'उत्साही गोरक्षकों' का अत्याचार बढ़ता ही गया

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Image caption मोहम्मद अख़लाक़

दादरी के पास बिसाहड़ा गांव में गोमांस रखने के शक में मारे गए अखलाक की मौत को एक साल हो गए हैं और इन एक सालों में गोरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों पर हमले बढ़े ही हैं.

28 सितंबर, 2015. उत्तर प्रदेश के दादरी इलाक़े का बिसाहड़ा गांव.

शाम को पास के एक मंदिर के लाउड स्पीकर से कोई घोषणा करता है, "बकरीद के मौके पर मुहम्मद अख़लाक़ के परिवार ने गाय की हत्या की है और गोमांस खाया है. अब भी उसके घर में गोमांस रखा है."

थोड़ी देर बाद लाठी-सरिया से लैस भीड़ मोहम्मद अख़लाक़ के घर धावा बोलती है. क़रीब 50 साल के अखलाक की इतनी पिटाई होती है कि उनकी जान चली जाती है.

उनके 20 साल के बेटे दानिश को गम्भीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है. उनकी पत्नी और बूढ़ी मां को भी नहीं बख़्शा जाता है.

गोहत्या के शक में अख़लाक़ की हत्या देश-विदेश के मीडिया की सुर्खियां बनती है.

'बीफ़' खाने की आज़ादी और गोवध क़ानून पर सख़्ती से अमल की तीखी बहसें ड्रॉइंग रूम से लेकर सोशल साइटों पर छा जाती हैं.

सेकुलर या बहुलतावाद के समर्थक इस हत्या को तर्कवादियों एम कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे की हत्याओं से जोड़कर मोदी सरकार में बढ़ती 'असहिष्णुता' और 'अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश' के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आते हैं.

अलग अलग भाषाओं के साहित्यकारों, रंगकर्मियों, इतिहासकारों, फिल्मकारों-कलाकारों, आदि के सामूहिक सम्मान वापसी, संस्थानों से इस्तीफ़ों और प्रदर्शनों से अपूर्व प्रतिरोध होता है.

इसके मुक़ाबले सरकार समर्थकों का जमावड़ा भी लगता है.

लेकिन धीरे-धीरे यह प्रतिरोध ठंडा पड़ने लगता है. जो मुद्दा शांत नहीं होता, वह है अख़लाक़ की हत्या का कारण या बहाना - गोहत्या और गोमांस खाने के आरोप.

अख़लाक़ की हत्या के ठीक एक साल बाद हम पाते हैं कि 'गोहत्या' का विवाद और भी हिंसक रूप लेता जा रहा है.

साल भर में इसी आरोप में 'गोरक्षकों' के हाथों कम से कम तीन लोगों की हत्या हो चुकी है और दर्जनों लोगों की निर्मम पिटाई हुई है.

जगह-जगह रातों रात 'गोरक्षक', 'गोसेवक' और उनकी समितियां उग आई हैं.

अकेले दादरी इलाके में ही दर्जनों 'गोरक्षक समितियों' का पता चला है. उनके अभियानों, छापों से होने वाली झड़पों की खबरें आती रहती हैं.

इन कथित गोरक्षकों के हमलों का शिकार दलित और मुस्लिम हो रहे हैं.

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मरे जानवरों की खाल उतारते दलितों पर गोहत्या का आरोप लगाया जाता है. मुसलमानों पर गोमांस खाने का आरोप लगाना बहुत आसान है.

जम्मू-कश्मीर के एक निर्दलीय विधायक पर 'बीफ़-पार्टी' करने का आरोप लगा कर भारी हंगामा किया गया था.

अक्टूबर 2015 में दिल्ली के केरल हाउस में बीफ़ परोसे जाने की शिकायत आई. इसके बाद वहां पुलिस के छापे से लेकर जुलाई 2016 में गुजरात के उना में गोहत्या के आरोप में दलित युवकों को नंगा कर लोहे की रॉड से पीटे जाने का मामला आया.

इन दोनों मामलों के बीच पूरे देश में हिंदूवादी संगठनों की ज़्यादतियों के इतने मामले सामने आए कि भाजपा को इसके राजनीतिक नतीजों का डर सताने लगा है.

परिणाम ये हुआ कि अख़लाक़ की हत्या की निंदा करने की मांग के बावजूद चुप रहने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने करीब ग्यारह महीने बाद अपनी चुप्पी तोड़ी और अधिसंख्य गोरक्षकों को असामाजिक और फर्जी बताया.

उन्हें यहां तक कहना पड़ा कि 80 फ़ीसदी गोरक्षक फ़र्जी हैं. ये रात में अवैध काम करते हैं और दिन में गोरक्षा के नाम पर अपनी दुकानें चलाते हैं.

प्रधानमंत्री की इस तीखी प्रतिक्रिया के कारण साफ़ हैं. पिछले एक साल में गुजरात, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखण्ड से लेकर मणिपुर और जम्मू-कश्मीर तक तथाकथित गोरक्षकों के अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं.

इसका बड़ा राजनीतिक नुक़सान साफ़ दिखाई दे रहा है.

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भाजपा के नेताओं ने अख़लाक़ की हत्या के निंदा नहीं की थी. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था, "हम यह कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि इस देश में गाएं मारी जाएं". संस्कृति मंत्री महेश शर्मा का बयान था, "अख़लाक़ की मौत एक दुर्घटना है."

भाजपा चुनाव में 'गौ और गोवंश की रक्षा को बढ़ावा और मजबूती देने' का वादा करती रही है. इसलिए भी अतिउत्साही गोरक्षकों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है. प्रधानमंत्री की निंदा के बावजूद उनके अभियान रुके नहीं हैं.

सच यह है कि उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत कई राज्यों के विधान सभा चुनावों के लिए दलितों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही भाजपा को कथित गोरक्षकों के अत्याचारों के कारण दलितों के गुस्से का सामना करना पड़ा है.

गोमांस के संदेह पर घरों में छापों, बिरयानी के ठेलों से बोटी के नमूने एकत्र करने, जानवरों को ढो रहे ट्रकों को रोक कर ड्राइवरों की पिटाई जैसे मामले सामने आते रहे हैं.

खाल निकालने के लिए मरी गायों को ले जा रहे दलित युवकों पर गुजरात के उना कस्बे में बर्बर अत्याचार किए गए.

इसका देशव्यापी विरोध हुआ. दलितों ने भी बड़े पैमाने पर एकजुटता दिखाई और विरोध प्रदर्शन किए.

कई जगह तो दलितों ने मरे जानवरों को उठाने तक से इनकार कर दिया. सुरेंद्र नगर में 80 गायों के शवों को इसी कारण दफ़नाना पड़ा.

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Image caption ऊना में दलितों की पिटाई के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

गोहत्या भारत में हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रहा है. ज़्यादातर राज्यों में गोहत्या निषेध क़ानून लागू है. केरल, पश्चिम बंगाल और असम को छोड़कर उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों में गोहत्या पर रोक नहीं है.

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और असम में 'वध योग्य' यानी और किसी भी काम के लिए अनुपयुक्त और बिहार में 15 वर्ष से ऊपर की गाएं काटी जा सकती हैं.

गो हत्या निषेध में गोवंश भी शामिल है. इसमें बछड़े, बैल और सांड़ आते हैं. भैंसें भारत में आधिकारिक रूप से काटी जाती हैं.

सच तो यह है कि भैस के मांस यानी बीफ़ के निर्यात में भारत विश्व में पहले स्थान पर है.

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ निर्यात विकास प्राधिकरण के मुताबिक़, 1969 में शुरू बीफ़ का निर्यात 2015-16 में दो खरब 66 अरब 81 करोड़ 56 लाख रुपए तक पहुंच गया है.

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भारतीय भैंस का मांस कम वसा और कॉलेस्ट्रॉल के कारण साठ से ज्यादा देशों में काफ़ी पसंद किया जाता है.

देश के विभिन्न नगर निकायों में रजिस्टर्ड बूचड़खानों की संख्या 4,000 और गैर-रजिस्टर्ड की संख्या 25,000 बताई गई है.

यह भी सच है कि गोहत्या पर क़ानूनी रोक के बावजूद गोमांस के लिए चोरी-छुपे गायें काटी जाती हैं. भैसों के साथ-साथ गोवंश की तस्करी भी होती है.

कई प्रभावशाली लोग, हिंदू-मुसलमान दोनों, इस वैध-अवैध धंधे में शामिल हैं, जिन्हें पुलिस का संरक्षण मिलता है.

इस धंधे का धर्म और राजनीति से कोई संबंध नहीं है. लेकिन केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद यह धर्म और राजनीति दोनों से जोड़ दिया गया.

शांत पड़ीं गोरक्षा समितियां न केवल सक्रिय हो उठीं, बल्कि बड़ी संख्या में नई अति उत्साही समितियां खड़ी हो गईं. अख़लाक़ के घर हमला ऐसी ही समितियों की अति सक्रियता का नतीजा था.

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Image caption कथित गोरक्षकों का एक समूह

हमले के समय अख़लाक़ के घर से 'गोमांस' भी 'बरामद' किया गया था. शुरुआती जांच में राज्य सकार की प्रयोगशाला ने उसे बकरे का गोश्त बताया था. लेकिन बाद में मथुरा की सेण्ट्रल फॉरेन्सिक लैब ने उसे 'गाय या गोवंश' का मांस बताया.

इस रिपोर्ट के आधार पर बिसाहड़ा के कुछ लोग अदालत पहुंचे और कोर्ट के आदेश पर अख़लाक़ के परिवार वालों के ख़िलाफ़ 15 जुलाई 2016 को गोवध निषेध कानून में मुकदमा दर्ज किया गया.

अख़लाक़ के भाई जान मुहम्मद को छोड़कर बाकी सभी लोगों की गिरफ़्तारी पर अदालत ने रोक लगा दी. जान मुहम्मद भी बाहर ही हैं.

अब तक यह साबित नहीं हो सका है कि अख़लाक़ ने गोहत्या की थी. गोहत्या पर रोक के बावजूद गोमांस खाना उत्तर प्रदेश में ग़ैरक़ानूनी नहीं है.

भारत जैसे बहुलतावादी देश में किसी की रसोई या प्लेट में ताक-झांक करना और खान-पान के आधार पर या सिर्फ शक के आधार पर हमले करना क़ानून अपने हाथ में लेने के अलावा निजी आज़ादी के हनन के दायरे में ही आएगा.

समाज में बंटवारा बढ़ता जा रहा है. गायों की रक्षा तो नहीं ही हो पा रही है.

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