भारत में 'जारी है' टाइगरों की तस्करी

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जानवरों के संरंक्षण के लिए काम करने वाली संस्थाओं डब्लूडब्लूएफ और 'ट्रैफिक' के मुताबिक़ भारत में बाघों की तस्करी अभी भी जारी है.

वर्ल्ड वाइल्डलाईफ फंड और ट्रैफिक की रिपोर्ट 'रिड्यूस्ड टू स्किन एंड बोन्स' के अनुसार एशिया में पिछले 15 वर्षों के दौरान औसतन हर हफ्ते दो मरे हुए बाघ बरामद होते हैं.

रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2000 से लेकर 2015 के बीच एशिया में कम से कम 1,755 मरे और तस्करी के लिए जा रहे बाघ बरामद हुए हैं.

चौंकाने वाली बात ये भी है कि इन 1,755 में से 540 भारत में बरामद हुए जो कुल संख्या का करीब 30% यानी सबसे ज़्यादा है.

डब्लूडब्लूएफ के अनुसार दक्षिण भारत में बाघों की तस्करी के मामले सबसे ज़्यादा दिखे जबकि मध्य भारत, ख़ासतौर से मध्य प्रदेश, में बाघों के शव की बरामदगी में बढ़ोतरी दिखी.

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बाघों के जाने माने एक्सपर्ट माइक पांडे ने बीबीसी को बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बाघ की हड्डियों और खाल की कीमत लाखों डॉलर लगती है और इसका असर जंगलों में देखा जाता है.

उन्होंने कहा, "भारत में साल 2015 में ही 87 बाघों को तस्करी के लिए मारा गया. अगर यही हाल रहा तो समस्या बुरी तरह फैल जाएगी."

बाघों की तस्करी पर ये ताज़ा रिपोर्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि कुछ दिन पहले ग्लोबल टाइगर फ़ोरम और डब्लूडब्लूएफ ने कहा था कि दुनिया में बाघों की तादाद 3,200 से बढ़ कर 3,850 हो चुकी है और बढ़ोतरी भारत में भी दिखी है.

लेकिन 'प्रोजेक्ट टाइगर' या राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पूर्व सदस्य नवीन रहेजा भी मानते हैं कि 'अगर तस्करी के लिए बाघों की हत्या न हो रही होती तो 2-3 वर्ष में भारत के बाघ दोगुने हो जाते.'

उन्होंने बताया, "भारत ऐसे देश में जहाँ हज़ारों किलोमीटरों के जंगल में 50, 100 या 200 गार्ड तैनात करने से बाघों का शिकार रुक नहीं सकता. ऐसे कई जंगल हैं जहाँ आज भी बाघों का शिकार हो रहा है और इसका मक़सद सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार है. लेकिन इस मामले में सिर्फ़ सरकार पर आरोप लगाना ग़लत है. दिक्क़त विशालकाय जंगल हैं जहाँ इसे रोकने के लिए सबकी भागीदारी चाहिए".

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इसके बावजूद कि भारत, नेपाल, रूस और भूटान में बाघों में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, डब्लूडब्लूएफ ने इसे 'विलुप्त' होती जानवरों की प्रजाति में बरक़रार रखा है.

बहराल, इस ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार अब ज़्यादा से ज़्यादा उन बाघों का शिकार हो रहा है जिन्हें दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ देशो में 'टाइगर फॉर्मों' में पाला जाता है.

रहा सवाल भारत का तो माइक पांडे को लगता है कि "वो लोग जो टाइगर पार्कों के पास रहते हैं, उनमें ग़रीबी बहुत ज़्यादा हैं. दूसरी बात, टाइगर जब अपने जंगल से ज़रा भी बाहर निकलता है तो शिकारियों के हत्थे चढ़ जाता है. इसलिए सरकार को वनों के इर्द-गिर्द रहने वालों को भी संरक्षण योजना में शामिल करना पड़ेगा."

नवीन रहेजा की राय में भी ज़्यादा फ़र्क नहीं है. उन्होंने कहा, "जो लोग टाइगर रिज़र्व के पास रहते हैं उन्हें बाघ की नहीं, अपनी रोज़ी और परिवार की सलामती की चिंता है. इसलिए जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है जिससे आर्थिक और सामाजिक स्तर पर इस समस्या से निबटा जाए."

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