उड़ी: 'जहां पत्थर हटाकर पाक सैनिक बचाए'

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उड़ी उत्तरी कश्मीर का एक सीमावर्ती शहर है. इसका आकार कटोरे की तरह है, जो वन्य क्षेत्र से घिरा पर्वत है.

यह इलाका एक तरह से भारत और पाकिस्तान के बीच आज़ादी के बाद से जारी संघर्ष की पहचान रहा है. वर्ष 1948 में भारत पाकिस्तान के कथित समर्थन से जम्मू-कश्मीर में हुई घुसपैठ के विरोध में संयुक्त राष्ट्र गया था.

रविवार को उड़ी में चरमपंथियों ने भारतीय सेना की छावनी पर हमला किया, जिसमें भारतीय सेना के 18 जवानों की मौत हो गई. इस हमले में भारत के कई सैनिक घायल भी हुए.

यह हमला कश्मीर घाटी में बीते 26 साल से जारी कथित घुसपैठ और चरमपंथी हिंसा में सबसे बड़ा हमला है.

श्रीनगर से 100 किलोमीटर दूर स्थित उड़ी का महत्व क्या है? आइए जानते हैं उड़ी के बारे में विस्तार से-

सोमवार को नियंत्रण रेखा के पार पाकितान जाने वाली बस ने उड़ी से जब सवारियों को उठाया तो इस जगह की एक दूसरी तस्वीर सामने आई, जो दोनों मुल्कों के बीच सुलह की तस्वीर को दर्शाने वाली थी.

दरअसल, अप्रैल 2005 में भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने सीमापार बस सेवा की शुरुआत की थी. उड़ी इस सेवा का अहम ठिकाना है, क्योंकि वह भारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को बांटने वाली नियंत्रण रेखा से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है.

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भारत और पाकिस्तान के विभाजन से पहले उड़ी कारोबारियों के लिए अहम केंद्र था, ठीक उसी तरह से जिस तरह से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़्ज़फराबाद और रावलपिंडी हुआ करते थे.

यह इलाका बेहद ख़ूबसूरत है, झेलम नदी की शांति इस इलाके की ख़ूबसूरती को और बढ़ाती है.

1948 के बाद से उड़ी सेना के गढ़ के तौर पर तब्दील होता गया. इसके पर्वतों पर आपको दूरबीन और हथियारों से लैस सेना के जवान नज़र आने लगे जो संदिग्ध गतिविधि पर नज़र रखते हुए देखे जा सकते थे.

अप्रैल 2005 में जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीमापार बस सेवा का उद्घाटन किया था, तब श्रीनगर से मुज़्ज़फराबाद के 130 किलोमीटर लंबे सफ़र के अहम केंद्र के तौर पर उड़ी की पुरानी अहमियत लौटने लगी थी.

सीमापार लोगों के आने जाने और उड़ी के रास्ते होने वाले कारोबार की तुलना स्थानीय लोग बर्लिन की मशहूर दीवार के गिरने से करने लगे थे.

हालांकि उसी साल उड़ी को भूकंप का सामना करना पड़ा था. इस भूकंप से सीमा के दोनों तरफ़ लोगों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था.

उस वक्त इस इलाके में अमन की तस्वीर भी दिखी थी, तब भारतीय सैनिकों ने बड़े बड़े पत्थरों में दबे पाकिस्तानी सैनिकों को बचाने का काम किया था. भूकंप की रिपोर्टिंग करते समय ये मेरी अपनी आंखों का देखा हुआ सच है.

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उस भूकंप में भारतीय सेना को अपने 54 जवान गंवाने पड़े थे, लेकिन अपने नुकसान की चिंता नहीं करते हुए भारतीय सेना ने सैकड़ों लोगों की जान बचाने का काम किया था.

स्थानीय लोग आज इस बात के लिए सेना का एहसान मानते हैं कि किस तरह से भारतीय सेना के जवानों ने अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए आम नागरिकों को बचाने का काम किया था.

ये वो लोग थे जो पहाड़ी बोलते थे, कश्मीरी बोलने वाली आबादी से अलग.

दोनों समुदायों - पहाड़ी और घाटी के मूल कश्मीरी लोगों को केवल धर्म आपस में जोड़ता है. उड़ी में रहने वाली एक लाख आबादी का 60 फ़ीसदी हिस्सा पहाड़ी समुदाय के लोगों का है.

इन लोगों के भारतीय सेना के साथ मधुर संबंध हैं. ये लोग भारतीय सेना के लिए कुली का काम करते रहे हैं.

जबकि कश्मीरी मूल के अन्य लोगों और सेना आपस में एक दूसरे को संदेह के साथ देखते रहे हैं.

भारत प्रशासित कश्मीर में कश्मीरी मुसलमानों पर नियंत्रण रेखा के पार से आने वाले चरमपंथियों को आश्रय देने का संदेह किया जाता रहा है.

दरअसल, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से घुसपैठ के लिए उड़ी और उसके दर्रे आदर्श रास्ते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि उड़ी में बहुत बर्फ़बारी नहीं होती और इसका मौसम बाक़ी कश्मीर घाटी की तुलना में गर्म रहता है.

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ऐसे में ज़ाहिर है कि रविवार को हुए चरमपंथी हमले के बाद संदेह की स्थिति बढ़ेगी. सेना के जवान ग़ुस्से में हैं जबकि स्थानीय लोग भयभीत नज़र आ रहे हैं.

सेना के जवानों के चेहरों पर विश्वासघात की भावना नज़र आती है जबकि स्थानीय लोगों को जवाबी हिंसा का डर सता रहा है.

उड़ी हमले के बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा है और इससे दोनों तरफ से गोलीबारी भी बढ़ सकती है.

नवंबर 2003 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम होने से पहले इलाके की स्थिति ऐसी ही थी. हालांकि उड़ी में बढ़ते तनाव और परेशान करने वाली वास्तविकताओं के बीच झेलम नदी का प्रवाह शांत और स्थिर बना हुआ है.

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