वो गांव जिसने जानवरों के संग रहना सीख लिया

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चारों तरफ घना जंगल, पहाड़ और जंगली जानवरों की डर पैदा करने वाली आवाज़ें.

लेकिन 10 साल की लखीप्रिया किसी पशु विशेषज्ञ की तरह जंगली जानवरों की आवाज़ सुनते ही बता देती है कि ये किसकी आवाज़ है.

ठीक इसी तरह आठ साल की सुष्मिता भी हाथी, तेंदुए और जंगली पशुओं की आवाज़ आसानी से पहचानती है.

जंगल से सटा असम का एक ऐसा गांव जहां के जंगली जानवरों से लोगों का सामना रोज़ होता हैं.

लखीप्रिया, सुष्मिता जैसे इस गांव के क़़रीब सभी बच्चों के दिन की शुरुआत जानवरों और पक्षियों की आवाज़ से होती है.

वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र के निकट पल बढ़ रहे इन बच्चों के खेल का विषय भी जंगली जानवरों के इर्द-गिर्द ही होता हैं.

शाम ढलने के बाद गांव में सन्नाटा छा जाता है, क्योंकि रात के समय इलाक़े में जंगली जानवरों की दहाड़ से आंतक फैल जाता है.

वन विभाग के हथियारबंद सुरक्षा गार्ड भी इस इलाक़े से बड़ी सावधानी से गुज़रते है. इस गांव को यहां बसाया गया है, जहां के लोगों की जान हमेशा जोखिम में रहती है.

लेकिन इनके लिए वन्य जीवों की हिफ़ाज़त किसी भी काम से बढ़कर है.

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वन्य जीवों और वनों की सुरक्षा को लेकर असम सरकार के उपाए भी कई मौक़ों पर काम नहीं आते.

लेकिन गोलाघाट ज़िले के प्रस्तावित संरक्षित वन अंचल देव पहाड़ से सटे नौ पथार गांव के लोग प्रकृति की रक्षा के लिए कोई भी जोखिम उठाने को तैयार रहते है.

नौ पथार गांव के निवासी खगेन चलिहा कहते हैं कि नुमालीगढ़ रिफ़ाइनरी की स्थापना के बाद 1993 में उन्हें मामूली मुआवज़ा देकर यहां बसाया गया था. गांव के तक़रीबन सारे लोग अपनी ज़मीन सरकार को सौंप यहां रहने चले आए.

शुरू में जंगल से सटे इस इलाक़े में परिवार के साथ रहना काफी मुश्किल काम था, लेकिन गांव वालों ने धीरे धीरे प्रकृति को अपने जीवन का अहम हिस्सा बना लिया. गांव के लोग वन्य जीवों और वनों की सुरक्षा को अपना धर्म मानते हैं.

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Image caption खगेन चलिहा.

देव पहाड़ के जंगलों में हाथी, तेंदुओं से लेकर तमाम तरह के हिंसक जानवर रहते है. कई बार ये जंगली जानवर इन ग्रामीणों के घर में भी घुस आते हैं, लेकिन ये लोग इन जानवरों को कभी नहीं मारते.

शायद यही वजह है कि इन जंगली जानवरों ने अब तक यहां के किसी भी ग्रामीण पर हमला नहीं किया. नौ पथार गांव के लोगों की सूझबूझ से वन्य जीवों और वनों के संरक्षण का काम आसान होता दिख रहा है.

नुमालीगढ़ टाउनशिप से सटे देव पहाड़ के 133.5 हेक्टर प्रस्तावित संरक्षित वन अंचल को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर दिया गया है.

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असम में 1980 के दशक में बड़े पैमाने पर हुए आंदोलन के बाद केंद्र सरकार के साथ 'असम समझौता' हुआ था. उसके तहत गोलाघाट ज़िले में नुमालीगढ़ रिफ़ाइनरी की स्थापना की गई.

लेकिन इसके बाद क्षेत्र में राज्य सरकार के सामने वन्य जीवों और प्रयावरण की रक्षा का काम काफी चुनौतीपूर्ण हो गया.

गोलाघाट डिवीज़न के रेंजर पी दास का कहना है कि वन विभाग के लोग अपनी ज़िम्मेदारी के अलावा इन ग्रामीणों की मदद से इस संरक्षित वनांचल में काम कर रहे हैं और इससे विभाग को काफ़ी फ़ायदा हुआ है.

वन्य जीवों और जंगलों की सुरक्षा में गांव के लोगों के योगदान को देखते हुए राज्य सरकार ने यहां सड़क बनवाने से लेकर स्कूल की व्यवस्था भी की है. बिजली से लेकर अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई गई हैं.

प्रदेश में वन्य जीवों की सुरक्षा के मामले में अब इस गांव की मिसाल दी जाती है. इसे पर्यावरण की रक्षा के लिए पुरस्कार भी दिया जा चुका है.

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