भारत और पाकिस्तान की नाक सबसे लंबी

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दुनिया में सबसे लंबी नाक किसकी? ज़ाहिर है भारत और पाकिस्तान की.

दुनिया में भारत और पाकिस्तान जैसी दूसरी मिसाल नहीं है, जो दुनिया की दूसरी और सातवीं सबसे बड़ी सेना इसलिए रखते हैं, ताकि इस दुनिया के 25 फ़ीसद ग़रीबों की रक्षा कर सकें.

ये रक्षा इतनी क़ीमती है कि उसके लिए हथियार ख़रीदने वाला पहला और दसवां बड़ा देश और एटम बमों के ढेर लगाना भी कोई महंगा सौदा नहीं है.

इसके पीछे वही सोच है कि बाहुबली का सिर कट जाए, पर नाक न कटे.

पश्चिमी देश परमाणु युद्ध से इसलिए डरते हैं कि एक भी एटम बम चल गया तो 10-15 लाख़ पढ़े-लिखे लोग पहले ही धमाके में मर जाएंगे.

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लेकिन हमें क्या आपत्ति, अगर दिल्ली से कोई बम चले या लाहौर से कोई परमाणु मिसाइल उड़े.

ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? चालीस पचास लाख़ बेरोज़गार या भूखे नंगे ही तो ये धरती खाली करेंगे. इनका वैसे भी मरना क्या और जीना क्या?

इसलिए जब कोई जीनियस प्राइम टाइम एंकर मुंबई के किसी एयर कंडीशन स्टूडियो में बैठकर टीआरपी के लाँचर में अपनी जीभ का मिसाइल रख कर चलाता है कि चढ़ दौड़ो... राम भली करेगा.

या फिर इस्लामाबाद की किसी बैठक में कोई बावला बुद्धिजीवी या कोई टकला मंत्री कहता है कि हमने भी चूड़ियां नहीं पहन रखीं, उड़ा देंगे इनको. तो इसके पीछे यही सोच तो होती है कि ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? चालीस पचाल लाख़ या हद एक करोड़ कीड़े-मकोड़े जैसे जीवित ही तो ख़त्म होंगे. दस साल में फिर इससे ज़्यादा पैदा हो जाएंगे.

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ऐसे में जब मेरी नज़र टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग पर पड़ती है तो यक़ीन हो जाता है कि हम जैसों का ज़ोर इस पर है कि किस तरह दूसरे की नाक एक बार फिर से रगड़ दी जाए.

इससे फ़ुर्सत मिले तो सोचें कि जिस उपमहाद्वीप में दुनिया के 25 फ़ीसद यानी पौने दो अरब इंसान बसते हैं, उसकी हालत ये है कि दुनिया की टॉप दो सौ यूनिवर्सिटी में यहां की एक भी यूनिवर्सिटी नहीं है.

वहीं दुनिया की टॉप एक हज़ार यूनिवर्सिटी में सार्क के आठ में से सिर्फ़ तीन देशों के नाम हैं. जिसमें श्रीलंका की केवल एक, पाकिस्तान की सात और भारत की 31 यूनिवर्सिटी शामिल है.

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हां कोई पांच साल के बच्चों की मौत, सेहत और शिक्षा की सबसे कम सुविधाएं, आतंकवाद, बलात्कार, अल्पसंख्यकों के साथ बुरा सुलूक या फिर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, गुंडाराज, नॉन स्टेट एक्टिंग में हमारी तरह टॉप-10, टॉप-20 में वर्ल्ड रैंकिंग तक पहुंच कर दिखाएं तो मानें.

इसलिए टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड रैंकिंग जैसे तमाशों से दुखी होने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं. जब हम एक दूसरे से निपट लेंगे, तो शिक्षा, बीमारी, रोज़गार जैसे मामूली मुद्दों से भी निपटारे पर भी ध्यान दे लेंगे.

दुनिया को हमारे लिए चिंतित होने या हमारे मसले में टांग अड़ाने की ज़रूरत नहीं है और अगर टाइम्स हायर एजुकेशन जैसी रिपोर्टों ने ज़्यादा तंग करने की कोशिश को तो फिर सुन लो...दूध मांगोगे तो खीर देंगे, शिक्षा मांगोगे तो चीर देंगे.

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