राहुल की यात्रा, कांग्रेस को कितना फ़ायदा?

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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक महीने की किसान यात्रा के बाद दिल्ली लौट आए हैं.

उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान के लिए निकले राहुल गांधी ने एक महीने के दौरान देवरिया से दिल्ली तक की क़रीब 35 सौ किमी की यात्रा की. वे उत्तर प्रदेश के आधे से ज़्यादा ज़िलों में गए.

इस दौरान राहुल गांधी ने 26 दिन किसानों के साथ बिताए, 48 ज़िलों में 26 खाट सभाएं कीं, 26 रोड शो किए और क़रीब सात सौ जगहों पर कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात की.

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यात्रा की सबसे ख़ास बात ये रही कि इस दौरान पार्टी ने 75 लाख किसानों से मांग पत्र इकट्ठा किए.

पत्र में वादा किया गया है कि राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार आने पर बिजली बिल आधा किया जाएगा. कर्ज़ माफ़ किया जाएगा और समर्थन मूल्य बढ़ाया जाएगा.

कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के इस दौरे से उत्साहित है. जानकारों का भी कहना है कि इस यात्रा ने बेसुध पड़ी कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम किया है.

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लखनऊ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि इतने किसानों से सीधा संपर्क पार्टी को चुनावी लाभ भी दिला सकता है.

सुभाष मिश्र के अनुसार, "यदि 2012 के विधान सभा चुनाव को देखें तो पार्टी को राज्य भर में जितने वोट मिले थे, इस एक महीने में लगभग उतने मांग पत्र वो किसानों से इकट्ठा कर चुकी है. भले ही ये सब वोटों में तब्दील न हों, लेकिन इनका असर चुनाव में नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है."

मिश्र कहते हैं कि वैसे भी राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी यूपी विधानसभा चुनाव को रिहर्सल के तौर पर ही ले रही है. उसका मुख्य लक्ष्य 2019 के लोकसभा चुनाव है. कांग्रेस तब तक उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मज़बूत करना चाहती है.

पूरी यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने जिस तरह से किसानों के मुद्दे उठाए, उनकी समस्याएं सुनीं और नरेंद्र मोदी को लगातार किसान और मज़दूर विरोधी बताते रहे, उससे सुभाष मिश्र की इस बात को बल मिलता है कि उनका लक्ष्य आने वाला लोकसभा चुनाव है.

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जहां तक विधान सभा चुनाव में इस यात्रा के नफ़े नुकसान की बात है, उसका आकलन करना अभी जल्दबाज़ी होगी. लेकिन जिस तरह से किसानों की दुखती रग़ पर राहुल गांधी ने हाथ रखा है, उसका असर नहीं होगा, ये कहना भी उतनी ही जल्दबाज़ी में दिया गया फ़ैसला हो सकता है.

राहुल गांधी ने जिन जगहों पर किसानों से संवाद किया, वहां के किसान कर्ज़ माफ़ी और बिजली बिल आधा करने के उनके वादों को काफी गंभीर मान रहे हैं और उन्हें इन वादों का पूरा होना का भरोसा भी है.

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9 सितंबर को जब राहुल गांधी हनुमानगढ़ी में थे तो उस दौरान फ़ैज़ाबाद और आस-पास के कुछ किसानों से बात हुई.

किसानों का कहना था कि 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने हज़ारों किसानों के कर्ज़ माफ़ किए थे जिसका फ़ायदा यूपी के किसानों को भी मिला था. इसलिए उन्हें भरोसा है कि यदि राहुल गांधी वादा कर रहे हैं तो पूरा ज़रूर करेंगे.

राहुल गांधी की किसान यात्रा से पहले ही पार्टी ने शीला दीक्षित और राज बब्बर के नेतृत्व में दो अन्य यात्राएं भी निकाल रखी हैं. वो भी तब जबकि अन्य राजनीतिक पार्टियों में फिलहाल ऐसी कोई चुनवी हलचल नहीं दिख रही है.

यहां तक कि दूसरी पार्टियां कांग्रेस की इस तैयारी से दबाव में आती नज़र आईं. इसीलिए समाजवादी पार्टी ने परिवार और पार्टी में चल रहे तमाम विवादों के बावजूद अपने कुछ युवा नेताओं के नेतृत्व में एक यात्रा रवाना कर दी है.

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वहीं राहुल गांधी की इस यात्रा से कांग्रेस पार्टी के नेता और कार्यकर्ता बेहद उत्साहित हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता और चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष डा. संजय सिंह दावे के साथ कहते हैं कि चालीस साल के चुनावी नतीजे ये बताते हैं कि जनता ने कभी ग़लत फ़ैसला नहीं दिया और इस बार के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी वो ऐसा ही करेगी.

राहुल गांधी की ये यात्रा कई मायनों में चर्चा में भी रही. ख़ासकर खाट सभा में खाटों की हुई लूट और राहुल गांधी के हनुमानगढ़ी दर्शन को लेकर.

वैसे तो कांग्रेस पार्टी ख़ुद के सेक्युलर होने का दावा करती है, लेकिन राहुल गांधी अपनी इस यात्रा के दौरान पड़ने वाले तमाम मंदिरों और मज़ारों पर मत्था टेका.

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जानकारों का कहना है कि पार्टी के रणनीतिकारों ने जानबूझकर इन कार्यक्रमों को यात्रा में शामिल किया है, ख़ासकर अयोध्या में हनुमानगढ़ी का दर्शन, महंत ज्ञानदास से मुलाक़ात और देवबंद में मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ बैठक को.

यही नहीं, पार्टी नेताओं का कहना है कि इस यात्रा का मक़सद किसानों से तो रूबरू होना ही है साथ में नेताओं और कार्यकर्ताओं की ज़मीनी हक़ीक़त की भी परख की जाएगी और इसी के आधार पर उन्हें टिकट बाँटे जाएंगे.

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जानकारों का कहना है कि राहुल की इस यात्रा को जिस तरह से लोगों का समर्थन मिला है उसने पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंक ही दी है.

लेकिन ये सवाल अभी भी राजनीतिक हलकों में तैर रहा है कि क्या यात्रा के दौरान दिखने वाली चीजें वोट में तब्दील हो पाएंगी.

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