'पढ़ने निकला हमरा हीरा बेटा, पुलिस ने गोली मार दी'

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

सोनबरसा गांव की सावित्री देवी के घर में तीन दिनों से चूल्हा नहीं जला है. रो रो कर उनका बुरा हाल है.कभी छाती पीटती हैं कभी माथा. आधार कार्ड में बेटे के फोटो को देखकर चूमती भी हैं.

परिजन बताते हैं कि इस दौरान कम से कम दर्जन बार बेहोश हो चुकी हैं. तब जोर- जोर से उनके चेहरे पर पानी का छींटा मारा जाता है.

वो विलाप करती गंवई भाषा में ही कोसती हैं, ''हमरा हीरा जइसन बेटा के कोई कसूर नहीं, पर दुश्मन पुलिस छतिया में गोली मार देलो (उनके हीरे जैसे बेटे का कोई कसूर नहीं, पर पुलिस ने छाती में गोली मार दी).

एक अक्तूबर को झारखंड के बड़कागांव में पुलिस फायरिंग में मारे गए चार लोगों में उनका नाबालिग बेटा पवन साव भी शामिल है. इसी साल उसने दसवीं की परीक्षा पास की थी. सुबह में वह टयूशन पढ़ने डांडीकला गांव की तरफ गया था और पुलिस की गोलियों से मारा गया.

यह घटना तब हुई थी, जब बड़कागांव के स्थानीय विधायक निर्मला देवी की गिरफ्तारी के बाद स्थानीय लोग पुलिस से भिड़ गए थे. विधायक की अगुवाई में बड़कागांव के लोग पंद्रह दिनों से जमीन अधिग्रहण के विरोध में आंदोलन कर रहे थे. सरकार ने इस घटना के गृह सचिव से जांच कराने के आदेश भी दिए हैं.

सोनबरसा गांव के लोग बताने लगे जिन चार लोगों की मौत हुई है, उनमें तीन पढ़ने वाले छात्र थे और एक मजदूर, जिनका इन आंदोलन से कोई लेना- देना नहीं.

पीड़ित परिवारों का आरोप है कि पुलिस ने पकड़कर इन लोगों को गोलियां मार दी. पवन साहु के पिता मनरखन साव कोलकता में मज़दूरी करते हैं. वे बहुत बोलने की स्थति में नहीं थे.

धीमी आवाज मे कहते हैं, ''कलकत्ता से जब लौटे, तो दरवाज़े पर बेटे की लाश पड़ी थी. बेटे का चेहरा- शरीर फूला था और खून से सना.''

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

इसी गांव के पवन राय के बेटे अभिषेक भी इस घटना में मारे गए हैं. पवन राय सुबह में खलासी का काम करने निकले और छोटा बेटा अभिजीत टयूशन पढ़ने. गोलीबारी की ख़बर सुनकर अभिषेक अपने भाई की खबर लेने निकला. अभिजीत दूसरे रास्ते से तो घर लौट गया, लेकिन अभिषेक ही मारा गया.

सोनबरसा के लोग बताने लगे कि पुलिस वालों ने जीना हराम कर दिया है. इसी बीच गांव के कुछ महिलाएं दौड़ती हुई आती हैं. वे बताती हैं कि पुलिस फिर आ रही हैं. महिलाएं बताने लगीं कि फोर्स के रास्ते में हमें बीजेपी के पूर्व विधायक लोकनाथ महतो मिले. वे बताने लगे वाकई निर्दोष लोग मारे गए हैं.

इससे पहले हम चेपाखुर्द गांव गए. इस गांव के तीस वर्षीय मेहताब अंसारी पुलिस फायरिंग में मारे गए हैं. उनके पिता मोजीम बूढ़े हो चले हैं, लिहाजा अब रिक्शा नहीं चलाते. मेहताब की मां और पत्नी की खामोश जुबां और डरी आंखें उनकी बेबसी और पीड़ा जाहिर करती रही.

मोजीम अंसारी बताने लगे कि मेहताब मज़दूरी कर जो कमाते थे, उसी से घर का खर्च निकलता था. फजीरे वह शौच करने नाला तरफ गया था, पुलिस ने पकड़ कर गोली मार दी. दरअसल उनके गांव के सामने जो नाला है उसके पार पुलिस से ग्रामीणों की झड़पें हो रही थीं.

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

मेहताब की मौत की सूचना पाकर उनके दो भाई यासिन और आफताब दिल्ली से गांव लौटे हैं. वे लोग दिल्ली में मज़दूरी करते हैं.

पांच सौ हिन्दू और मुसलिम परिवारों के इस गांव में लोगों के बीच एका है. फिरोज़ आलम कहते हैं कि नाम पूछे बिना आप फर्क नहीं कर सकते कि कौन किस कौम का है. गांव वाले इस बार मुहर्रम और दुर्गा पूजा नहीं मनाएंगे.

बकौल फिरोज, ''बीजेपी की सरकार ने चार आने की मदद भी पीड़ित परिवारों को नहीं दी.''

इसी गांव के जयनाथ यादव कहते हैं, ''चारों तरफ ख़ौफ और दहशत है. जीना मुश्किल है. घर से बाहर नहीं निकल पा रहे. नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन की कोल परियोजनाओं के लिए सरकार दबाव देकर जमीन अधिग्रहित कर रही है और लोग देना नहीं चाहते. तब इसके जद में आने वाले या नहीं आने वाले दोनों पिसे जा रहे हैं. आंदोलन का सिला यही है कि तीन साल में तीन बार गोलियां चली है. सैकड़ों लोगों के ख़िलाफ़ एफआइआर लिखी गई है.''

उम्र के अस्सी पार शकील आलम कहते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत में भी इतने जुल्म नहीं ढाये जाते थे, जो वे लोग राज्य की सरकार में देख रहे हैं. रामधनी कहते हैं कि खेती किसानी और पर्व त्योहार के मौसम में पूरा इलाका दहशत में है. डर के मारे हलक के नीचे रोटी नहीं उतरती. पुलिस फोर्स जब- तब गांवों मे घुसकर लोगों को डराती- पीटती रही है.

गांवों के लोग एक स्वर में कहते रहे कि घटना के बाद राज्य की मुख्य सचिव और डीजीपी हेलकॉप्टर से बड़कागांव आए थे, तो अधिकारियों से बातें कर वापस हो गए. किसी ग्रामीण का दुख दर्द नहीं जाना- सुना.

गांवों के दौरे के क्रम में हमनें देखा कि लोग घरों को छोड़कर दूसरी जगहों पर जा रहे हैं. रास्ते में हमें मिलीं बर्फीना. उन्होंने तस्वीर नहीं खींचने को कहा.

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

हमने पूछा गांव क्यों छोड़ कर जा रहे हैं.

उनका कहना था, ''क्या करूं, जान से पहले इज्जत पर बन आई है, जिसे पुलिस बिगाड़ने पर तुली है.''

जबकि हजारीबाग के डीआइजी उपेंद्र कुमार कहते हैं कि दो अक्तूबर तक वे वहीं कैंप कर रहे थे, ऐसी हालत तो नहीं थी, हां पुलिस गश्त जरूर लगा रही है. फिर भी वे इसे देखेंगे. अब पुलिस फायरिंग मे किन परिस्थितियों में लोग मरे, इसपर तो जांच बैठाई ही गई है.

बड़कागांव के 76 वर्षीय बुजुर्ग विशेश्वर महतो सालों से ज़मीन की मापी करते रहे हैं, लिहाजा गांवों में उनकी ख़ास पहचान है.

वे बताने लगे इतने डरावने दौर कभी नहीं देखे.

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

आखिर जमीन अधिग्रहण में अड़चन कहां हैं? इस सवाल पर वे दूर - दूर तक खेतों में लहलहाती फसलों को दिखाते हुए कहते हैं चार फसलें उगलती हैं ये जमीन, एक एकड़ का जोतदार साल में लाखों कमाता है और पंद्रह लाख में ही उसकी ज़मीन ले ली जा रही हैं. बहुत से लोग लोग हैं जो जमीन दे भी रहे, पर हजारों रैयत यानि जमीन मालिक जिंदगी की पूंजी नहीं देना चाहते.

पल भर के लिए ख़ामोश होने के बाद वे फिर धीरे से कहते हैं, ''फिलहाल लाखों में लोग खेल लें, लेकिन भविष्य में भीख मांगने की नौबत आएगी.''

चेपाकला गांव के फुलेश्वर साहु की दो एकड़ जमीन ली गई है. वे कहते हैं कि ''तीस लाख रुपए मुआवज़ा मिले, लेकिन जमीन जाने का दर्द ज़िंदगी भर रहेगा. फुलेश्वर बताने लगे कि सरकारी तंत्र जबरन जमीन लेने पर तुला है. लोगों का लगान जमा नहीं हो रहा. अफसर डराते हैं कि ट्रेजरी में पैसा जमा कर देंगे.''

मुआवज़े की राशि कम तो नहीं, इस सवाल पर बड़कागांव के विपेंद्र महतो कहते हैं कि महज एक कट्ठे में पचास हज़ार की मिरचाई उपजाते- बेचते हैं. अब अब पंद्रह- बीस लाख में एक एकड़ ले रहे हैं. गुस्से में कहते हैं कि सरकार बताए कि क्या कोई कारखाना है, जो अनाज उपजा दे.

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

जुबरा गांव के पदुम राम कहते हैं कि ''खनन परियोजनाओं की वजह से चालीस गांवों का वजूद खतरे में है. अच्छा होता कि पूरे बड़कागांव की आबादी को एक साथ सरकार गोलियां मरवा देती.''

युवा बजरंग प्रसाद कहते हैं कि ये जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन का सिलसिला जारी है और साथ में पुलिस की कार्रवाई भी. यहां के युवाओं का भविष्य जरूर खतरे में है. देख लीजिए चारों तरफ पुलिस की संगीने तनी हैं. सांझ ढलते ही बूटों की आवाज़ें ज़ोर पकड़ने लगती हैं. लाठी- गोली के बल पर लोगों की आवाज दबाने का काम हो रहा है और इसके साथ ही राजनीति भी परवान पर है.