क्या मराठा प्रदर्शन में ओबीसी से संघर्ष के बीज हैं?

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महाराष्ट्र में मराठा समुदाय अपनी मांगों के साथ राज्य के अलग-अलग इलाक़ों में प्रदर्शन कर रहा है.

इसमें दूसरी मांगों के साथ समुदाय को आरक्षण दिए जाने की मांग भी शामिल है. अन्य पिछड़ा वर्ग मराठों के आरक्षण की मांग का पहले भी विरोध करता रहा है.

महाराष्ट्र में अन्य पिछड़ा वर्ग क़रीब 356 जातियों में विभाजित है और इन्हें 19 फ़ीसदी आरक्षण मिलता है.

भारतीय जनता पार्टी के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के छगन भुजबल ने पार्टी लाइन के परे जाकर आपस में हाथ मिला कर ओबीसी वर्ग में मराठों को शामिल करने का विरोध किया था.

मुंडे का निधन दो साल पहले हुआ था और इसके बाद छगन भुजबल आय से अधिक संपत्ति जमा करने के मामले में सरकारी जांच की चपेट में आए तो महाराष्ट्र की राजनीति में ओबीसी को राजनीतिक नेतृत्व के संकट से गुजरना पड़ा.

बीते सप्ताह गोपीनाथ मुंडे की बेटी और देवेंद्र फडणवीस कैबिनेट की मंत्री पंकजा मुंडे बीमार भुजबल से मिलने जेजे अस्पताल पहुंचीं. इससे मराठा मुद्दे पर ओबीसी नेताओं की नेटवर्किंग की अटकलें शुरू हो गई हैं.

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हालांकि अभी ये कहना ज़ल्दबाज़ी होगी कि क्या ओबीसी मराठों के ख़िलाफ़ संघर्ष पर उतारू होंगे.

मराठों का प्रदर्शन चाहे संगठित तरीक़े से हो रहा हो, लेकिन सरकार ने अभी तक उन्हें आरक्षण देने के बाबत कोई संकेत नहीं दिया है.

दूसरी तरफ़ ओबीसी वर्ग में सैकड़ों जातियां हैं और इनके लिए मराठों की तरह एक प्रदर्शन करना आसान नहीं होगा. इसके अलावा संसाधन की दिक्क़त भी सामने आ सकती है.

1931 में अंतिम बार हुई जातिगत जनगणना के मुताबिक़ देश की कुल आबादी का 52 फ़ीसदी हिस्सा अति पिछड़ा वर्ग का था.

इस वर्ग में परंपरागत तौर पर किसान, कुम्हार, बुनकर, लोहार, माली, कारीगर आदि गिने जाते हैं लेकिन दलित इनका हिसा नहीं हैं.

शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े वर्ग को मंडल आयोग के भीतर आरक्षण मिला. सालाना छह लाख रूपये से कम आमदनी वाले ओबीसी परिवारों को इस आरक्षण का फ़ायदा मिलता है.

महाराष्ट्र में ओबीसी वर्ग की राजनीति को तब गति मिली जब मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को सरकार ने लागू किया. हालांकि ओबीसी के राजनीतिक नेतृत्व में कमोबेश मुख्यधारा की सभी पार्टियों के नेता शामिल हैं.

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Image caption पंकजा मुंडे और छगन भुजबल की मुलाक़ात को महज़ औपचारिकता नहीं माना जा रहा.

ओबीसी वर्ग के विभिन्न समुदायों में एक सशक्त नेटवर्क के नहीं होने के चलते वे सब एक मंच पर नहीं हैं, ज़्यादातर नेताओं का आधार महज़ अपनी जातियों में है. भुजबल ने दूसरी जातियों तक पहुंच कर ओबीसी के अखिल भारतीय स्तर का नेता बनने की कोशिश ज़रूर की लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हुए.

वहीं मुंडे को बीजेपी में जगह मिल गई, कुछ तो अपने भाषण देने की कला की वजह और कुछ बीजेपी के हाई प्रोफ़ाइल नेता प्रमोद महाजन के रिश्तेदार होने की वजह से.

ओबीसी मराठों का विरोध तभी करेंगे जब वो इससे सीधे तौर पर आहत होंगे.

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वैसे पंकजा-भुजबल की मुलाक़ात को महज़ शिष्टाचार की मुलाकात बताया जा रहा है, लेकिन यह ओबीसी नेताओं के बीच एकता की शुरुआत का संकेत भी है.

भुजबल के समर्थक, उनके गृहक्षेत्र नासिक में तीन अक्टूबर को रैली का आयोजन कर रहे हैं. यह रैली बीमार नेता के समर्थन और उन्हें कथित तौर पर राजनीतिक वजहों से पीड़ित किए जाने के विरोध में किया जा रहा है.

इस वक़्त महाराष्ट्र में ओबीसी के दायरे को विस्तार देने का सच अपनी जगह क़ायम है. तो एक सच ये भी है कि मराठा बहुत ज़्यादा प्रभावशाली हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)