वो पांच, जिन्होंने दी शहाबुद्दीन को चुनौती

Image caption चन्दा बाबू, जिनके तीन बेटों की हत्या का आरोप सिवान के पूर्व सांसद शबाबुद्दीन पर है

बिहार के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन हत्या के एक मामले में 11 साल जेल में रहने के बाद, ज़मानत पर रिहा हुए हैं.

इस दबंग राजनेता के बारे में इलाक़े में काफ़ी कुछ कहा जाता है, लेकिन एक नज़र उन लोगों पर जिन्होंने शहाबुद्दीन को चुनौती दी.

चन्दा बाबू, जिनके तीन बेटों की हत्या हुई

मेरे तीन जवान बेटों की हत्या हुई. कई लोगों ने और ख़ासतौर पर कई प्रशासनिक अधिकारियों ने हमसे कहा कि सिवान छोड़ दीजिए. हम कहाँ जाएँ? हम सिवान छोड़कर नहीं जाएंगे. अब यहीं रहेंगे. अब यहीं जिएंगे और यहीं मरेंगे. चाहे भगवान ज़िंदा रखें. चाहे शहाबुद्दीन मरवा दें.

हमको अपने मरने का ग़म नहीं है. सिर्फ़ इतना है कि एक बच्चा है जो विकलांग है. मेरे हीरा, मोती और जुगनू ख़त्म हो गए. सिर्फ ये एक फूटी कौड़ी है हमारे पास. हमें बस इस फूटी कौड़ी की चिंता है.

अजीब बात यह है कि सिवान की अदालत से आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई जाती है और हाई कोर्ट से ज़मानत मिल जाती है. अब तो न्यायपालिका से हमारा विश्वास ही उठ गया. हम शहाबुद्दीन का उस दिन क़ाफ़िला देखते रहे जिस दिन ज़मानत पर रिहा होकर वो सिवान आए. हमारा दिल रो दिया.

ओमप्रकाश यादव, सिवान से भाजपा के सांसद

Image caption सिवान के भाजपा सांसद ओमप्रकाश यादव

सरकार के सहयोग से शहाबुद्दीन को ज़मानत मिली है यह सच है, क्योंकि सरकार ने अदालत में जूनियर वकील खड़ा किया था. हम सरकार का विरोध ज़रूर करते हैं मगर एक बात तो है कि नीतीश कुमार खुद नहीं चाहेंगे की सिवान के हालात बिगड़ जाएँ.

लोगों को चिंता थी कि मोहम्मद शहाबुद्दीन को ज़मानत मिलने से खौफ़ का साम्राज्य लौट सकता है. मगर, अब वो परिस्थितियां नहीं हैं, क्योंकि सरकार का रुख काफी सख्त है. पहले लोग भाग जाया करते थे. अब कोई नहीं भागता. वैसे लोगों की आशंका भी वाजिब है क्योंकि एक ज़माना ऐसा भी था, जब कोई राजनीतिक दल सिवान में अपनी पार्टी का झंडा नहीं लगा सकता था. जो लगाता था उसकी हत्या हो जाती थी. हमारी पार्टी के ओंकारमल सांवरिया की भी हत्या हुई.

यहां किसी और को वोट देना और प्राण देना एक बराबर था. मैंने भी चुनाव लड़कर चुनौती दी तो मुझे बुरी तरह पीटा गया. यह 2002 की बात है, जब मैं ज़िला परिषद का चुनाव लड़ रहा था. उसी दिन मैंने संकल्प लिया था कि मेरी पत्नी तबतक चूड़ियां नहीं पहनेगी जबतक मैं मोहम्मद शहाबुद्दीन के अपराधिक साम्राज्य को ख़त्म नहीं कर देता.

अब जो प्रशानिक अधिकारी यहाँ तैनात हैं, वो भी काफी सख्त हैं. इसलिए अब माहौल वैसा नहीं है जैसा 12 साल पहले था.

अमर यादव, पूर्व विधायक भाकपा (माले)

Image caption अमर यादव, भाकपा माले के पूर्व विधायक

हमने तो ख़तरे की चिंता करना ही छोड़ दिया है.

भाकपा (माले) ही एक मात्र ऐसा संगठन है जिसने मोहम्म्द शहाबुद्दीन से लोहा लिया. कई दशकों से हमारा संघर्ष सामंतवादियों और उनके गुंडों से चलता आ रहा है. हमारे 153 नेता और कार्यकर्ता इस संघर्ष में मारे गए हैं.

हमारे कई नेताओं की ह्त्या में मोहम्मद शहाबुद्दीन अभियुक्त है. मुझे भी गोली लगी. पेट का ऑपरेशन भी हुआ. हमने देखा है कि ह्त्या, चोरी और डकैती के मामलों में पुलिस और प्रशासन का रुख़ अलग रहता है. उसमे वो सज़ा नहीं दिला पाते हैं. सजा किन मामलों में होती है? जो लोगों के संघर्ष से जुड़े होते हैं. जहां अधिकार की लड़ाई है, वहां लोगों पर मुक़दमे लादे जाते हैं.

जिस दिन मोहम्म्द शहाबुद्दीन को ज़मानत मिली और उन्हें क़ाफ़िले में लाया गया, उस दिन किसी पुलिस वाले ने उन गाड़ियों की जांच नहीं की, जिससे यह पता चले कि गाड़ियों में क्या लाया जा रहा है. कहीं हथियार तो नहीं हैं? भाकपा (माले) ही एकमात्र वो संगठन है जिसने सबसे पहले मोहम्म्द शहाबुद्दीन को सज़ा करवाई.

आशा देवी, पत्रकार राजदेव की विधवा

Image caption आशा देवी, पत्रकार राजदेव रंजन की पत्नी जिनकी हत्या 13 मई 2016 को कर दी गई

मैं पेशे से टीचर हूं. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन समाज में ऐसे ऐसे लोगों से लोहा लेना पडेगा जो ताक़तवर हैं.

13 मई 2016 को मेरी ज़िंदगी ने एक दूसरी करवट ले ली. मेरे पति की गोली मारकर ह्त्या कर दी गई. वो रात को आफिस से घर लौट रहे थे. तभी मोटरसाइकिलों पर आए कुछ हमलावरों ने उनको गोलियों से भून डाला.

इस मामले में मोहम्मद शहाबुद्दीन को मुख्य साज़िशकर्ता के रूप में नामज़द किया गया है. मैं दो छोटे बच्चों से साथ रहती हूं. घर पर ना बैठकर इस हालात को मैंने चुनौती के रूप में स्वीकार किया है.

अदालत से लेकर दिल्ली तक ऐसा कोई भी दरवाजा नहीं है जिसे मैंने इंसाफ़ के लिए खटखटाया न हो. अब मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है. मगर मैंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी है कि अदालत ख़ुद इस जांच की निगरानी करे.

जिन लोगों के नाम इस हत्याकांड में आ रहे हैं वो कुख्यात अपराधी हैं. सरकार को मेरे और मेरे परिवार के रहने के लिए एक सुरक्षित घर की भी व्यवस्था करनी चाहिए. जबसे शहाबुद्दीन को ज़मानत मिली है, मेरा परिवार दहशत में है. मगर हमने भी ठान ली है कि हम क़ानूनी लड़ाई लड़ेंगे. थोड़ा मुश्किल काम है क्योंकि वो जांच को प्रभावित कर सकते हैं.

मनोज सिंह, भाजपा नेता और शहाबुद्दीन के पूर्व साथी

Image caption मनोज सिंह, भाजपा के स्थानीय नेता और शहाबुद्दीन के पूर्व साथी

मोहम्मद शहाबुद्दीन का उदय हुआ भाकपा (माले) के आतंक की वजह से जब ज़मींदारों ने उनका समर्थन किया. इनमें ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार और कायस्थ किसान थे. भाकपा (माले) ने संपन्न किसानों को खूब परेशान किया. खूब हमले किए. हत्याओं के आरोप भी उनपर हैं.

उसी दौर में मैं उनके साथ जुड़ा. मगर 2004 में अजय सिंह के गाँव में वोट मांगने हम गए तो रियाजुद्दीन नाम के उनके एक लठैत की गोली मारकर हत्या कर दी गई. किसी ने कह दिया कि मैंने पीछे से गोली मारी थी.

यहीं से मनमुटाव शुरू हुआ. 2005 में मेरे भाई की हत्या करवा दी गई. अब हमारी दुश्मनी है. मगर मैं कहना चाहता हूँ कि उनके जेल में रहते हुए मैं ज़्यादा असुरक्षित था. वैसे भी उनके यह ज़मानत अस्थायी है, जो बहुत दिनों तक उनको बाहर नहीं रख पाएगी. उन्हें फिर से जेल तो जाना ही पड़ेगा.

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