क्या सर्जिकल स्ट्राइक का कोई असर हुआ है?

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भारतीय सेना ने पाकिस्तान के साथ सटी नियंत्रण रेखा पर जिस सर्जिकल स्ट्राइक्स का दावा किया था उसका उद्देश्य क्या था?

अगर उसका उद्देश्य चरमपंथी हमलों को रोकना था तो रविवार को एक बार फिर भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में एक और चरमपंथी हमला हुआ जिसमें अर्धसैनिक बलों के एक जवान की मौत हो गई और चार घायल हुए हैं.

क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि सर्जिकल स्ट्राइक्स का असर ही नहीं हुआ?

रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी कहते हैं कि इस समय भारत के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई है. "भारतीय फ़ौज के लिए सर्जिकल स्ट्राइक्स को जारी रखना मुश्किल है. भारत के लिए इस मसले पर एक गतिरोध सा है. क्या करे क्या न करे."

उनके अनुसार पाकिस्तान के अंदर लश्कर जैसे नॉन-स्टेट प्लेयर्स वहाँ की फ़ौज के काबू में अब नहीं हैं. वो किसी की नहीं सुनते। भारतीय सेना ने उन्हीं को टारगेट किया है लेकिन इसे बार-बार नहीं किया जा सकता.

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बेदी कहते हैं कि ये सर्जिकल स्ट्राइक्स उतने गंभीर नहीं थे. "इसे फौजी कार्रवाई से ज़्यादा सियासी कार्रवाई समझें". रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक़ ये स्ट्राइक्स अधिक ताक़तवर नहीं थे. और ये कुछ घंटों में ख़त्म हो गए.

लेकिन इन स्ट्राइक्स से औसत भारतीय केवल संतुष्ट ही नहीं बल्कि काफी खुश नज़र आता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक अब लोगों को याद दिला रहे हैं कि प्रधानमंत्री के 56 इंच छाती होने का दावा ग़लत नहीं है. मोदी की लोकप्रियता एक बार फिर आसमान को छूती नज़र आती है.

लेकिन भारतीय मीडिया में मच रहे जश्न का शोर जब मद्धिम पड़ जाएगा तो कई सवाल उठ सकते हैं: क्या ये स्ट्राइक्स उड़ी चरमपंथी हमलों का एक बदला हैं? क्या ये भारत के पाकिस्तान के खिलाफ सालों के संयम बरतने की पालिसी में बदलाव के संकेत हैं?

राहुल बेदी के अनुसार इस हमले का उद्देश्य पाकिस्तान की तरफ से भारत में हो रहे चरमपंथी हमलों को रोकना नहीं था. इससे केवल एक पैग़ाम देना था कि "हम अंदर घुस कर तुम्हारा भी नुक़सान कर सकते हैं."

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भारत सरकार दावा कर रही है ये कार्रवाई सरहद पर से हो रहे हमलों को रोकने की एक कोशिश है और ज़रुरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल आगे भी किया जा सकता है.

मक़सद कुछ भी हो रविवार को हुए बारामुला में अर्ध सैनिक कैंप पर हुए हमले ने साबित किया है कि इन चरमपंथी हमलों को रोक नहीं जा सकता. कश्मीर में पिछले 30 सालों का इतिहास बताता है कि वहां चरमपंथी हमले कम हो सकते हैं इनका पूरी तरह से ख़त्म होना मुश्किल नज़र आता है.

इन तीन दशकों में भारत के दावों के अनुसार पाकिस्तान ने कश्मीरी चरमपंथियों को ट्रेन किया, उन्हें हथियार दिए और भारतीय कश्मीर की तरफ उन्हें धकेल दिया। इन दावों की पुष्टि कश्मीर में ऐसे कई चरमपंथियों ने की है जिन्होंने खुद स्वीकार किया कि उन्हों ने पाकिस्तान में ट्रेनिंग हासिल की है.

जब सीमा पर ख़ामोशी तारी हो जाए और जब दोनों देश अपने मीडिया और जनता को संतुष्ट कर लें तो नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ को एक दूसरे के लिए वही गरम जोशी दिखानी होगी जिसका प्रदर्शन भारतीय प्रधानमंत्री ने कई बार किया है.

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राहुल बेदी कहते हैं कि भारत की समस्याएँ गंभीर हैं. "पाकिस्तान अमरीका की नहीं सुनता, भारत की नहीं सुनता, वो किसी की नहीं सुनता". लेकिन वो स्वीकार करते हैं कि नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ के पास कश्मीर को लेकर बात चीत करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. युद्ध के ज़रिए शांति हासिल नहीं की जा सकती. पिछले 70 सालों में हुए तीन युद्ध और सैकड़ों सरहदी झड़पों के बाद मजबूरन दोनों पक्ष बातचीत शुरू करने का प्रयास करते हैं.

राहुल बेदी कहते हैं, "भारत के पास पाकिस्तान से बातचीत का एक अकेला विकल्प है लेकिन नवाज़ शरीफ से बातचीत करना फ़िज़ूल है क्योंकि हम जानते हैं कि असल ताक़त वहां की सेना के पास है."

हाँ, ये ज़रूर है कि दोनों नेताओं की केमिस्ट्री से हालात काबू में थे. मोदी-नवाज़ केमिस्ट्री के दोबारा उभरने के फिलहाल कोई आसार नज़र नहीं आते.