क्या आसान है पाकिस्तान को अलग थलग करना?

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जम्मू कश्मीर के उड़ी इलाक़े में भारतीय फ़ौज पर चरमपंथी हमले के बाद बार बार सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से अलग अलग तरीक़े से कहा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत ने पाकिस्तान को अलग थलग कर दिया है.

पर क्या पाकिस्तान को अलग थलग करना भारत के लिए आसान होगा?

ये सच है कि सोशल मीडिया में सक्रिय लोगों के एक हिस्से की बात सुनने पर सिर्फ़ युद्धोन्माद की आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं पर नरेंद्र मोदी सरकार ने इस युद्धोन्मादी सुर में सुर मिलाने की बजाए कूटनीतिक तरीक़ों से पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है.

पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बिसात पर मौजूद ताक़तवर मोहरों की पोज़ीशन देखते हुए ये इतना आसान भी नहीं है.

ये सही है कि भारत और अमरीका पहले के मुक़ाबले काफी क़रीब आ चुके हैं और अमरीका में अब भारत की पहले से अधिक चलती है.

लेकिन ये भी सही है कि चीन अब पाकिस्तान के अधिक क़रीब है और उभरता हुआ सुपर पावर भी. भारत की पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिशों में चीन खलल डाल सकता है.

पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मलेन में भारत के बाद अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश ने भी शामिल होने से इनकार कर दिया है लेकिन सार्क जैसे फोरम से अलग होने से पाकिस्तान की सेहत पर अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.

भारत के एक पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा कहते हैं कि भारत पाकिस्तान को अलग-थलग करे या न करे, पाकिस्तान अपने कारनामो से खुद ही अलग-थलग हो रहा है.

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वो कहते हैं, ''सच ये है कि सिवाय खाड़ी के देशों के सभी बड़ी एयरलाइन कंपनियों की उड़ानें पाकिस्तान को नहीं जातीं. क्रिकेट खेलने वाले देशों की टीमें पाकिस्तान का दौरा नहीं करतीं और अंतरराष्ट्रीय पर्यटक पाकिस्तान नहीं जाते.''

राजीव डोगरा कहते हैं कि 90 के दशक में पाकिस्तान एक आतंकवादी देश घोषित होते होते बचा. उनका कहना था, ''अब एक बार फिर ऐसा माहौल बन रहा है कि दुनिया मजबूर होकर पाकिस्तान को एक आतंकवादी देश घोषित कर दे''

लेकिन पाकिस्तान में नज़रिया एकदम अलग है.

पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक अयाज़ वज़ीर कहते हैं कि भारत पूरी तरह से कभी भी पाकिस्तान को अलग-थलग नहीं कर सकेगा.

उनका कहना है, ''पहला ये कि अगर भारत के कई दोस्त हैं तो पाकिस्तान के भी कई दोस्त हैं. दूसरे ये कि पाकिस्तान अब भी अमरीका का एक बड़ा मित्र है. एक कमज़ोर पाकिस्तान अमरीका के हित में नहीं है. चीन तो छोड़ें अमरीका भी पाकिस्तान को अलग-थलग नहीं होने देगा''

अयाज़ वज़ीर कहते हैं कि भारत की सोच ''बचकाना'' है. ''दोनों देशों के पास एक ही विकल्प है और वो है बात-चीत. बात करते रहना ही दोनो देशों के हित में है''.

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नब्बे के दशक में भी एक बार ऐसा लग रहा था कि अमरीका पाकिस्तान को एक आतंकवादी देश घोषित कर सकता है. उस समय पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कश्मीरी चरमपंथियों को प्रशिक्षण देने का इलज़ाम था. साथ ही पाकिस्तान पर भारतीय पंजाब में चरमपंथी हमले कराने का भी आरोप था.

उस समय मैं कुछ हफ़्तों के लिए अमरीका में था. मैंने अमरीका के स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश मंत्रालय) में दक्षिण एशिया डेस्क की एक महिला अधिकारी से पूछा कि क्या अमरीका पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ऐसा कड़ा क़दम उठा सकता है. उन्होंने ऑफ द रिकॉर्ड जवाब दिया ''नहीं''.

अमरीका की मजबूरी जताते हुए उन्होंने कहा, '' मध्य एशिया से पाकिस्तान होते हुए अफ़ग़ानिस्तान और ईरान पार करके तुर्की तक एक इस्लामिक क्रेसेंट यानी अर्धचंद्र बनता है. हम इस इस्लामी क्रेसेंट को तोड़ना चाहते हैं. पाकिस्तान हमारे लिए ये काम करता है. इसलिए हम इसे अपना एक अहम् साझेदार मानते हैं''

उनका ये भी कहना था कि भारत की शिकायत पर ''हमने इस्लामाबाद का हाथ ज़रूर मरोड़ा जिसके कारण पाकिस्तान ने मुज़फ़्फ़राबाद में कई चरमपंथ ट्रेनिंग खेमे बंद कर दिए. हम इससे अधिक भारत की मदद नहीं कर सकते ''.

क्या पाकिस्तान अमरीका के लिए आज भी उतना महत्वपूर्ण मित्र है? शायद नहीं. लेकिन पाकिस्तान पर अमरीका का असर आज भी उतना ही गहरा है जितना 90 के दशक में था.

इस पृष्ठभूमि में उड़ी चरमपंथी हमले के बाद नरेंद्र मोदी का ये कहना कि हम पाकिस्तान को कूटनीतिक तरीके से अलग-थलग करने की कोशिश करेंगे काफी कठिन साबित हो सकता है.

वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार मुहम्मद ज़ाहिद अपने एक लेख में कहते हैं कि नरेंद्र मोदी की कोशिशों को सफलता मिल सकती है लेकिन पाकिस्तान को अलग-थलग करना इतना आसान नहीं होगा.

दूसरी तरफ पाकिस्तान पर कड़ी नज़र रखने वाली अमरीकी बुद्धिजीवी क्रिस्टीन फेयर के अनुसार भारत के लिए पकिस्तान को केवल अलग-थलग करना काफी नहीं होगा. उन्होंने एक लेख में कहा कि केवल अलग-थलग करने से उनके अनुसार पाकिस्तान कश्मीर में चरमपंथ हमले बंद नहीं करेगा.

उनका कहना था कि भारत को चाहिए कि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उसके मित्र चीन को इस्तेमाल करे और उस पर आर्थिक चोट पहुंचाने की कोशिश करे. चीन पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान में भारी मात्रा में निवेश कर रहा है.