60 साल के पार भी बना हुआ है रेखा का जलवा

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22 जनवरी 1980 का दिन था. मौका था ऋषि कपूर और नीतू सिंह की शादी का. भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के बड़े से बड़े नाम वहाँ मौजूद थे.

अमिताभ बच्चन अपनी पत्नी जया और माता-पिता के साथ वहाँ पहुंचे हुए थे और एक कोने में खड़े होकर मनमोहन देसाई से बात कर रहे थे. जया अपनी सास तेजी बच्चन के साथ बैठी हुई थीं, तभी अचानक रेखा ने एंट्री ली. उन्होंने ख़ूबसूरत सफ़ेद साड़ी पहन रखी थी और उनके माथे पर एक लाल बिंदी लगी हुई थी. लेकिन जो चीज़ सबसे ज़्यादा लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींच रही थी वो था उनकी माँग के बीच लगा सिंदूर.

उनको देखते ही फ़ोटोग्राफ़रों के कैमरे नीतू और ऋषि को छोड़ कर उनकी तरफ़ मुड़ गए थे. थोड़ी देर बाद रेखा पार्टी से चली गईं थीं. लेकिन वो अपने पीछे कई अनुत्तरित सवाल छोड़ गईं थीं जो लोगों के ज़ेहन में महीनों तक रहे.

बाद में एक पत्रिका को दिए गए इंटरव्यू में रेखा ने स्पष्टीकरण दिया कि उस दिन वो सीधे एक शूट से पार्टी में चली आई थीं और जो मंगलसूत्र और सिंदूर वो लगाए हुए थीं, वो उस फ़िल्म में उनके मेक अप का हिस्सा था.

ये थीं असली रेखा जिन्हें विवादों में खेलना पसंद था और उन्हें इस बात की रत्ती भर भी फ़िक्र नहीं थी कि लोग क्या कहेंगे.

रेखा की जीवनी, रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी लिखने वाले यासेर उस्मान बताते हैं कि रेखा के फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत हुई थी 14 साल की कच्ची उम्र में जब नैरोबी में रहने वाले प्रोड्यूसर कुलजीत पाल ने उन्हें पहली बार जैमिनी स्टूडियो में देखा था. वो तमिल हीरोइन वाणीश्री को साइन करने गए थे.

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उन्होंने उनके मेक अप रूम में एक गोल मटोल, साँवली लड़की को बैठे हुए देखा. वो खाना खा रही थी. उसकी प्लेट पूरी तरह से भरी हुई थी. किसी ने कुलजीत से फुसफुसा कर कहा कि ये अभिनेत्री पुष्पवल्ली की बेटी है. कुलजीत को उस लड़की में कुछ ऐसा ख़ास दिखाई दिया कि वो उसी शाम पुष्पवल्ली के घर पहुंच गए.

उन्होंने रेखा से पूछा क्या तुम 'हिंदी बोल सकती हो?' रेखा ने छूटते ही जवाब दिया, 'नहीं.' तभी उनकी माँ ने कहा, "मेरी बेटी की याददाश्त बहुत ज़बरदस्त है. आप कुछ भी एक कागज़ पर लिख दें. ये उसे तुरंत याद कर आपके सामने पढ़ देगी."

कुलजीत ने एक डायलॉग हिंदी में लिखा. रेखा ने उसे रोमन में उतारा और इससे पहले कि कुलजीत अपनी चाय का प्याला ख़त्म कर पाते, रेखा ने वो डायलॉग सुनाना शुरू कर दिया, "सतीश, अब तो वो दिन आ गया है जब तुम्हारे और मेरे बीच में एक फूलों का हार भी नहीं होना चाहिए."

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कुलजीत ने उसी समय रेखा को अपनी फ़िल्म के लिए साइन किया. इस तरह उस समय भानुरेखा के नाम से जानी जाने वाली रेखा का फ़िल्मी सफ़र 'अनजाना सफ़र' नाम की फ़िल्म से शुरू हुआ.

अपनी पहली ही फ़िल्म में रेखा को एक तरह के यौन शोषण का शिकार होना पड़ा जब निर्देशक राजा नवाथे ने उन पर पांच मिनट लंबा चुंबन का दृश्य फ़िल्माया.

यासेर बताते हैं, "पहले ही शिड्यूल में कुलजीत, राजा और फ़िल्म के हीरो विश्वजीत ने योजना बनाई कि फ़िल्म में एक किसिंग सीन होगा. जैसे ही निर्देशक राजा ने एक्शन कहा, विश्वजीत रेखा को अपनी बाहों में भर कर चूमने लगे. ये सीन पांच मिनट तक चलता रहा. कैमरा रोल करता रहा और न तो निर्देशक ने कट कहा और न ही विश्वजीत रुके. इस बीच यूनिट के लोग जो ये शूटिंग देख रहे थे सीटियाँ बजाते रहे."

रेखा इस शोषण और अपमान को कभी नहीं भुला पाईं. बाद मे जब मशहूर पत्रिका लाइफ़ ने भारतीय फ़िल्मों में चुंबन पर एक स्टोरी की तो उसने विश्वजीत और रेखा पर फ़िल्माए गए उस चुंबन की तस्वीर को भी छापा. ये फ़िल्म रेखा के फ़िल्मों में आने के दस वर्ष बाद रिलीज़ हुई और बुरी तरह से फ़्लाप हुई.

रेखा की पहली हिट फ़िल्म थी 'सावन भादो'. धीरे-धीरे वो बॉलीवुड में लोकप्रिय होती चली गईं. एक समय ऐसा भी आया कि उनके पास 25 फ़िल्में थीं. उसी दौरान उनकी मुलाकात विनोद मेहरा से हुई. वो उन्हें पसंद करने लगीं. उन्होंने उनसे शादी भी कर ली, लेकिन विनोद मेहरा की माँ ने उन्हें स्वीकार करने से इंकार कर दिया.

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यासेर उस्मान बताते हैं, "मैं रेखा के जितने भी करीबी लोगों से मिला, सबने कहा कि विनोद मेहरा उन्हें दिल से चाहते थे. रेखा उन्हें विन विन कह कर पुकारती थीं. लेकिन वो अपनी माँ को रेखा से शादी के लिए नहीं मना पाए. जब वो कोलकाता में शादी कर रेखा को सीधे एयरपोर्ट से अपने घर ले गए और रेखा ने विनोद मेहरा की माँ कमला मेहरा के पांव छूने चाहे तो उन्होंने उन्हें धक्का दे दिया."

"उन्होंने रेखा को अपने घर में नहीं घुसने दिया. एक समय तो वो इतनी नाराज़ हो गईं कि वो रेखा को चप्पल से मारने पर उतारू थीं. विनोद मेहरा ने उनसे कहा कि कुछ दिनों तक अपने घर पर रहे. तब तक वो अपनी माँ को मनाने की कोशिश करेंगे. लेकिन विनोद मेहरा अपनी माँ को कभी नहीं मना पाए और ये रिश्ता वक्त के साथ ख़त्म हो गया."

रेखा की शख़्सियत में आमूल बदलाव आया अमिताभ बच्चन से मिलने के बाद. उनकी बिंदास हरकतों, उन्मुक्त व्यवहार और बात बात पर खिलखिला देने की अदा की जगह एक ख़ास किस्म के गांभीर्य ने ले ली.

यासेर बताते हैं, "इन दोनों की पहली बड़ी फ़िल्म थी 'दो अनजाने'. तब तक अमिताभ की दीवार आ चुकी थी. शोले भी आ चुकी थी. वो फ़िल्मी दुनिया के उभरते हुए सितारे थे. रेखा उन्हें देखते ही उन पर फ़िदा हो गईं थीं. उन्होंने सिमी ग्रेवाल के कार्यक्रम रेनडावू में दिए गए इंटरव्यू में स्वीकार किया है कि अमिताभ बच्चन के सामने खड़े होना उनके लिए आसान नहीं था. वो वक्त पर सेट पर आया करते थे जबकि रेखा अपनी लेटलतीफ़ी के लिए मशहूर थीं."

"इसे अमिताभ बच्चन का असर कहा जाए या और कुछ, लेकिन रेखा 'दो अनजाने' की शूटिंग के लिए सुबह छह बजे सेट पर हाज़िर हो जाती थीं. दो अनजाने की यूनिट के लोग बताते हैं कि वो रेखा में एक ख़ास किस्म का परिवर्तन साफ़ देख पा रहे थे. एक मोटी, कमर मटकाने वाली और अपने जिस्म की नुमाइश से परहेज़ न करने वाली रेखा अब एक गंभीर और परिपक्व अभिनेत्री बन चुकी थीं और बड़े फ़िल्म निर्माता उन्हें साइन करने लगे थे."

अचानक रेखा के अभिनय का रेंज बढ़ गया था. वो अब घर, ख़ूबसूरत और इजाज़त जैसी फ़िल्में करने लगी थीं. मशहूर फ़िल्म निर्देशक गुलज़ार कहते हैं, "वह हर किरदार को एक लिबास की तरह पहन लेती थीं. एक तरफ़ आप 'घर' देखिए, दूसरी तरफ़ 'ख़ूबसूरत'. दोनों बिल्कुल अलग-अलग फ़िल्में हैं. खूबसूरत देख कर लगता है जैसे वो किसी लड़के का रोल निभा रही हों."

खूबसूरत के लिए रेखा को न सिर्फ़ राष्ट्रीय पुरस्कार मिला बल्कि फ़िल्म फ़ेयर ने भी उन्हें 1981 की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुना. घर फ़िल्म में गुलज़ार ने रेखा और चार स्टंटमैनों को हिदायत दी थी कि बलात्कार के दृश्य को वास्तविक दिखाने के लिए वो जहाँ चाहें, वहाँ इंप्रोवाइज़ कर सकते हैं. कहा जाता है कि रेखा ने उस दृश्य को इतनी शिद्दत से निभाया कि बाद में गुलज़ार ने उसे डब करने की ज़रूरत ही नहीं समझी.

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अस्सी के दशक की शुरुआत में रेखा अपने करियर के पीक पर पहुंच गई थी. तभी यश चोपड़ा ने उस समय का सबसे बड़ा कास्टिंग कू किया जब उन्होंने 'सिलसिला' फ़िल्म के लिए अमिताभ बच्चन, रेखा और जया बच्चन को साइन किया.

यासेर उस्मान बताते हैं, "उस समय यश चोपड़ा की काला पत्थर फ़्लाप हो चुकी थी और अमिताभ बच्चन की भी दो तीन फ़िल्में चली नहीं थीं. यश एक ऐसी फ़िल्म बनाना चाह रहे थे जो दर्शकों के दिल पर छा जाए. अमिताभ 'कालिया' फ़िल्म के लिए श्रीनगर में शूटिंग कर रहे थे. यश वहाँ पहुंचे और उन्होंने 'सिलसिला' फ़िल्म का प्रस्ताव उनके सामने रखा."

"रेखा और अमिताभ तो इस फ़िल्म के लिए तैयार हो गए. जया बच्चन को मनाने की ज़िम्मेदारी यश चोपड़ा ने खुद संभाली. शुरू में जया राज़ी नहीं हुई, लेकिन जब उन्हें फ़िल्म का क्लाइमेक्स सुनवाया गया तो वो फ़िल्म करने के लिए तैयार हो गईं. क्लाइमेक्स में अमिताभ अपनी प्रेमिका रेखा को छोड़ कर हमेशा के लिए उनके पास आ जाते हैं. फ़िल्म शुरू होने से पहले ही यश चोपड़ा ने रेखा और जया से वादा करवा लिया कि शूटिंग के दौरान कोई भी अप्रिय स्थिति नहीं आने दी जाएगी. दोनों ने इस वादे को पूरी तरह से निभाया."

लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब अमिताभ बच्चन रेखा से मिलने तक से कतराने लगे. एक ज़माने में अमिताभ बच्चन के काफ़ी करीबी रहे अमर सिंह बताते हैं, "एक बार शबाना आज़मी ने मुझे, अमिताभ और जया को अपने जन्मदिन पर बुलाया. हम तीनों लोग एक ही कार में बैठ कर उनके घर पहुंचे. अमिताभ ने अपने ड्राइवर से कहा कि हम लोग यहाँ देर तक रुकेंगे, इसलिए तुम खाना खा कर वापस आ जाओ."

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Image caption दीपिका पादुकोण के साथ रेखा

"जैसे ही हम कमरे में घुसे, हमने वहाँ रेखा को खड़े किसी से बाते करते हुए देखा. अमिताभ उन्हें देखते ही तेज़ी से पलट कर बाहर आए, लेकिन तब तक ड्राइवर खाना खाने जा चुका था. उन्होंने एक काली पीली टैक्सी रोकी और हम तीनों लोग घर उस पर बैठ कर वापस आ गए. उन दोनों के बीच कुछ न कुछ तो था ही, वर्ना अमिताभ कम से कम शबाना को विश किए बगैर वापस नहीं आते."

रेखा ने सबसे ज़्यादा नाम कमाया अपनी फ़िल्म 'उमराव जान' के लिए. सवाल उठता है कि मुज़फ़्फ़र अली ने रेखा में आखिर ऐसा क्या देखा कि उन्होंने उमराव जान के रोल के लिए रेखा को चुना?

मुज़फ़्फ़र अली बताते हैं, "मैं उस रोल के लिए स्मिता पाटिल को चुन सकता था, लेकिन मैंने रेखा की आँखों में देखा कि वो टूटने का अनुभव समझती हैं. उमराव जान के जीवन की भी यही कहानी थी. रेखा ने इस रोल के लिए बहुत मेहनत की. उन्होंने मेरी उम्मीद से कहीं बेहतर अभिनय किया और स्क्रिप्ट के भी ऊपर निकल गईं."

1990 में रेखा की मुलाकात दिल्ली के उद्योगपति मुकेश अग्रवाल से हुई. आनन-फानन में दोनों ने शादी करने का फ़ैसला कर लिया. यासेर उसमान कहते हैं, "मुकेश अग्रवाल ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं थे. वो एक कंपनी हॉटलाइन के मालिक थे और दिल्ली में रहा करते थे. उनको फ़िल्मी सितारों को अपने घर पर दावतें देने का बहुत शौक था. उन्होंने एक घोड़ा ख़रीद रखा था. जब भी कोई मेहमान उनके फ़ार्म हाउज़ पर आता था वो घोड़े पर बैठ कर उसे अपने गेट पर रिसीव करते थे."

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Image caption मुकेश अग्रवाल के साथ रेखा

"मशहूर सोशालाइट बीना रमानी ने रेखा की मुलाकात मुकेश अग्रवाल से करवाई थी. अभी उनको मिले एक महीना भी नहीं बीता था कि मुकेश ने रेखा को शादी के लिए प्रपोज़ कर दिया. रेखा राज़ी हो गईं और उन्होंने उसी वक्त जुहू के मुक्तेश्वर देवालय में शादी करने का फ़ैसला कर लिया."शादी करते ही दोनों हनीमून मनाने लंदन चले गए. लेकिन वहाँ उन्हें एक हफ़्ते के अंदर ही पता चल गया कि वो दोनों एक दूसरे के लिए बने ही नहीं हैं.

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यासेर बताते हैं, "रेखा को ये जान कर धक्का लगा कि मुकेश रोज़ दवाएं लेते हैं और डिप्रेशन के मरीज़ हैं. एक दिन मुकेश ने रेखा से स्वीकार किया कि उनके जीवन में भी एक एबी है. रेखा के एबी के बारे में तो सबको पता था, लेकिन मुकेश की एबी उनकी मनोचिकित्सक थीं. इसके बाद रेखा ने मुकेश से दूरी बनानी शुरू कर दी और छह महीने के अंदर ही उन्हें तलाक के कागज़ भिजवा दिए. मुकेश अग्रवाल इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए और एक दिन उन्होंने दुपट्टे का फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली."

आज रेखा ने अपने आप को सुचित्रा सेन के मोड में ढाल लिया है. वो एकाकी जीवन जीती हैं जिसमें बाहरी दुनिया के लिए कोई जगह नहीं हैं. वो राज्य सभा की सदस्य ज़रूर हैं, लेकिन इसकी कार्यवाही में बहुत कम हिस्सा लेती हैं. उन्होंने ज़िंदगी का बहुत जीवट से मुक़ाबला किया है और हर बार गिर कर भी बिना किसी मदद के उठ खड़ी हुई हैं. उनके करीबी लोगों ने उन्हें अक्सर लेट डाउन किया था. शायद इतिहास उनसे बेहतर ढंग से पेश आए.

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