भारत के सार्क बैठक में न जाने का क्या होगा असर?

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Image caption 19वां सार्क सम्मेलन इस्लामाबाद में होनेवाला था

भारत नवंबर में इस्लामाबाद में होनेवाले सार्क सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले रहा है. ऐसी ही घोषणा बांग्लादेश ने भी की है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने एक ट्विट में कहा, ''क्षेत्रीय सहयोग और चरमपंथ एक साथ नहीं चल सकते, इसलिए भारत इस्लामाबाद सम्मेलन में शामिल नहीं होगा."

पाकिस्तान की राजधानी में नवंबर में सार्क के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक होनी है.

समझा जा रहा है कि भारत पठानकोट और उड़ी जैसे हमलों के बाद पाकिस्तान पर एक तरह का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है.

मीडिया में इस तरह की चर्चा है कि अफ़ग़ानिस्तान और भूटान भी सम्मेलन में हिस्सा न लेने का फ़ैसला कर सकते हैं.

संगठन के चार मुल्कों के सम्मेलन में शामिल न होने के बाद सार्क का कितना महत्व रह जाएगा?

इस मामले में विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है.

वरिष्ठ पत्रकार ज्योति मल्होत्रा का मानना है कि हालांकि सार्क सम्मेलन तो स्थगित हो जाएगा लेकिन भारत को ही आनेवाले दिनों में ये पहल करनी होगी कि क्षेत्रीय संबंधों में सुधार हो और व्यापार जैसे मुद्दों के लिए माहौल क़ायम हो सके.

वहीं कूटनीतिक मामलों के जानकार सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि सार्क यूं भी बहुत कारगर नहीं रह गया था, क्योंकि दोनों बड़े देश भारत और पाकिस्तान के तल्ख़ रिश्तों के कारण संगठन के मज़बूत बनने में कई अड़चनें आ रही थीं.

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Image caption पठानकोट हमला साल के शुरू में ही हुए सेना के बेस पर किया गया था

ज्योति मल्होत्रा का कहना है, "ये याद रखना होगा कि इस क्षेत्र की 150 करोड़ आबादी कहीं और नहीं जा रही है. हालांकि भारत ने आज चरमपंथ के मुद्दे पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश की है, लेकिन आने वाले दिनों में उसे एक लीडरशिप रोल अदा करना होगा और हालात को बेहतर बनाने के लिए क़दम उठाने होंगे."

उनका मानना है कि व्यापार या दूसरे तरह की संधियों के बारे में बातचीत के लिए सार्क जैसे सम्मेलन बहुत मायने रखते हैं.

ज्योति मल्होत्रा कहती हैं कि इससे पहले भी एक बार नेपाल में जब सार्क सम्मेलन होना था तो उसे स्थगित करना पड़ा था.

उधर वरदराजन मानते हैं, "सार्क का सम्मेलन इस्लामाबाद से हटाकर कहीं और नहीं किया जाएगा. हां सम्मेलन कुछ समय के लिए टल सकता है. मुझे लगता है कि भूटान का रूख़ वही होगा जो भारत का है. यदि अफ़ग़ानिस्तान भी बांग्लादेश की तरह वही क़दम उठाता है तो फिर इस्लामाबाद में सार्क सम्मेलन के होने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा."

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वरदराजन कहते हैं कि चाहे भारत ने सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने से मना किया है कि लेकिन इन बातों का पाकिस्तान को बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता है. पाकिस्तान सार्क को लेकर पहले भी बहुत उत्साहित नहीं रहा है.

वो कहते हैं- "सार्क में मज़बूती की जो कमी है वो दरअस्ल भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की वजह से है. इसमें ज्यादा ज़िम्मेदारी पाकिस्तान की रही है. अब भारत भी सार्क पर जो बात कह रहा है वो एक तरह से सार्क को रोकने वाली है, तो ये बहुत उत्साहजनक नहीं है."

वरदराजन कहते हैं- "जहाँ तक भारत और पाकिस्तान के बीच दो अरब डॉलर का सालाना व्यापार है उससे पांच गुना दुबई के ज़रिये दुसरे चैनेल से होता है. वो तो नहीं रुकेगा चाहे मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन का दर्जा जारी रहे या नहीं, उससे कोई बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ेगा."

सिद्धार्थ वरदराजन ये भी कहते हैं कि सार्क में शामिल होने का फ़ैसला भारत में शायद पहले ही ले लिया था, हालांकि इसका ऐलान अभी किया जा रहा है.

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