उड़ी- पूर्व जनरलों की राय और भारत के विकल्प...

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Image caption जम्मू कश्मीर के उड़ी में रविवार को सेना के कैंप पर हुए हमले के बाद मोर्चा संभालता भारतीय सैनिक.

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी सेक्टर में रविवार को चार बंदूकधारियों के सेना के कैंप पर हमले में 18 सैनिक मारे गए. मोदी सरकार पर सेना की ओर से पाकिस्तान को कड़ा जवाब देने का दबाव बढ़ रहा है.

इस हमले के कुछ देर बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ''मैं देश को आश्वस्त करना चाहता हूं कि इस घिनौने हमले के पीछे जिनका भी हाथ है उन्हें सज़ा ज़रूर मिलेगी.''

हालांकि मोदी ने पाकिस्तान का नाम तो नहीं लिया, लेकिन हमले के बाद उनकी प्रतिक्रिया ने उन लोगों को प्रोत्साहित किया जो चाहते हैं कि भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना को जवाब दे, जिस पर वरिष्ठ भारतीय नेताओं ने हमलावरों की मदद का आरोप लगाया है.

पाकिस्तान ने इन आरोपों से इंकार किया है. उसने भारत की प्रतिक्रिया को हर ऐसी घटना के बाद होने वाली स्वभाविक प्रतिक्रिया कहते हुए खारिज कर दिया है. अभी किसी चरमपंथी गुट ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है.

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सेना उड़ी हमले का जवाब देने के लिए कुलबुला रही है. अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए वह मारे गए 18 सैनिकों से अधिक सैनिकों को मारना चाहती है. ऐसा कोई भी कदम इन दो परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसियों के बीच तनाव बढ़ाएगा.

भारत के रक्षा रणनीतिकारों का बहुत पहले से मानना रहा है कि भारत परमाणु हथियारों की दहलीज़ को पार किए बिना पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए उस पर हमला कर सकता है.

भारत की ओर से रक्षा नीति बनाने वाले इन लोगों का विचार है कि ऐसे विकल्प हैं कि भारत सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जल्द सैन्य कार्रवाई कर सकता है और उससे राजनीतिक फ़ायदा उठा सकता है. वो ये भी मानते हैं कि तब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय दख़ल दे देगा ताकि ये सैन्य कार्रवाई पूरी तरह परमाणु युद्ध का रूप न ले ले.

लेकिन यदि ऐसी कार्रवाई करनी हो तो ये 'स्पीडी एक्शन' होना चाहिए और उड़ी घटना के 24 घंटे बीत जाने के बाद, इसकी संभावना कम ही नज़र आती है.

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Image caption जम्मू कश्मीर के उड़ी में रविवार को सेना के कैंप पर हुए हमले के बाद मोर्चा संभालने जाते भारतीय सैनिक.

सुरक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि सेना के वो लोग जो आक्रामक रवैया चाहते हैं, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का पाकिस्तान से आक्रामक तौर पर निपटने का नज़रिया प्रोत्साहित कर रहा है. लेकिन सीमा पर तनाव को देखते हुए यह बुद्धिमतापूर्ण नज़रिया नहीं है.

सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल विजय कपूर कहते हैं, ''इस समय हम इस तरह के हमले का जवाब देकर पाकिस्तान से सामरिक बढ़त छीन सकते हैं. उसे यह बता सकते हैं कि भारतीय सेना क्या करने में सक्षम हैं.''

वो कहते हैं, ''हमने बहुत समय से शांति बनाए रखी है. लेकिन हम पाकिस्तानी सेना के समर्थित चरमपंथियों को अपने ऊपर हावी होने देने और और हमले करने नहीं दे सकते हैं. ''

पूर्व उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राज कादियान कहते हैं, ''उड़ी हमले की प्रतिक्रिया निश्चय ही कड़ी होनी चाहिए.''

वो कहते हैं, ''इस तरह की स्थिति जिसमें हम पर लगातार हमले हो रहे हैं, यह अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकती है.''

हालांकि वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इस बात पर सहमत हैं कि भारत सुनियोजित प्रतिक्रिया के लिए जो समय और स्थान चुनता है वह प्रभावशाली और उड़ी हमले के बाद आई लोगों की प्रतिक्रिया और आधिकारिक भावनाओं के अनुपात में होना चाहिए.

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Image caption स्वतंत्रता दिवस, पर लाल किले से भाषण देने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मानवाधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया.

वो जून 2015 में बर्मा के अंदर नगा विद्रोहियों के दो कैंपों पर विशेष बलों के हमले जैसी कार्रवाई को ही प्राथमिकता देंगे. इस हमले से कुछ दिन पहले मणिपुर के चंदेल ज़िले में सेना के काफिले पर घात लगाकर किए गए हमले में 18 सैनिक मारे गए थे.

उस समय सेना ने केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों से तालमेल बिठाया था. यहां तक कि सेना ने विशेष बलों के कुछ जवानों को इस कार्रवाई पर मीडिया को इंटरव्यू देने तक ले लिए प्रोत्साहित किया और सेना की कुछ क्लासीफ़ाइड जानकारियां भी दीं.

लेकिन उसके बाद कई बार यह कहा जा चुका है कि उस तरह का अभियान पाकिस्तान के खिलाफ संभव नहीं है.

इसके अलावा सैन्य विशेषज्ञों की दलील है कि उड़ी हमले के बदले में होने वाली कोई भी प्रतिक्रिया जल्द करने की ज़रूरत है. अमरीका जैसे देशों की ओर से बनाया गया राजनयिक दबाव इस तरह के विकल्प को अलग-थगल करता है या इस दांव के लिए बहुत कम समय देता है.

भारत के पास विकल्प बहुत सिमित हैं. प्रत्यक्ष विकल्प यह है कि पूरी नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर गोलीबारी हो. लेकिन इसका परिणाम यह होगा कि 2003 में हुआ द्विपक्षीय युद्धविराम समझौता ख़त्म हो जाएगा.

दूसरी संभावना यह हो सकती है कि उड़ी के निकट नियंत्रण सीमा पर चुनिंदा ठिकानों पर गोलीबारी की जाए, जिनके जरिए चरमपंथी भारत की सीमा में दाखिल होकर कथित तौर पर पाकिस्तान के बताए ठिकाने पर हमला करते हैं.

लेकिन अन्य विश्लेषक और सैन्य अधिकारी इससे जुदा राय रखते हैं. उनका मानना है भारी उकसावे के बाद पाकिस्तान के परमाणु शक्ति संपन्न शासक भारत को चेतावनी देते रहते हैं, हालांकि वो सैन्य रूप से जवाब देने में सक्षम है.

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Image caption उड़ी हमले के विरोध में अमृतसर में प्रदर्शन करते लोग.

सेवानिवृत्त मेजर जनरल शेरू थपलियाल कहते हैं, '' दशकों से भारत पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अमरीका और अन्य देशों की ओर देखता रहा है, जबकि वह ख़ुद ही ऐसा करने में सक्षम है.''

उड़ी हमला न्यूयार्क में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन से पहले हुआ है, जिसमें पाकिस्तान भारत प्रशासित कश्मीर में सुरक्षा बलों के कथित अत्याचार की बात उठाने की कोशिश करेगा.

हाल ही में उसने कश्मीर के हालात से दुनिया को वाकिफ कराने के लिए अपने 22 वरिष्ठ नेताओं और अधिकारियों को रवाना किया था.

इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान के तनावग्रस्त बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया.

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Image caption भारत प्रशासित कश्मीर के श्रीनगर में तैनात सैनिक.

इस बीच हमले के शोरगुल में एलओसी से लगती उड़ी की सैन्य छावनी पर हमले के दौरान सुरक्षा चूक की बात अनदेखी रह गई, जिसकी वजह से हमला आसान हुआ.

इस मामले की जांच शुरू कर दी गई है. इस बात में संदेह नहीं है कि ज़िम्मेदारी तय की जाएगी और ज़िम्मेदार लोगों को दंडित किया जाएगा. लेकिन बहुत से वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि सेना को ही आंतरिक सुरक्षा के अभियान पर गंभीरता से तैनात किया जाएगा, जो कि हमेशा चौकन्नी रहे.

यह उसी सुरक्षा में चूक की याद दिलाता है जिसके कारण पिछले साल मणिपुर में सेना के दस्ते पर घात लगाकर हमला हुआ. लगता है कि उससे कोई ख़ास सीख नहीं ली गई है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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