'घूंघट से लाज तो ख़त्म नहीं हो जाती'

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विशेश्वर महतो झारखंड की राजधानी रांची से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर सोसो गांव के रहने वाले हैं.

हमने उनसे पूछा था कि क्या उनके गांव के घरों में शौचालय नहीं हैं?

वो बताने लगे, "क्या बताएं, बहू- भावज या बेटी शौच के लिए बैठी होती हैं, ढिठई तो नहीं कर सकते, बस सिर झुकाकर, नज़रें छिपाकर गुज़र जाते हैं. वो लोग भी असहज हो जाती हैं. घूंघट भर डाल लेने से लाज तो ख़त्म नहीं हो जाती".

वो कहते हैं, "तभी तो कई मौक़े पर महिलाएं पूछती हैं कि क्या हुआ शौचालय निर्माण का? कब तक काग़ज़ भरे जाते रहेंगे और सर्वे होता रहेगा.''

उनका कहना है कि बारिश में अक्सर बच्चे घर के सामने या गली में ही शौच करते दिख जाएंगे, ऐसे में दुर्गंध और गंदगी तो फैलेगी ही.

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क्या लोग इसके लिए ख़ुद अपने पैसे नहीं लगाते? इस सवाल पर वे कहते हैं कि कई घरों में खाने को तो जुटता नहीं, शौचालय बनाने के लिए हज़ारों रुपए कहां से खर्च करेंगे.

हाल ही में केंद्र सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की सर्वेक्षण रिपोर्ट में पता चला है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता की सूची में झारखंड देश भर में सबसे फिसड्डी है.

यदि आप झारखंड के ग्रामीण और क़स्बाई इलाक़ों में जाएं तो गांव के गांव ऐसे दिखेंगे जहां घरों में शौचालय नहीं है.

हालांकि गंदगी पर आई ताज़ा रिपोर्ट के बाद नए सिरे से समीक्षा बैठकों का दौर शुरू हुआ है.

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सोसो गांव की ही पंचायत प्रतिनिधि बेलवती देवी बताती हैं कि शौचालय के मामले में उनका पूरा पंचायत ही पीछे है.

वो बताती हैं, "अब ज़माना बदल रहा है, शादी ब्याह के रिश्ते जोड़ने के समय पूछा जाता है कि घर, गांव में शौचालय है या नहीं. अब आप ही बताएं कि यही हाल रहा तो कौन हमारे गांव में अपनी लड़की की शादी करेगा?"

आंकड़ों के मुताबिक़ झारखंड के 263 प्रखंडों में से महज़ छह प्रखंडों को खुले में शौच से मुक्त कराया जा सका है.

यहां ग्रामीण इलाक़ों में तमाम कोशिशों के बाद भी केवल 17.7 फ़ीसदी घरों में शौचालय का निर्माण हो सका है, जबकि सरकार शौचालय बनवाने के लिए बारह हज़ार रुपए का अनुदान देती है.

अब सरकार ने 'शौचालय बनाएं स्वाभिमान से, ज़िदंगी जियें शान से' का भी नारा दिया है. इसका मक़सद यह है कि लोग ख़ुद शौचालय बनवाने में दिलचस्पी दिखाएं.

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पेयजल स्वच्छता विभाग के सचिव एपी सिंह कहते हैं, "बेशक यह राज्य स्वच्छता के मामले में पीछे है लेकिन हालात बदलने के लिए हमारी कोशिशें जारी हैं. अब ग्रामीण स्वच्छता मिशन का भी गठन हो गया है. इस साल के अक्तूबर महीने तक पंद्रह प्रखंडों को खुले में शौच से मुक्त कराया जा सकेगा".

उनका कहना है कि एनएसएसओ के सर्वेक्षण के बाद सूबे में क़रीब साढ़े चार लाख़ शौचालय बनवाए गए हैं.

महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली कोडरमा ज़िला परिषद की अध्यक्ष शालिनी गुप्ता सरकारी कोशिशों पर सवाल खड़े करती हैं.

वो कहती हैं कि ज़मीनी हक़ीक़त को समझने और लोगों की आदत को बदलने के लिए अभियान चलाना ज़्यादा ज़रूरी है, जबकि झारखंड में सिर्फ शौचालय निर्माण के लक्ष्य को हासिल करने का काम हो रहा है.

उनका कहना है, "गांवों में खुले में शौच महिलाओं के लिए गप्पें करने का एक ज़रिया भी है. जबकि पठारी और जंगलों की तराई में बसे गांवों के लोगों के ख़्याल खुले में शौच करने के होते हैं".

हम हालात जानने दूर दराज़ के कई गांवो में गए तो पता चला कि मुश्किलें और भी हैं.

बंगाल जाने के रास्ते चंदराटोला के अधिकतर घरों में सरकारी मदद से शौचालय का निर्माण तो हो गया है, लेकिन बहुत से लोग इसका इस्तेमाल नहीं करते.

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एक बुज़ुर्ग जितू मुंडा कहते हैं कि पानी होगा तभी लोग शौचालय जा पाएंगे.

खूंटी के एक सुदूर गांव की रूपा देवी कहती हैं कि पीने के पानी का इंतज़ाम करने के लिए मीलों दूर जाना होता है, तो शौचालय के लिए पानी कहां से आएगा?

झारखंड के दस हज़ार सरकारी स्कूलों में भी शौचालयों का अभाव है और हाल ही में झारखंड हाइकोर्ट ने शौचालय को लेकर अधिकारियों को सख़्त निर्देश भी दिए हैं.

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अधिकारियों के मुताबिक़ जहां शौचालय बनाए गए हैं, उनमें पानी और सफ़ाई को लेकर जांच कराई जाएगी.

दरअसल राज्य के सैंकड़ों स्कूलों में शौचालय बनाने का काम तो हो गया, लेकिन साफ़- सफ़ाई के बिना उनके दरवाज़े पर ताले लटकते रहते हैं.

झारखंड में 32 साल बाद 2010 में और फिर साल 2015 में पंचायत चुनाव हुए थे. दोनों चुनावों में क़रीब 57 फीसदी महिलाएं जीती हैं. लिहाजा स्वच्छता पर महिलाओं का ज़्यादा ज़ोर है.

दर्जनों पंचायतों में महिला प्रतिनिधियों का पहला लक्ष्य झारखंड के नक्शे पर लगे इस दाग़ को मिटाने की है.

सिमडेगा की अनिबा बा कहती हैं कि आदिवासी इलाक़े में महिलाएं अब जागरूक होने लगी हैं, लेकिन हालात बदलने में वक़्त लग सकता है.

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