कभी गंगा नदी भी थी किसी की ज़मींदारी

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Image caption कहलगांव में गंगा तट पर मछुआरों की नौकाएं

ज़मींदार और ज़मींदारी से जुड़ी किस्से-कहानियां तो आपने सुनी होंगी लेकिन क्या आपने कभी सोचा था कि नदी पर भी किसी की ज़मींदारी हो सकती है?

बिहार में भागलपुर के सुल्तानगंज से लेकर कटिहार के बरारी तक गंगा नदी पर भी जमींदारी थी. इलाके में इसे जल कर और पानीदारी के नाम से जाना जाता था.

ऐसा नहीं है कि ऐसा कोई सदियों पहले था. करीब ढाई दशक पहले इस जमींदारी को एक आंदोलन के बाद ख़त्म किया गया.

साल 1982 के 22 फ़रवरी को शुरू हुआ आंदोलन 'गंगा मुक्ति आंदोलन' के नाम से जाना जाता है.

इसे मछुआरों के साथ-साथ गंगा किनारे रहने वाले किसान, नौजवान, कलाकार और समाज के दूसरे प्रगतिशील लोगों ने मिलकर 1991 में अंजाम तक पहुंचाया.

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Image caption गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े योगेंद्र सहनी और फेकिया देवी

इस आंदोलन का केंद्र भागलपुर ज़िले के कहलगांव का काग़ज़ी टोला था. गंगा के किनारे बसा यह मोहल्ला मछुआरों की बस्ती है. यहां के मछुआरों का कहना है कि वे इस ज़मींदारी से बहुत परेशान थे.

मछुआरे योगेंद्र सहनी इस आंदोलन में सक्रिय लोगों में से एक थे. वे इलाक़े में 'बड़का जोगेंद्र' के नाम से जाने जाते हैं.

योगेंद्र ने बीबीसी से कहा, ''हम मछली का शिकार करते थे तो हम लोगों से कर वसूला जाता था. जाल की किस्म के हिसाब से पट्टा लिया जाता था. किसी साल पट्टा नहीं दे पाए तो नाव चलाना मुश्किल होता था.''

सुल्तानगंज से बटेश्वर स्थान तक गंगा की ज़मींदारी श्रीराम घोष और बटेश्वर स्थान से बरारी तक की ज़मींदारी मुशर्रफ़ हुसैन प्रमाणिक के परिवारों के पास थी.

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भागलपुर के रहने वाले अर्धेन्दु घोष उर्फ़ पलटन घोष श्रीराम घोष के परिवार की चौतीसवीं पीढ़ी के सदस्य हैं.

उन्होंने कहा, ''अकबर के ज़माने में हमारे पूर्वज श्रीराम घोष क़ानूनगो बनाए गए थे. तब उन्हें यह जल कर और दूसरी जायदाद मिली थी.''

पलटन घोष का कहना है कि साल 1930 के बाद उनका परिवार इन संपत्तियों का महज़ सेवायत यानी देखभाल करने वाला रह गया था. यह संपत्ति क़ानूनी रूप से पारिवारिक देवी-देवताओं के नाम कर दी गई थी.

श्रीराम घोष परिवार की पुरानी संपत्ति का एक हिस्सा आज भी भागलपुर के चंपानगर इलाके में महेश ड्योढी में मौजूद है.

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गंगा मुक्ति आंदोलन के बारे में उन्होंने कहा, "जल कर ख़त्म होने के पहले तक हम मंदिर और पुजारियों के खर्च के लिए नदी के अलग-अलग हिस्से लीज़ पर देते थे.''

पलटन इससे इंकार नहीं करते कि लीज़ के पैसों का कुछ हिस्सा उनके परिवार के पास भी आता था.

इस आंदोलन में महिलाओं की अहम भूमिका रही. दरअसल इस आंदोलन को गढ़ने और आगे बढ़ाने में लोकनायक जय प्रकाश नारायण स्थापित छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका रही है.

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की तरह ही इस आंदोलन में भी बड़े पैमाने पर महिलाओं ख़ासकर मछुआरा समुदाय की औरतों को, शामिल किया गया.

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संघर्ष वाहिनी से जुड़े पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अनिल प्रकाश गंगा मुक्ति आंदोलन के संयोजक थे.

उन्होंने कहा, ''जमींदारी में महिलाओं का भी शोषण होता था. एक लंबी प्रक्रिया के बाद महिलाओं को जगाना और उनको संगठित करना मुमकिन हुआ. बाद में वह नेतृत्व की भूमिका में भी आईं.''

अनिल प्रकाश के मुताबिक़, इस आंदोलन के दौरान यह तय हुआ कि आंदोलन की समितियों में महिलाओं की आधे से ज़्यादा हिस्सेदारी होगी.

आंदोलन की प्रमुख महिला चेहरा रहीं फेकिया देवी उस दौर के बारे में बताती हैं, ''रोजी-रोटी और इज्ज़त का सवाल था. हमें लगा कि जब तक मर्द-औरत एक होकर नहीं लडेंगे, तब तक गंगा जी हासिल नहीं होंगी. इसलिए उस समय हम मां-बहन मिलकर गोली खाने सामने आए थे.''

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आंदोलन के समय के एक वाकए को पार्वती देवी याद करती हैं.

वे कहती हैं, ''एक बार बदमाशों ने हमारा जाल-मछली लूट लिया. हम महिलाएं सुबह-सुबह उनके पास पहुंचे. हम पर बंदूक तान दी गई. आसमानी फायरिंग की गई. लेकिन हम डरे नहीं. हमने उन्हें बातचीत से समझाने की कोशिश की.''

पार्वती के मुताबिक़, उनकी बातचीत का असर भी हुआ और धीरे-धीरे 'बदमाश' उनके साथी बन गए.

राजकुमार सहनी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और गंगा मुक्ति आंदोलन दोनों से जुड़े रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''आंदोलन के लिए पैसे जुटाने के लिए पहले यह तय हुआ कि हर परिवार एक रुपया रोज चंदा देगा. लेकन तब इतना चंदा देना भी मुश्किल होता था. ऐसे में हर परिवार के लिए महीने में पंद्रह रुपये का चंदा तय किया गया.''

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चंदा आज भी जमा होता है. इलाके के मछुआरे अभी जल श्रमिक संघ के बैनर तले अपने हक-हकूक के लिए आवाज़ बुलंद करते हैं. ऐसे में यह चंदा इस संगठन के काम आता है.

यह मूल रुप से मछुआरों की आज़ादी की लड़ाई थी. ऐसे में इस लड़ाई के तरीकों में भी इस समुदाय की छाप दिखाई देती थी.

इस आंदोलन के दौरान कुछ दूसरे अनूठे तरीके भी आज़माए गए.

राजकुमार सहनी बताते हैं, ''काग़ज़ी टोला में कभी-कभी बीस-पच्चीस की तादाद में बाहर के साथी पहुंचते थे. आंदोलन के पास पैसा बहुत था नहीं. ऐसे में हमने ये रास्ता निकाला कि बाहर से आने वाले साथी एक-एक कर अलग-अलग परिवारों में खाना खाएंगे.''

राजकुमार के मुताबिक इसका एक फ़ायदा यह भी हुआ कि खाने के समय की बातचीत से आंदोलन को आगे बढ़ाने में मदद मिली.

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आंदोलन की जीत की ख़बर मनोज कुमार सहनी के दिलो-दिमाग में अब भी ताज़ा है.

वे बताते हैं, ''लालू यादव की सरकार के दौरान 1991 में जल कर ख़त्म किया गया था. हमें अख़बारों के ज़रिए यह ख़बर मिली थी. ख़बर मिलने के बाद हमने काग़ज़ की नाव बनाई और उसे ठेले पर सजाकर कहलगांव की सड़कों पर अपनी आज़ादी का जुलूस निकाला.''

लेकिन जल कर ख़त्म होने से मिली आज़ादी बहुत जल्दी ही छिन' भी गई.

कुछ ही दिनों बाद सुल्तानगंज से कहलगांव तक के गंगा की करीब अस्सी किलोमीटर लंबी पट्टी को विक्रमशिला गांगेय डॉल्फ़िन आश्रयणी घोषित कर दिया गया. इससे मछुआरों की रोज़ी रोटी के सामने एक बार फिर चुनौती आ गई.

गंगा मुक्ति आंदोलन में सक्रिय रुप से शामिल रहे रंगकर्मी उदय बताते हैं, ''आश्रयणी बनने से मछुआरों के मछली मारने पर रोक नहीं लगी है. लेकिन अब जमींदारों के बाद यहां के मछुआरों को आश्रयणी के बहाने प्रशासन परेशान करता है.''

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