'यह युद्ध का स्वभाव है'

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भारत के पाकिस्तान पर हमले का दीर्घकालिक असर क्या होगा?

इसमें से एक हो सकता है कि हमारे बीच एक और युद्ध हो, जो अगर लंबा चले तो आधिकारिक तौर पर तीसरा युद्ध होगा.

यदि यह कम समय तक चला तो पांचवां संघर्ष होगा. हमने 1947-48 में पहली लड़ाई लड़ी थी जब जिन्ना ने एक पठानी कबायली सेना कश्मीर को जीतने और क़ब्जा करने के लिए भेजा था जिसे आज हम पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर कहते हैं और पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है.

इसके बाद 1965 में अयूब खान को उनके विदेश मंत्री भुट्टो द्वारा कश्मीर में घुसपैठियों को भेजने के लिए भड़काया गया.

शास्त्री ने इसका जवाब लाहौर की तरफ अंतरराष्ट्रीय सीमा पार टैंक भेज कर दिया.

ये लड़ाई ताशकंद (आज का उजबेकिस्तान) में सोवियत यूनियन की मध्यस्थता से शांति के साथ ख़त्म हुई

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Image caption भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

ये लड़ाई कुछ हद तक इसलिए भी ख़त्म हो गई, क्योंकि दोनों देशों की वायु सेना के पास अतिरिक्त पुर्जों की किल्लत हो गई थी.

लड़ाकू विमान तेजी से काम करने वाली मशीनें हैं जिनमें बेहद महंगे पुर्जे इस्तेमाल होते हैं जो कि शीघ्रता से ख़त्म हो जाते हैं.

इस वज़ह से ही गरीब देश 10 दिन से अधिक आधुनिक युद्ध लड़ना बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं.

आज भारत बेहद अधिक शक्तिशाली है और पाकिस्तान की तुलना में धनी भी है और इसलिए ये स्थिति बदल चुकी है. लेकिन अब हम दोनों के पास जनसंहार के हथियार हैं जो कि शास्त्री के समय में हमारे पास नहीं थे.

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ताशकंद के शांति समझौते के महज छह साल बाद साल 1971 के युद्ध में हमने पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाने के लिए बांट दिया.

साल 1999 में कारगिल में हमने पाकिस्तान की उत्तरी हल्की पैदल कमान के जवानों का कारगिल से सफ़ाया कर दिया.

यद्पि इस युद्ध में एक हजार सैनिक मारे गए थे, दोनों तरफ़ से 500. लेकिन कारगिल संघर्ष को युद्ध की श्रेणी में नहीं रख गया है क्योंकि दोनों में किसी भी देश ने युद्ध की घोषणा नहीं की थी.

इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाबी कार्रवाई का आदेश दिया तो ये संघर्ष नियंत्रित होता दिखता है.

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भारत ने बेहद संयत भाषा का प्रयोग करते हुए इसे सर्जिकल स्ट्राइक बताया है.

हमने पाकिस्तान और दुनिया को भी भरोसा दिलाया कि हम आगे कार्रवाई की योजना नहीं बना रहे.

लेकिन भारत पाकिस्तान के साथ कई बार युद्ध लड़ चुका है, ऐसे में हमेशा एक संभावना रहती है कि हम फिर से युद्ध के लिए जाएंगे.

युद्ध के साथ समस्या है कि लोग जल्द ही इससे ऊब जाते हैं.

मेरा ये मतलब नहीं है कि दोनों देश युद्ध से थक गए हैं, इस अर्थ में कि उनके बेटे मर रहे हैं और अर्थव्यवस्था खाक हो रही है. मेरा मतलब है कि वे वास्तव में ऊब जाते हैं.

पहला विश्व युद्ध खाईयों में लड़ा गया. लंबी और थमी हुई पंक्तियां जो बेल्जियम में शुरू हुई. (एक दयनीय देश जो कि लड़ाई का हिस्सा नहीं बनना चाहता, लेकिन एक युद्ध का मैदान बन गया, क्योंकि वह लड़ाकों के बीच में स्थित था ) और स्विट्जरलैंड में ख़त्म हुई. ये युद्ध सालों तक चला.

1914 और 1918 के बीच जर्मन फ्रांसीसियों और ब्रितानी के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे वे 150 मीटर की दूरी पर खाईयों में रहने वालों से नफ़रत करते थे.

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उनके पीछे क्या चल रहा था ? कुछ भी तो नहीं.

शाम में लोग पबों और रेस्त्रां में और सुबह कारख़ानों और खेतों में काम करने के लिए जा रहे थे. बच्चे स्कूल जा रहे थे और परिवार अपनी सालाना छुट्टियों के लिए जा रहे थे.

इस सारे वक़्त और चार वर्षों के लिए हजारों फ्रांसीसी और बेल्जियन कस्बों, शहरों और गांवों से कुछ किलोमीटरों पर लाखों लोग एक दूसरे पर गोलाबारी और बम बारी कर रहे थे.

कितने लोग मारे गए ? डेढ़ करोड़ से अधिक. इस युद्ध का क्या परिणाम था ? ये कहना मुश्किल है.

राष्ट्रीय सीमाएं अधिक या कम एक ही सी रहीं, सभी अर्थव्यवस्थाएं राख हो गईं. कुछ हुकूमतें बदल गईं. रूसी साम्राज्य ख़त्म हो गया और और साम्यवादियों ने सत्ता संभाली. ऑस्ट्रो हंगेरियन साम्राज्य समाप्त हो गया है और इसलिए जर्मन साम्राज्य भी ख़त्म था. लेकिन ये सब भीतर से बदल गए थे. कोई भी देश इन सब हत्याओं से लाभान्वित नहीं हुआ.

मैं आश्चर्य करता हूं अगर हमारा पाकिस्तान के साथ संघर्ष इससे कुछ अलग होगा.

क्या हमारी ये सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तानी आतंकवाद का ख़ात्मा कर पाएगी ?

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और यदि नहीं, हम क्या करेंगे जब अगली आतंकी स्ट्राइक होंगे तब ?

क्या एक और सर्जिकल स्ट्राइक होगी और क्या हमें कुछ बड़ा करना होगा?

पाकिस्तान को पूरी तरह से रोकने के लिए ये कितना बड़ा करना होगा?

हमने उनके देश को आधा काट दिया लेकिन उन्होंने अभी भी वो सबक नहीं लिया जो हम उन्हें सिखलाना चाहते हैं.

क्या वे इसे सीखेंगे यदि हम फिर से इन्हें आधा काट दें?

हालांकि इसके लिए बहुत हत्याओं और मौतों की जरूरत होगी. मैं आश्चर्य करता हूं यदि तब भी हम ऊब जाएंगे.

क्या हम अपनी जिंदगी जारी रखेंगे जब कुछ समय के दौरान ख़बरों में कुछ 'नया' नहीं होगा और नवीनत मौतें बिल्कुल कल और परसों की तरह ही हो.

क्या हम अपने कारोबारों पर जाएंगे, इंद्राणी केस के नवीनतम डेवलेपमेंट पर बहस करते हुए टीवी चैनल्स देखने के लिए घर वापस आएंगे ?

मैं ऐसा इसलिए सोचता हूं कि क्योंकि वह इंसान का स्वभाव है और वह युद्ध का स्वभाव है.

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