भारतीय नागरिक हैं हज़ारों निर्वासित तिब्बती

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"मुझे महसूस हो रहा है कि अब मैं एक पूर्ण और समान्य इंसान बन गया हूं. यह एक लंबे वक़्त से रूकी हुई आज़ादी थी. मूलभूत मानवाधिकार का मसला था जो अब हमारी ज़िंदगी को आसान और प्रैक्टिकल बनाएगा."

यह कहना है भारत में रह रहे तिब्बती मूल के लोबसंग वांगयाल का. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि तिब्बत को लेकर चल रही किसी लड़ाई के बाद ऐसा नतीजा सामने आया है. यह असल में भारतीय पासपोर्ट की लड़ाई है जो लोबसंग और दो और निर्वासित तिब्बतियों ने दिल्ली हाइकोर्ट में जीती है.

अब उन्हें भारतीय पासपोर्ट के लिए गृह मंत्रालय से किसी नागरिक प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है. उन्हें ही नहीं 26 जनवरी 1950 से एक जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे तमाम तिब्बतियों को आम भारतीय नागरिक की तरह भारतीय पासपोर्ट मिलेगा.

अब यह भी साफ़ हो गया है कि उन्हें आम भारतीय नागरिकों की तरह सभी हक़ मिलेंगे. मतलब वे भारत में ज़मीन भी खरीद सकते हैं. वोट तो बहुत से तिब्बती 2014 के लोकसभा चुनावों से ही दे रहे हैं.

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हालांकि ऐसा नहीं है कि यह एक ऐतिहासिक फ़ैसला है. ऐसा फ़ैसला दिल्ली हाइकोर्ट छह साल पहले नाम्गयाल डोलकर के मामले में भी दे चुका है. लेकिन मज़े की बात यह है कि विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय ने ख़ुद से ही यह मान लिया कि यह फ़ैसला केवल डोलकर पर ही लागू हेता है. अब दिल्ली हाइकोर्ट ने इसी फ़ैसले के आधार पर अपना निर्णय सुनाया है. साथ ही इस बात पर हैरानी जताई है कि डोलकर के मामले में साफ़ तौर पर दिशा-निर्देश के बावजूद भी कैसे इसे एक पर ही लागू माना गया.

असल में सारा मामला ये है कि अपनी ही ग़लत व्याख्या के कारण गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने तिब्बतियों के भारतीय नागरिक होने के मामले को उलझा रखा था.

इसके चलते उन्हें भारतीय पासपोर्ट नहीं जारी किया जाता था. गृह मंत्रालय की ओर से बार-बार यह कहा जाता था कि भारतीय सिटिजनशिप एक्ट की धारा (3) (1) (ए) के तहत वे सीधे भारतीय नागरिक नहीं माने जा सकते. उन्हें धारा 9 (2) के तहत भारतीय नागरिकता के लिए अलग से आवेदन देना होगा. इस आशय का एक पत्र भी बाकायदा 26 अगस्त 2011 को चुनाव आयोग को जारी किया था. इसी पत्र को आधार मानते हुए पासपोर्ट नहीं बन पा रहे थे. अब कोर्ट ने इस पत्र को भी इंडियन सिटिजनशिप एक्ट के एकदम उलट बताते हुए रद्द कर दिया है.

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तिब्बतियों के पासपोर्ट का मामला आज का नहीं है बल्कि पिछले छह साल से चल रहा है. इंडियन सिटिजनशिप एक्ट 1955 के सेक्शन (3) (1) (ए) के तहत साफ़ है कि 26 जनवरी 1950 और एक जुलाई 1987 के बीच भारत में पैदा होने वाले भारतीय नागरिक हैं.

इस बीच कर्नाटक हाइकोर्ट के एक फ़ैसले के आधार पर निर्वाचन आयोग ने एक आदेश जारी किया कि देश भर में उक्त अवधि के दौरान पैदा हुए सभी निर्वासित तिब्बतियों को मतदाता सूची में शामिल किया जाए. कइयों ने पंजीकरण भी करवाया और वोट भी डाले.

इस बीच धर्मशाला में रह रहे लोबसंग ने भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन किया तो नागरिता के सवाल पर आपत्ति उठ गया. कहा गया कि भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र लाओ.

गृह मंत्रालय में आवेदन दिया तो उनके अजीब तर्क थे. सिटिजनशिप एक्ट और निर्वाचन आयोग के पत्र के हवाले के बावजूद भी गृह मंत्रालय की ओर से आधा दर्जन जवाब का लब्बोलुआब यह था कि लोबसंग को नागरिकता के लिए सेक्शन 9 (2) के तहत अलग से आवेदन करना होगा, सेक्शन सेक्शन (3) (1) (ए) के आधार पर ही उन्हें भारतीय का नागरिक नहीं बनाया जा सकता.

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मंत्रालय की ओर से यह भी कहा गया कि तिब्बतियों को भारत में बाकायदा पहचान पत्र जारी होता है, वे ख़ुद को तिब्बती लिखते हैं,लिहाजा उन्हें सीधे भारतीय नागरिक नहीं बनाया जा सकता. आख़िर में लोबसंग मामला दिल्ली हाइकोर्ट ले गए. ऐसा ही मामला फुंसोक वांगयाल और तेंजिन ढोंडन भी इसी अदालत में ले आए.

अदालत ने साफ़ कह दिया कि क़ानून के आधार पर ये सब भारतीय नागरिक हैं और उन्हें न केवल पासपोर्ट जारी किया जाए बल्कि वो तमाम अधिकार भी हैं जो किसी भी भारतीय नागरिक के होते हैं. अलग से नागरिकता के लिए आवेदन की कोई जरूरत नहीं है.

डोलकर केस का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जब उस मामले में क़ानून को आधार बनाते हुए पासपोर्ट देने के आदेश दिए गए थे तो यह डोलकर पर ही नहीं बल्कि सभी निर्वासित तिब्बतियों पर लागू होना चाहिए था.

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पासपोर्ट मामले में गृह मंत्रालय की ओर से 26 अगस्त 2011 को चुनाव आयोग को लिखे एक पत्र को आधार बनाया जा रहा था.

उस पत्र में मंत्रालय ने कहा था कि सिटिजनशिप एक्ट 1955 के सेक्शन (3) (1) (ए) के आधार पर कोई निर्वासित तिब्बती सीधे भारत का नागरिक नहीं बन सकता. उन्हें अलग से व्यक्तिगत आवेदन करना पड़ेगा. जब मंत्रालय उनकी राष्ट्रीयता निर्धारित कर देगा तो उन्हें अपना रिफ्यूजी सर्टिफिकेट और पहचान पत्र सरेंडर करना होगा.

पासपोर्ट मामले को लेकर नामगयाल लकर के मामले में हाइकोर्ट ने ही 22 दिसंबर 2010 को महत्वपूर्ण फ़ैसला सुनाया था. इसी एक्ट को आधार बनाते हुए उसे पासपोर्ट जारी करने के आदेश दिए. साथ ही गृह मंत्रालय के पुराने पत्र को भी रद्द कर दिया.

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब मंत्रालय उन्हें स्टेटलेस लोग कहता है तो इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे ख़ुद को तिब्बती नेशनल बताते हैं या नहीं. लिहाजा उन्हें पासपोर्ट दिया जाए.

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Image caption गिरिराज सुब्रह्मण्यम

कोर्ट में लोबसंग और ढोंडन का केस लड़ने वाले एडवोकेट गिरिराज गिरिराज सुब्रह्मण्यम के मुताबिक, "इस फ़ैसले ने तिब्बती मूल के लोगों के भारतीय पासपोर्ट पर अधिकार को पक्का कर दिया है. साथ ही भविष्य में ये सभी तिब्बती भारतीय क़ानून के तहत हर वो चीज कर सकते हैं जो एक अन्य भारतीय नागरिक भी करते हैं. ज़मीन भी खरीद सकते हैं."

हिंदुस्तान तिब्बत फ्रेंडशिप एसोसिएशन के सलाहकार रामस्वरूप कहते हैं कि इस फ़ैसले का स्वागत किया जाना चाहिए. रामस्वरूप के मुताबिक़ यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था. लेकिन संभव है कि यह कोर्ट की नोटिस में बहुत बाद में आया.

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Image caption रामस्वरूप

कुल मिला कर मामला यह है कि कुछ सौ लोगों को छोड़ दिया जाए तो तकरीबन सभी निर्वासित तिब्बती अब भारतीय हैं.

मतलब सिटिजनशिप एक्ट के मुताबिक 1987 तक भारत में पैदा हुए निर्वासित तिब्बती क़ानूनी तौर पर भारतीय हैं. उनकी संतानें अपने आप ही फिर भारतीय होंगी.

भारत में रह कर चीन के साथ अपने हक़ की लड़ाई लड़ने वाले तिब्बती अब क़ानूनी तौर पर भी स्टेटलैस लोग नहीं रह गए हैं. इसका उनकी तिब्बत की लड़ाई वाले मसले पर क्या असर पड़ता है, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.

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