बिहार शराबबंदीः क्या जल्दबाज़ी में लागू हुआ कानून

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एक नए कानून के सहारे बिहार में रविवार को फिर से पूरी तरह से शराबबंदी लागू कर दी गई है.

बिहार विधानमंडल के मॉनसून सत्र में राज्य सरकार ने पूर्ण शराबबंदी संबंधी एक नया विधेयक (बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद विधेयक, 2016) पारित कराया है.

पुराने उत्पाद कानून को पटना हाई कोर्ट ने 30 सितंबर को असंवैधानिक घोषित कर दिया था.

जानकारों के मुताबिक नए कानून में भी आमतौर पर वही ख़ामियां रह गई हैं, जिनके आधार पर 30 सितंबर को कोर्ट का फ़ैसला आया था. नया कानून बनाते हुए इन ख़ामियों पर ध्यान नहीं दिया है.

नए उत्पाद कानून को 'ड्रेकोनियन कानून' भी बताया जा रहा है.

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इस कानून में कई 'कड़े प्रावधान' हैं. पटना हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील और हाई कोर्ट समन्वय समिति के अध्यक्ष योगेश चंद्र वर्मा का इन प्रावधानों के बारे में ये कहना है...

1. सभी अपराध संज्ञेय और ग़ैर ज़मानती होंगे. इस कानून के तहत जो भी मुक़दमा चलेगा. उसमें यह मान लाया जाएगा कि अभियुक्त ने अपराध किया है, जब तक कि वो बेगुनाह साबित ना हो जाए.

ऐसा प्रावधान उत्पाद कानून में नहीं होने चाहिए. ये तो रेप, दहेज हत्या जैसे बहुत गंभीर मामलों से जुड़े कानून में होते हैं.

2. इस कानून के अधीन दंडनीय अपराध करते हुए या करने की कोशिश करते हुए पाए जाने पर, बिना वारंट के गिरफ़्तार करने या निरुद्ध का प्रावधान है. जबकि सज़ा, अपराध के स्वभाव और गंभीरता के अनुसार होनी चाहिए.

उत्पाद कानून के तहत किए गए अपराध ऐसे गंभीर अपराध नहीं हैं कि आजीवन कारावास या मौत तक की सज़ा हो.

लेकिन नए कानून में ऐसे प्रावधान किए गए हैं. नए कानून में क्रूरता की हद तक सज़ा का प्रावधान है.

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Image caption बिहार में शराबबंदी की मांग लंबे समय से की जा रही थी.

3. शराब या शराब बनाने वाली किसी साम्रगी के घर से मिलने पर घर ज़ब्त हो सकता है. यह भी बहुत ही कड़ा प्रावधान है.

यह कानूनी तौर पर सही भी नहीं है.

मान लीजिए किसी घर का मालिक घर से बाहर है. उसके घर या अहाते में कोई अनजान शख़्स शराब पीते पकड़ गया. तो ऐसे में मकान मालिक उसे जानता न भी हो तो, लेकिन उसका घर ज़ब्त हो जाएगा.

4. कानून में ज़िलाधिकारी को ज़हरीली शराब से होने वाली मौत और दुर्घटनाओं के मामले में संतुष्ट होने पर मुआवज़ा देने का अधिकार दिया गया है.

कानून में बिना किसी निर्देश के ज़िलाधिकारी को सारे अधिकार दिए गए हैं.

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राज्य के किसी कर्मचारी को पूरा अधिकार दे देना भी ग़ैर-कानूनी माना जाता है.

5. कई अपराध के मामले में कानून में कम-से-कम सज़ा तय कर दी गई है.

यानी कि कोर्ट को तथ्यों के आधार पर सज़ा तय करने का अधिकार नहीं दिया गया है. यह प्रावधान भी उचित नहीं है.

6. उत्पाद कानून में शराबबंदी का बार-बार उल्लंघन किए जाने पर किसी गांव, मोहल्ले पर जो सामूहिक जुर्माने का प्रावधान है, वह ग़लत है.

कुछ लोगों की ग़लती के कारण इलाक़े के सभी बेगुनाह लोगों को सज़ा देना सरासर गलत है.

7. कानून अगर न्यायसंगत, निष्पक्ष और तर्कसंगत नहीं है, तो कहा जाता है कि वह कानून ही नहीं है. नया कानून इन मानदंडों पर खरा नहीं उतरता है. यह जल्दबाज़ी में लागू किया गया कानून है.

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