शोहरत के शिखर पर पहुंचीं जुड़वां बहनें

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हरियाणा के परिवार से संबंध रखने वाली जुड़वां बहनें नुंग्शी और ताशी मलिक दुनिया भर में शोहरत कमा रही हैं. 23 साल की छोटी सी उम्र में दोनों बहनें कई रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी हैं. 2013 में उन्होंने माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर इतिहास रचा.

ये माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली जुड़वां बहनें हैं. इसके अलावा उनके खाते में कई ऐसी उपलब्धियां हैं, जिन्होंने उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराया है.

नुंग्शी मलिक और ताशी मलिक दुनिया की सबसे पहली जुड़वां बहने हैं, जिन्होंने 7 महाद्वीपों की प्रमुख चोटियों पर चढ़ाई का गौरव हासिल किया है.

नुंग्शी और ताशी ने हाल में बीबीसी के लंदन संटूडियो में हमारी संवाददाता समरा फ़ातिमा से बातचीत की और अपने सफ़र के बारे में बताया.

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नुंग्शी और ताशी के सफ़र की शुरुआत काफ़ी रोचक है. ताशी बताती हैं, "मैंने बारहवीं में स्कूल में टॉप किया था और हमने स्कूल की पढ़ाई ख़त्म की थी. भारत में एक दौर होता है, जब मां-बाप आपके लिए कॉलेज ढूंढ रहे होते हैं कि आपको कहां जाना है. उस दौरान पापा ने हमसे पूछा कि अब आगे क्या करना चाहती हो?"

ताशी के मुताबिक, "उस समय हमारी रूचि कई चीजों में थी, क्योंकि पापा सेना में थे. हमारे रुचि डांस, म्यूज़िक हर चीज़ में थी, तो हमने पापा से कहा, सबकुछ. फिर पापा ने कहा कि ठीक है, तुम लोग पर्वतारोहण का एक बेसिक कोर्स कर लो, हो सकता है कि उस दौरान तुम्हें पता चले कि आगे क्या करना है".

फिर हमने कहा कि ठीक है और दोनों ने अपना बैग पैक किया. शुरू में हमें काफ़ी डर लगा रहा था. पता नहीं 'पहाड़ो की चढ़ाई', हम सफल होंगे या नहीं."

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फिर दोनों बहनों ने अपना बैग पैक किया. शुरू में उनके मन में डर भी था कि पहाड़ की चढ़ाई पूरी कर भी पाएंगीं या नहीं? शौक में ही सही लेकिन 17 साल की उम्र में दोनों बहनों ने पर्वतारोहण शुरू किया.

लेकिन उनका ये सफ़र आसान नहीं था. नुंग्शी बताती हैं, "हमने जब ये ऐलान किया कि हम पहाड़ चढ़ना चाहते हैं और कुछ अलग करने जा रहे हैं, तो काफ़ी लोगों ने कहा कि कहां जा रहे हो, तुम्हारे हाथ पैर कट जाएंगे तो शादी कैसे होगी.

लोगों ने ऐसे बहुत सारे डर उनकी मां के ऊपर भी डाले और इससे उनके पापा भी थोड़े घबरा गए थे. ताशी ने बताया कि हर समय जब वो लोग कुछ अलग करना चाहती थीं, तो लगता था कि न तो माता-पिता और न ही समाज उनका साथ देगा.

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लेकिन उनके हौसलों के आगे चुनौतियों की एक नहीं चली और देखते देखते लोगों का रवैया भी उनके लिए बदलने लगा.

नुंग्शी बताती हैं, "यह सब तब रुका, जब हमने 20 हज़ार फुट की पहली चढ़ाई पूरी की. फिर जब हमने सबसे ऊंची चोटी 'एवरेस्ट' पर फतेह हासिल कर ली तो लोगों का रवैया पूरी तरह से बदल गया".

उसके बाद नुंग्शी और ताशी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. इन लोगों ने कई बार गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपने नाम दर्ज कराए हैं. ये दोनों बहने अपनी ये शोहरत 'लिंग समानता' को समर्पित करती हैं.

लेकिन ऐसा करने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली?

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ताशी बताती हैं, "हमें याद है पापा को अक्सर सोसाइटी के लोग कहते थे कि तुम्हारा कोई बेटा नहीं है, तुम्हें बेटा पैदा करना चाहिए, उससे काफ़ी सहारा मिलेगा".

ताशी आगे कहती हैं, "बार बार ऐसा सुनने के बाद हमें लगा कि ये ग़लत है. फिर हमें लगा कि मैं और नुंग्शी ऐसा कुछ कर के दिखाएं जो सारी दुनिया से अलग हो. हम मां-बाप को दिखाएं कि लड़कियां होना भी बहुत ज़रूरी है. सात महाद्वीपों के शिखरों पर चढ़ने का हमारा ये पूरा मिशन भी इसी से जुड़ा हुआ है".

नुंग्शी और ताशी ने अपनी एक संस्था भी बनाई है, जिसका मक़सद है घर के बाहर लड़कियों की हिस्सेदारी को बढ़ावा देना.

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