क्या भारत में सड़क हादसों को कम किया जा सकता है?

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Image caption भारत में हर साल सड़क हासदों में क़रीब डेढ़ लाख लोगों की मौत होती है.

भारत सरकार सड़क निर्माण की ऐसी योजना पर काम कर रही है जो दुनिया की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक है.

भारत में दुनिया की कुछ सबसे खतरनाक सड़कें हैं. पिछले साल यहां सड़क हादसों में क़रीब डेढ़ लाख लोगों की मौत हुई थी. यह पिछले दशक के औसत से दोगुना है. लेकिन भारत सरकार का दावा है कि वो दो साल में इस आंकड़े को आधा कर लेगी.

भारत के किसी भी शहर में होने वाले सड़क हादसों में सबसे ज़्यादा मुंबई में होते हैं. यहां आप पैदल चलने वालों, स्कूटर, कार, बस और ट्रकों के बीच एक ख़तरनाक होड़ देख सकते हैं.

क़ानून को तोड़ने वाले इन लोगों के ख़िलाफ़ अधिकारी भी बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं.

Image caption मुंबई ट्रैफ़िक पुलिस कमिश्नर मिलिंद भरांबे.

हादसों के लिए बदनाम सड़कों के लाइव सीसीटीवी फ़ुटेज को देखते हुए मुंबई के ट्रैफ़िक पुलिस कमिश्नर मिलिंद भरांबे कहते हैं, "यह सब जल्द ही ख़त्म होने वाला है."

उन्होंने बताया कि कैमरों से उन लोगों पर नज़र रखी जाएगी, जो तेज़ गति से गाड़ी चलाते हैं और रेड लाइट जंप करते हैं. उनका कहना है कि हाल में बने कड़े कानून और जुर्माने की वजह से, छह महीने के अंदर ही ड्राइवरों की आदतों में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा.

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Image caption मुंबई की सड़कों पर जाम की समस्या आम है

लेकिन इस समस्या के पीछे ख़तरनाक ड्राइविंग और कमज़ोर कानून ही एकमात्र वजह नहीं है. मुंबई में वाहनों की संख्या में बहुत तेज़ी से इज़ाफ़ा हो रहा है. इस अव्यवस्थित ट्रैफ़िक में हर 10 सेकेंड में एक नई गाड़ी जुड़ जाती है. इस तरह से यहां हर रोज़ क़रीब 9 हज़ार नए वाहन सड़क पर आते हैं.

इससे यहां की सड़कें बुरी तरह से जाम हो चुकी हैं. यहां दो गाड़ियों के बीच सुरक्षित दूरी बनाकर रखना एक तरह से असंभव हो गया है.

मुंबई तीन तरफ से समुद्र से घिरा है. यहां विस्तार के लिए बहुत कम जगह बची है. यहां पहले के अधिकारियों ने पैदल चलने वालों के लिए पटरी भी बनवाई थी ताकि कारों को ज़्यादा जगह मिल सके.

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Image caption मुंबई की सड़कों पर पटरियां या तो मौजूद नहीं हैं या बहुत बुरी हालत में हैं.

पैदल चलने वालों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले बिनॉय कहते हैं, "सरकार आज भी कारों के लिए तेज़ और जल्द सफ़र की व्यवस्था के बारे में सोचती है. जबकि सच्चाई यह है कि इनमें से ज़्यादातर स्थानीय सफर होते हैं और सैद्धांतिक तौर पर इसके लिए पैदल चला जा सकता है."

वो बचपन में पैदल स्कूल जाते थे. लेकिन उनकी बेटी कार से स्कूल जाती है क्योंकि यहां पैदल चलना बहुत ही ख़तरनाक है. यहां पटरियों की हालत इतनी ख़राब है कि लोगों को सड़क पर ही चलना पड़ता है. इसलिए मुंबई में सड़क हादसों में मारे जाने वाले 60 फ़ीसद पैदल चलने वाले लोग होते हैं.

साल 2002 में मुंबई और पूना के बीच भारत का पहला एक्सप्रेस वे शुरू हुआ था. यह एक्सप्रेस वे महज़ 96 किलोमीटर का है, लेकिन हर साल इस पर क़रीब 150 लोगों की मौत हो जाती है.

Image caption मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर हर साल क़रीब 150 लोग हादसों में मारे जाते हैं.

सड़क हादसों पर जानकारी रखने वाले रविशंकर राजारमण के मुताबिक, "इस एक्सप्रेस वे में इंजीनियरिंग से जुड़ी कुछ खामियां हैं, जो लोगों की जान ले रही हैं. ड्राइवर को सावधान करने के लिए सड़कों के किनारे काली-पीली कंक्रीट की पटरियां बना दी गई हैं. उन पर ठोकर लगने के साथ ही आपकी कार पटल जाती है".

वो बताते हैं, " इसके अलावा टीलों के आगे कोई बैरियर नहीं है. सड़क पर लगी लोहे की रेल भी रॉकेट लाँचर की तरह है, जिससे टकराने के बाद कार सीधा आसमान की तरफ उड़ जाती है".

जेपी रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथियों के साथ शंकर ने एक्सप्रेस वे पर ऐसी 2 हज़ार जगहों की पहचान की है, जहां इंजीनियरिंग के छोटे उपायों से कई लोगों की जान बचाई जा सकती है.

शंकर का कहना है कि रोड इंजीनियर इस समस्या को लेकर गंभीर नहीं है.

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Image caption पीयूष तिवारी

इन हालात के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में सबसे बड़ी सड़क विस्तार योजना पर काम कर रहे हैं, जो दिल दहला देता है. अगले कुछ साल में वो धरती की गोलाई से बड़ी सड़क का जाल बिछाना चाहते हैं. इसमें हाइवे और एक्सप्रेस वे पर उनका ख़ास ज़ोर है.

सैफ़्टी चैरिटी सेव लाइफ़ इंडिया के सीईओ पीयूष तिवारी कहते हैं, "जब तक भारत में सड़क सुरक्षा को लेकर एक पुख़्ता कानून और सड़क निर्माण का नया नियम नहीं बनाया जाता है, मोदी की इस नई योजना से केवल मौत के आंकड़े बढ़ेंगे".

उनका कहना है, "नई बन रही सड़कों पर हर 2 किलोमीटर पर एक मौत होगी. भारत के राजमार्गों पर हर साल हर दो किलोमीटर पर एक मौत होती है. इसलिए अगर हम इसका समाधान नहीं निकालेंगे तो 1 लाख किलोमीटर के हाइवे पर 50 हज़ार लोग मारे जाएंगे".

Image caption भारत के कई शहरों में ट्रैफ़िक व्यवस्था काफ़ी बदहाल है.

वहीं सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है, "मोदी सरकार की नई सड़कें ज़्यादा सुरक्षित होंगीं. हम रोड इंजीनियरिंग को बेहतर बना रहे हैं."

Image caption डॉक्टर चगला का क्लीनिक

सेव इंडिया लाइफ़ के आकलन के मुताबिक सड़क हादसों में हर साल 75 हज़ार लोगों की ज़िंदगी बेहतर इलाज से बच सकती है.

मुंबई के न्यूरो सर्जन डॉक्टर आदिल चगला कुछ वालंटियर की मदद से लोगों की ज़िंदगी बचाने के काम में लगे हुए हैं.

डॉक्टर चगला साल 1980 से इस पेशे में हैं और तब से भारत में सड़क हादसों में होने वाली मौत 300 फ़ीसदी बढ़ चुकी है.

दूसरी तरफ मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे के कॉर्पोरेशन का कहना है कि हम 2020 तक मौत के आंकड़ों को शून्य पर ले आएंगे.

Image caption सड़क हादसे में लोगों की मौत भारत के लिए गंभीर समस्या है.

लेकिन भारत सड़क सुरक्षा को लेकर अब भी युद्ध स्तर पर काम नहीं कर रहा है, क्योंकि इसमें एक रोड़ा है.

यहां सड़कों का मालिकाना हक़ सरकार के पास है, लेकिन इसे निज़ी कंपनी चलाती है, जो बदले में टोल टैक्स वसूलती है.

यहां इन दोनों पक्षों में इस बात को लेकर विवाद है कि सुरक्षा के उपाय किसे करने चाहिए.

एक्सप्रेस वे के प्रभारी का कहना है कि सारे काम किए जाएंगे, चाहे सड़कों को ठीक करने के लिए कानूनी लड़ाई क्यों न लड़नी पड़े.

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