित साहित्य को न सिर्फ़ खड़ा किया बल्कि उसे विदेशो में फैलाया। दलितों के बारे में आज जो कुछ लिखा जा रहा है, उसे ख़ुद दलित लिख रहे है। इस तरह लेखन की पूरी संस्कृति में बदलाव आया है.

क्या आपको लगता है कि हिंदी समाज ने प्रेमचंद के साथ विश्वासघात किया?

जवाब : साहित्य और हिंदी समाज ने प्रेमचंद के साथ कोई विश्वासघात नहीं किया है. विश्वासघात तो दलितों के साथ किया गया है. प्रेमचंद पर रोज़ शोध हो रहे हैं. प्रेमचंद के नाम पर डॉक्ट्रेट की डिग्रियाँ ली जा रही हैं. प्रेमचंद को हर कोर्स में पढ़ाया जा रहा है. प्रेमचंद का साहित्य हर भाषा में अनुदित हो रहा है. लेकिन दलित साहित्य को कोर्स में जगह नहीं मिली. हिंदी वाले दरअसल दलितों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं.

दलित समाज प्रेमचंद को किस तरह देखता है?

जवाब: एक ज़माना था जब दलितों के हमदर्द के रूप में प्रेमचंद ही दिखाई देते थे. उन्होंने " कफ़न" जैसी कहानी लिखी और दलितों को हिंदी साहित्य में स्थान दिलवाया। क्योंकि उनसे पहले दलितों के बारे में कहीं कुछ नहीं था. लेकिन प्रेमचंद के पास दलित अनुभव नहीं था,इसलिए वह उनके साथ ज़्यादा न्याय नहीं कर पाए। और यही कारण है दलित समाज प्रेमचंद को नायक के रूप में नहीं देख पाया.

क्या आपको दलित साहित्य के सन्दर्भ में प्रेमचंद की परम्परा आगे बढ़ती दिखाई देती है?

जवाब: दलित साहित्य में प्रेमचंद की परम्परा नहीं चलनेवाली है. दलितों के बारे में प्रेमचंद का सत्य चिड़िया की आँख से देखा हुआ सत्य था. आज दलित अपने अनुभव से गुज़र कर लिख रहा है. दलितों को जो मज़बूती मिली है वह धर्मवीरजी और आम्बेडकरजी से मिली है. जब डॉ.आम्बेडकर ने दलितों के लिए मंदिरों के दरवाज़े खोलने की लड़ाई लड़ी तब भी प्रमचंद आम्बेडकर के साथ नहीं गॉधी के साथ खड़े थे. बाद में डॉ.आम्बेडकर ने कहा कि उनकी लड़ाई सिर्फ़ इतनी थी कि दलित भी भारतीय हिन्दू समाज का हिस्सा हैं इसलिए उन्हें भी मन्दिर जाने का हक़ होना चाहिए.

दलितों को पूजा-पाठ में लगाना उनका मक़सद नहीं है. उसके बाद डॉ.आम्बेडकर मंदिर आन्दोलन से हट गए लेकिन गॉधीजी मंदिर की बात करते रहे.

प्रेमचंद ने अपनी महिला पात्रों को किस नज़रिए से देखा? आपको क्या लगता है?

जवाब: प्रेमचंद के साहित्य में नायिकाएं ग़ैर-दलित महिलाएं ही हैं. उन्होंने किसी दलित महिला को नायिका नहीं बनाया. कहानी "कफ़न" की महिला पात्र के प्रति उसके पति और ससुर निष्ठुर क्यों है? हो सकता हो वह किसी सामंत की हवस का शिकार रही हो और वह नही चाहते कि वह जीवित रहे. धर्मवीर ने अपनी किताब में लिखा है कि हमारे संविधान में समानता की बात कही गई है. लेकिन संविधान को साहित्य में नहीं उतारा जा सकता. हमारा साहित्य संसद और अदालत दोनों से पीछे है. प्रेमचंद एक प्रगतिशील लेखक थे. उनका मानना था कि साहित्य को समाज की मशाल होना चाहिए, लेकिन यह तो सम्भव नहीं हो पाया.

क्या आपको लगता है कि प्रेमचंद दलितों के साथ न्याय नहीं कर पाए?

जवाब: प्रेमचंद को दलितों के साथ न्याय करने की ज़िम्मेदारी किसी ने सौंपी नहीं थी. लेकिन वह ख़ुद जज बन गए थे. लेकिन वह दलितों के साथ न्याय नहीं कर पाए। क्योंकि उन्होंने दलितों को अपने नज़रिए से देखा. वह दलितों के असली दुख-दर्द को ना जान पाए और ना ही समझ पाए क्योंकि उन्हें दलितों की भीतरी स्थितियों का ज्ञान नहीं था.

 
 
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