ख़ालिस्तान के 'ठेकेदार' और अलगाववाद का 'बल'

मीरी पीरी गुरुद्वारा
Image caption साउथॉल का मीरी-पीरी गुरुद्वारा जिसे ख़ालिस्तानी अलगाववादी चलाते हैं

इंग्लैंड के 'मिनी पंजाब' साउथऑल में छह या सात गुरुद्वारे हैं जिनमें सबसे खस्ताहाल है--ब्रॉडवे का 'मीरी-पीरी गुरुद्वारा'. इस गुरुद्वारे को देखकर ब्रिटेन में कभी मज़बूत रहे ख़ालिस्तानी आंदोलन की मौजूदा हालत का अंदाज़ा होता है.

'ठेकेदार पाजी' कहे जाने वाले 66 वर्षीय जसवंत सिंह इस गुरुद्वारे की प्रबंध समिति के अध्यक्ष हैं. वहीं उनका टूटा-फूटा-सा दफ़्तर है जहाँ स्टील के जग में लंगर से लाई गई चाय थर्मोकोल के गिलास में पीते हुए वे गुरुद्वारे और खालिस्तानी आंदोलन दोनों में जान फूँकने के मंसूबे बनाते हैं.

गुरुद्वारा किसी बैरक की तरह दिखता है जिसकी छत पर गुंबदनुमा पीतल लगाकर उसे कुछ गरिमा देने की कोशिश की गई है, अंदर दो हॉल हैं, एक में लोग मत्था टेकते हैं और दूसरे में लंगर छकते हैं. जब मैं वहाँ गया तो मत्था टेकने वाला कोई नहीं था और लंगर वाले कमरे में तीन लोग थे जो शायद सर्दी से बचने के लिए अंदर बैठे थे, 'ठेकेदार पाजी' को आते देखकर उन्होंने जल्दी-जल्दी आलू छीलना शुरू कर दिया.

'मीरी-पीरी' यानी राजकाज और धार्मिक नेतृत्व. खालिस्तानी चाहते हैं कि ये दोनों काम गुरुद्वारे ही करें. पूरे जोश के साथ 'राज करेगा खालसा' के नारे बुलंद करने वाले गिने-चुने लोग ही रह गए हैं, उन्हीं में से एक हैं जसवंत सिंह ठेकेदार.

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वे मानते हैं कि "पंजाब के लोगों की हिम्मत टूट गई है मगर जब उन्हें लगेगा कि अलग ख़ालिस्तान बन सकता है तो उनका रवैया रातो-रात बदल जाएगा".

वे मानते हैं कि ब्रिटेन में खालिस्तान की बात पुरज़ोर तरीक़े से करने वाले दो ही लोग बचे हैं-- वे और परमिंदर सिंह बल. मगर कई जानकार बताते हैं कि ये दोनों अपने उग्र रवैए की वजह से लंदन की खालिस्तानी बिरादरी में अकेले पड़ गए हैं.

ठेकेदार और उनके हमउम्र परमिंदर सिंह बल वीज़ा न दिए जाने के बारे में बीबीसी हिंदी से बात करने को राज़ी हो गए, कैमरे पर उनसे बातचीत उसी विषय पर सीमित रही, मगर उनके साथ चार घंटे बिताकर महसूस हुआ कि वैचारिक प्रतिबद्धता और कट्टरता के बीच की रेखा कितनी धुंधली है, कि अलगाववादी आम लोगों से अलग नहीं होते मगर अलग होने की लालसा रखते हैं.

विलायती बाग़ी

31 साल से लंदन में रहने के बावजूद टूटी-फूटी अँगरेज़ी बोलने वाले ठेकेदार हिंदी और पंजाबी में धड़ल्ले से भारत सरकार की नीतियों को कोसते हैं, वे भारत जाने का वीज़ा न मिलने की वजह से नाराज़ हैं और इसके लिए पंजाब में सत्ताधारी अकाली दल को दोषी मानते हैं.

Image caption जसवंत सिंह गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार करना चाहते हैं

उनका कहना है, "अकाली दल सिखों की पार्टी है जिसे बादल ने अपने घर की पार्टी बना लिया है, सुखबीर सिंह अब हिंदूओं को अकाली दल का टिकट दे रहा है, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, बाप-बेटे के पाप का घड़ा भर रहा है."

भारत जाने की वजह पूछने पर वे कहते हैं, "वो मेरी जन्मभूमि है, मुझे अपने वतन से प्यार है, मैं वहाँ वापस जाना चाहता हूँ." वतन से उनका मतलब पंजाब, ख़ालिस्तान या भारत है, यह वो नहीं बताते.

कभी जिन हिंदुओं की रक्षा करने के क्रम में खालसा पंथ का उदय हुआ उन्हीं हिंदुओं के बारे में ठेकेदार कहते हैं, "मुगलों से ज़्यादा हमारा खून हिंदुओं ने बहाया है." उनके दफ़्तर की दीवार पर एक पेंटिंग लगी है, जो पाँचवी क्लास के किसी बच्चे की कलाकारी दिखती है, उसमें आग और ख़ून से 1984 लिखा है.

ठेकेदार का कहना है कि "भारत में सिख दोयम दर्जे के नागरिक हैं, मुसलमानों को पाकिस्तान मिल गया जबकि हमें हिंदुओं के अत्याचार सहने पड़ते हैं. जब यहूदियों का देश हो सकता है, मुसलमानों का देश हो सकता है तो सिखों का अलग देश क्यों नहीं हो सकता?"

उनकी खिड़की पर एक स्टिकर चिपका है जिस पर अँगरेज़ी में लिखा है-- 'इंडिया : फ्री खालिस्तान...', वे कहते हैं, "खालिस्तानी होना कोई गुनाह नहीं है, मैं पॉलिटिकल एक्टिविस्ट हूँ, कश्मीरी खुलेआम पाकिस्तान घूम आते हैं उन्हें वापस आने से कोई नहीं रोकता, इतने मुसलमान मरे नरेंद्र मोदी का कुछ नहीं बिगड़ा, इतने सिख मारे गए किसी को सज़ा नहीं हुई, मगर सारे प्रतिबंध सिखों के लिए ही हैं. भारत सरकार को फाँसी पर लटकाने के लिए सिर्फ़ सिख जवान ही मिले, कोई हिंदू नहीं मिला."

हाशिए पर ज़िंदगी

'ठेकेदार पाजी' के दफ़्तर में, दूसरे कोने में बैठीं मंजीत कौर एक डेस्कटॉप कंप्यूटर पर 'मीरी-पीरी गुरुद्वारे' की गतिविधियाँ सोशल नेटवर्क पर पोस्ट कर रही थीं. मंजीत कौर एक गिद्दा पार्टी चलाती हैं जिसका नाम है--'जागो रानी', वे शादी, मेहंदी और जन्मदिन जैसे मौक़ों पर नाच-गान का प्रोग्राम करती हैं.

Image caption परमिंदर सिंह बल 1965 से ब्रिटेन में रह रहे हैं

उनका कारोबार मीरी-पीरी गुरुद्वारे से चलता है. ढोल-मंजीरे से भरी मंजीत कौर की कार में बैठकर हम परमिंदर सिंह बल से मिलने के लिए रवाना हुए, हल्की बर्फ़बारी में हाइवे पर कार चलाती हुई मंजीत बगल की सीट पर बैठे पाजी से गुरुद्वारे के प्रबंधन, पंजाब में प्रकाश सिंह बादल की 'मनमानी' और गुरदास मान की एवरग्रीन जवानी पर बातें करती रहीं.

मुग़लों के अत्याचार, जालियाँवाल बाग़ जनसंहार, केपीएस गिल का काउंटर टेरर अभियान, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के सिख विरोधी दंगे से लेकर हरजिंदर सिंह जिंदा की फाँसी तक हर छोटी-बड़ी घटना को एक सिरे में पिरोकर पेश करने के बाद ठेकेदार और बल ने ख़ालिस्तान का केस ठीक उसी तरह तैयार किया जैसे हमेशा से प्रताड़ित रहे यहूदियों के नेताओं ने इसराइल का.

1965 से ब्रिटेन में रह रहे बल ब्लैकलिस्ट में डाले जाने से पहले तक लगातार भारत आते-जाते रहे थे, वे भिंडरावाले की तस्वीरों का पुलिंदा गर्व से दिखाते हैं, "ये सारी तस्वीरें मैंने खींची हैं, मैं उनके बहुत निकट था. संत जी (भिंडरावाले) मुझे बहुत मानते थे."

मनजीत कौर से रहा नहीं गया, "संत जी भक्ति और शक्ति का संगम थे, लोग उनकी ग़लत छवि पेश करते हैं."

छवि के महत्व को समझते हुए मनजीत कौर के साथ मिलकर ठेकेदार 'सही फैक्ट्स वाले सीरियल' और भविष्य में फ़िल्में बनाना चाहते हैं जिनका मक़सद "सिखों की नई पीढ़ी में अपने अधिकारों के लिए लड़ने का जज़्बा जगाना होगा."

ख़ालिस्तान के गठन के लिए ठेकेदार शांतिपूर्ण राजनीतिक संघर्ष की बात करते हैं मगर बल सिर्फ़ इतना कहते हैं, "अपना हक़ हासिल करने के लिए पंथ कोई भी रास्ता चुन सकता है."

इतिहास का 'ज्ञान'

स्लॉ के गाँव ईटन में स्टेशनरी और हार्डवेयर की छोटी-सी दुकान और पोस्ट ऑफ़िस का काउंटर चलाने वाले बल इतिहास का ज्ञान देते हैं, "1848 में महाराजा रणजीत सिंह से अँगरेज़ों ने पंजाब छीन लिया था, भारत सरकार से नहीं इसलिए उन्हें पंजाब उन्हीं के उत्तराधिकारियों को लौटाना चाहिए था क्योंकि तब पंजाब एक अलग देश था."

Image caption ब्रिटेन के थेटफ़र्ड में दलीप सिंह की मूर्ति

बल और ठेकेदार बताते हैं कि उन्होंने चंदा जुटाकर शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के बेटे दलीप सिंह की घोड़े पर सवार एक मूर्ति ब्रिटेन के थेटफ़र्ड शहर में लगाई गई है जहाँ दलीप सिंह ने 1860 के दशक में काफ़ी समय बिताया था.

पंजाब पर ब्रितानी कब्ज़े के बाद क्वीन विक्टोरिया ने दिलीप सिंह को एक समझौते के तहत इंग्लैंड में शरण दी, बताया जाता है कि पचास हज़ार पाउंड सालाना भत्ते की शर्त पर दिलीप सिंह ने पंजाब और मशहूर कोहिनूर हीरे का दावा छोड़ दिया था.

दलीप सिंह ने किशोरावस्था में ईसाई धर्म अपना लिया था, उनकी रंगीनमिजाज़ी और शाहख़र्ची के कई क़िस्से दर्ज हैं, 46 साल की उम्र में पंजाब पर दावा जताने के लिए उन्होंने दोबारा सिख बनने और अँगरेज़ी हुकूमत की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ भारत लौटने की कोशिश की मगर उन्हें बीच रास्ते में अदन में पकड़ लिया गया और वापस यूरोप भेज दिया गया, कुछ साल बाद पेरिस में उनकी मौत हो गई.

दलीप सिंह की मूर्ति बनवाने वाले उनकी ही तरह भारत लौटने को तरसते रह जाएँगे या फिर ब्रिटेन में खालिस्तानी करेंसी नोट जारी करने वाले जगजीत सिंह चौहान की तरह बुढ़ापे में भारत लौट सकेंगे?

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