'समाजवादी घमासान'-किसे नफ़ा किसे नुकसान

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समाजवादी पार्टी के अंदर मचा घमासान थमा जरूर है, लेकिन पार्टी के अंदर उथलपुथल का दौर बना हुआ है. पार्टी से जुड़ा सबसे ताज़ा मामला ये है कि जिस शख़्स को राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव बाहरी व्यक्ति बता रहे थे, उन्हीं अमर सिंह को मुलायम सिंह ने पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त कर दिया है.

पहली नज़र में देखें तो ऐसा लगता है कि इस पूरे घमासान के अहम किरदारों में सबको संतुष्ट रखने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में एक नज़र डाल लेते हैं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और इस घमासान के बाद उनके नफ़े नुकसान की.

अखिलेश यादव: अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हुए हैं, हालांकि इस पूरे विवाद में उन्हें राज्य में पार्टी प्रमुख का पद गंवाना पड़ा है. दरअसल इस पूरे विवाद के केंद्र में वही रहे हैं. दैनिक हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशिशेखर कहते हैं, "समाजवादी पार्टी परिवर्तन के दौर से गुजर रही है. नेता जी सर्वमान्य नेता हैं और उन्होंने अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया. अब पांच साल पूरे होने वाले हैं, अखिलेश मुक्कमल मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे हैं. काम से भी और छवि के लिहाज से भी."

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उत्तर प्रदेश की राजनीति की नब्ज को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "इस पूरे विवाद में तीन बात ही उभर कर समाने आ रही है. अखिलेश मुख्यमंत्री बने हुए हैं. उन्हें पार्टी की संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है. पीडब्ल्यूडी विभाग उन्होंने शिवपाल सिंह यादव को नहीं लौटाया. ये तीनों तथ्य बताते हैं कि अखिलेश यादव इस विवाद में मज़बूत होकर उभरे हैं."

हालांकि दूसरी ओर अखिलेश यादव खुले तौर पर मीडिया में ये कह चुके हैं कि ये उनका इम्तिहान है और उन्हें चुनाव में टिकट देने का हक मिलना चाहिए. यानी प्रदेश अध्यक्ष पद गंवाने का मलाल भी उन्हें है. लेकिन अंबिकानंद सहाय दूसरी बात कहते हैं, "आप देखिए कि लोग क्या देख रहे हैं, भतीजा चाचा से मिलने जाता है, पांव छूकर मिलता है. चाची के पांव छूता है. चचेरे भाई को गले लगाकर मिलता है. इन सबसे अखिलेश की छवि को ही फ़ायदा पहुंचता है."

मुलायम सिंह यादव: समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव को समाजवादी पार्टी के अंदर पहली बार इतने बड़े विरोध का सामना करना पड़ा है. पार्टी कार्यकर्ताओं का विरोध झेलना पड़ा है. जिस पार्टी के अंदर उनका संकेत आदेश होता था, उसी पार्टी के अंदर अखिलेश ने उनकी पसंद के मंत्री को बर्ख़ास्त कर दिया.

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इतना ही नहीं शिवपाल सिंह यादव ने उनके मना करने के बाद पार्टी के सभी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया. मुलायम सिंह को अपना दर्द कार्यकर्ताओं को बताना पड़ा कि वे किन वजहों से प्रधानमंत्री नहीं बन पाए. अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "मुलायम सिंह मंझे हुए नेता हैं. लेकिन वे जिस उम्र में पहुंच गए हैं, वहां उनके सामने अतीत भी है और वे भविष्य की ओर देख रहे हैं. जब अतीत की ओर देखते हैं तो शिवपाल, अमर सिंह उन्हें याद आते हैं और जब भविष्य की ओर देखते हैं तो उन्हें अखिलेश ही नज़र आते हैं."

लेकिन इस पूरे विवाद से ये भी साफ़ है कि वे सबको साथ ले कर चलने की कोशिश कर रहे हैं. शशिशेखर बताते हैं, "इसके लिए नेताजी की तारीफ़ करनी होगी. आप करूणानिधि को देखें या बाल ठाकरे को. उन्होंने पहले ही तय कर दिया था कि मेरे बाद मेरा वारिस कौन होगा. लेकिन मुलायम सबको साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं, इसमें बर्तन खटकने जैसी स्थिति भी आती है."

शिवपाल सिंह यादव: मुलायम सिंह के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद का ज़िम्मा मिला है. यानी विधानसभा चुनाव के दौरान उम्मीदवारों को तय करने में उनकी भूमिका अहम होगी. जिस तरह से अखिलेश यादव ने झटके से उनसे मंत्रालय छीन लिए उससे भी पार्टी के अंदर उनकी छवि कमज़ोर हुई है, लेकिन इन सबके बाद शिवपाल ज़ोरदार वापसी करने में कामयाब रहे हैं. हालांकि वापसी में उन्हें लोक निर्माण विभाग जैसा अहम मंत्रालय नहीं मिला.

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अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "शिवपाल जी को जो तमाम मंत्रालय मिले हैं, उसका पूरा बजट मिलाकर भी लोक निर्माण विभाग जितना नहीं पहुंचता."

बावजूद इसके शिवपाल अपने समर्थकों को दो संदेश देने में कामयाब रहे हैं, पहला ये कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का उन्हें पूरा समर्थन हासिल है और वे पार्टी के अंदर जो भी करते रहे हैं, वो नेताजी के निर्देश पर ही करते रहे हैं.

रामगोपाल यादव: इस पूरे विवाद में रामगोपाल यादव अखिलेश यादव के समर्थक बनकर उभरे. उन्होंने ना केवल अखिलेश यादव के पक्ष में सार्वजनिक बयान दिए बल्कि अमर सिंह को बाहरी आदमी भी बताया. लेकिन ऐसा लगता है कि मुलायम ने जो समझौते का रास्ता निकाला, उसमें रामगोपाल यादव की कोई अहम भूमिका नहीं रही. जिस दिन मुलायम पार्टी से जुड़े बड़े फ़ैसले ले रहे थे, उस दिन रामगोपाल सैफई में थे.

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शिवपाल यादव ने प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद जो पहली कार्रवाई की है, उसमें रामगोपाल के भांजे और विधानपरिषद के सदस्य अरविंद सिंह यादव को पार्टी से छह साल के लिए बाहर निकाल दिया है. लेकिन शशि शेखर ऐसा नहीं मानते. वे बताते हैं, "अगर अरविंद, रामगोपाल के भांजे हुए तो वे शिवपाल के भी भांजे हुए ना. मुलायम के भी. इतना बड़ा परिवार और कुनबा हो तो सबको साथ लेकर चलना आसान नहीं होता."

अमर सिंह: इस पूरे विवाद में अमर सिंह को खलनायक की तरह देखा जाता रहा. माना जाता रहा कि उन्होंने ही चाचा-भतीजे में आग लगाई है. अखिलेश ने संकेत संकेत में इशारा किया कि किसी बाहरी व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. बावजूद इसके अमर सिंह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हैं.

अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "दरअसल मुलायम उन लोगों को कभी नहीं भूलते जो उनके मुश्किल वक्त में साथ दे चुके होते हैं. इसलिए वे अमर सिंह को पार्टी में लाए और अब अहम ज़िम्मेदारी भी सौंपी है."

वरिष्ठ पत्रकार शशिशेखर कहते हैं, "राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है. अमर सिंह नेता जी के भरोसेमंद हैं, जब चुनाव नज़दीक हो तो किसी नए व्यक्ति की जगह भरोसेमंद आदमी ही बेहतर है."

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हालांकि ये भी तय है कि अमर सिंह राज्य में उस पावर को एन्जवाए नहीं कर पाएंगे जो मुलायम के मुख्यमंत्री रहते हुए कर पाते.

वैसे नोबल पुरस्कार विजेता लेखक पर्ल एस बक ने काफी पहले लिखा था कि हर युग में, हर काल में जब युवा और पुरानी पीढ़ी के बीच जंग छिड़ती है तो जीत युवा पीढ़ी की ही होती है, क्योंकि युवा पीढ़ी असंभव टॉस्क ना केवल ठान लेती है बल्कि उसे पूरा करके दिखाती है.

हालांकि अंबिकानंद सहाय ये मानते हैं कि इस पूरे विवाद से आने वाले विधासभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी को नुकसान हो सकता है, लेकिन अखिलेश यादव की छवि को फ़ायदा हुआ है.