'मैं टूट जाती तो नीतीश को न्याय नहीं मिलता'

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नीतीश कटारा की मां से ख़ास बातचीत

बहुचर्चित नीतीश कटारा हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने तीन अक्टूबर 2016 को अपना फ़ैसला सुनाया. फ़ैसले के मुताबिक नीतीश कटारा की हत्या के आरोपी विकास यादव और उनके चचेरे भाई विशाल को सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल के नीतीश के अपहरण और हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए 25 साल के कारावास की सज़ा सुनाई है.

नीतीश कटारा की हत्या 2002 में हुई थी. इस मामले में विकास यादव के सहायक सुखदेव पहलवान को 20 साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई है.

नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत रही हैं. उन्होंने बीबीसी संवाददाता विदित मेहरा से ख़ास बात की. पढ़िए नीलम कटारा का पक्ष उन्हीं के शब्दों में.

पिछले 14 सालों में मेरी ज़िंदगी अदालत के इर्दगिर्द घूम रही थी. ये सब जब शुरू हुआ था तो मेरे पति को मस्तिष्क की गंभीर बीमारी थी. नीतीश कहा करता था कि 'मां सब ठीक हो जाएगा. इस गंभीर बीमारी का भी कोई न कोई इलाज निकल ही आएगा. मैं तो पापा को ठीक करने के लिए लड़ूंगा. अगर आप मेरे साथ लड़ेंगी तो ठीक. नहीं तो मुझे लगेगा कि मेरी मां बहुत कमज़ोर है. हमें लड़ना चाहिए. निकलेगा कोई न कोई इलाज.'

Image caption नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा धमकियों से नहीं डरीं

ये सब चल ही रहा था कि अचानक नीतीश नहीं रहा. पहले 18 महीने बहुत मुश्किल रहे. मुझे नीतीश के सदमे के साथ बीमार पति को भी संभालना था. पहले उनकी न्यूरोलॉजिकल समस्या ऐसी नहीं थी कि अस्पताल में भर्ती कराना पड़े. लेकिन एक साल के बाद अस्पताल के चक्कर लगने शुरू हो गए. उन्हें मैनेज करना था और साथ में कोर्ट के चक्कर जिसके बारे में कुछ भी साफ-साफ़ नज़र नहीं आ रहा था. मुझे कुछ अच्छे लोगों का समर्थन मिला, जिनमें वकील कामिनी जायसवाल ने मेरी बहुत मदद की.

मेरे लिए दुविधा वाली स्थिति हो जाया करती थी. पति पर ध्यान दूं तो लगता था कि केस को मैं नज़रअंदाज़ कर रही हूं. साथ में मैं जॉब भी कर रही थी. लोग कहते थे काम छोड़ दो.

बहुत तनावभरा वक्त था वो. पहले मेरे पति सब कुछ मैनेज करते थे. मैं काम करती थी, लेकिन काम करना और बच्चों को संभालना - यही मेरी मुख्य जिम्मेदारी थी. लेकिन उनके बीमार होने और नीतीश के जाने के बाद कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है, पैसे कैसे मैनेज हो रहे हैं. तो पहले 18 महीने बहुत बुरे थे और शायद उन्हीं से मुझे आगे के लिए ताकत मिली.

वो हालात इतने बुरे थे कि मुझे लगा कि अब इससे अच्छा ही हो सकता है. इन सालों में मैं शादी-ब्याह जैसे पारिवारिक आयोजनों तक में नहीं जा पाती थी, क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कोर्ट की कोई तारीख़ न छूट जाए.

मैं कोर्ट की किसी भी सुनवाई को छोड़ना नहीं चाहती थी. लगता था कि कौन क्या कह देगा. आज लगता है कि न्याय के लिए इतने लंबे समय तक कैसे लड़ा जा सकता है. हर किसी में इतना पागलपन तो नहीं होता न.

नीतीश की याद

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Image caption सुप्रीम कोर्ट ने सुनाई 25 साल की सज़ा

नीतीश मेरा पहला बच्चा था. उससे जुड़े हर लम्हे का एक अलग रोमांच था. उसकी एल्बम अलग बनती थी क्योंकि मेरे पति को फोटोग्राफ़ी का शौक भी था. उन्होंने उसके बचपन के हर लम्हे को कैद किया था.

मेरा दूसरा बच्चा सवा दो साल बाद पैदा हुआ था. दोनों साथ-साथ ही पल रहे थे. हमलोगों ने बहुत ही अच्छा पारिवारिक लम्हा बिताया. नीतीश बहुत हंसमुख बच्चा था. हमें छुट्टियों पर जाना बहुत पसंद था.

उसे ड्राइविंग बहुत पसंद थी. हमलोग वाइल्ड लाइफ़ देखने जाया करते थे. वो बड़ा हो गया था तो अपनी दोस्तों की माओं को भी ले जाता था. उन्हें नीतीश की ड्राइविंग पर भरोसा रहता था. उसके साथ पढ़नेवाली लड़कियां अपने घरों में ये कहकर जाया करती थीं कि हम नीतीश के साथ जा रहे हैं तो घरवालों को तसल्ली रहती थी. वो ड्रिंक नहीं करता था.

हंसने-हंसाने का उसका अंदाज़ बहुत अच्छा था. छोटे भाई का भी वो बहुत ख्याल रखता था. वो 23 साल का ही था लेकिन मुझे लगता है कि उसने बहुत जिम्मेदारी ली हुई थी अपने ऊपर. उसके दोस्त कहा करते थे कि वो ड्रिंक नहीं करता लेकिन हर पार्टी का केंद्र बिंदु हुआ करता था. उसका हंसमुख स्वभाव और जीने का अंदाज़ मैं बहुत 'मिस' करती हूं.

भारती यादव से 'रिश्ता'

नीतीश शुरू से ही को-एड पढ़ता था. लड़कियां घर पर आती-जाती थीं. हमेशा कहा करता था कि घर पर लड़कियों को नहीं लाना चाहिए क्योंकि वो मम्मी के साथ गप्पें लगाने बैठ जाती हैं. भारती के बारे में उसने बताया था, लेकिन मैं अनुमान नहीं लगा सकी. जो गुलदस्ते आते थे, वे बड़े होते जा रहे थे.

दिसंबर में उसने बताया था कि, 'मम्मी, मैं शादी के लिए तो नहीं सोच रहा, लेकिन उसके पिता उसके लिए लड़का ढूंढ रहे हैं. तो बताना पड़ेगा. इसलिए मुझे लगता है कि आपका आशीर्वाद तो है न हमारे साथ.' फिर हम लोगों ने उसे सलाह दी कि अलग किस्म की फैमिली है. अभी भाई का ऐसा-ऐसा केस हुआ है. वो यहां पर कैसे रह पाएगी.

मैं तो कहती थी कि इतने सारे पैसे वो फूलों पर खर्च करती है. तुम्हारी तो पूरी तनख्वाह गुलदस्तों में ही जाएगी. तब वो कहता था कि, 'नहीं मॉम उसको मेरे बारे में सब पता है.' फिर मैंने कहा कि उनको क्या परेशानी है तुमसे. वैसे तो हम चाहेंगे कि तुम हमारे परिवार जैसी किसी लड़की के साथ शादी करो, जो हमारे साथ घुल-मिल सके.

तब वो कहता था कि 'वो हमारे घर आ रही है, मैं थोड़े ही उनके घर जा रहा हूं.' उसने मुझे बताया था कि वे लोग अपनी जाति में शादी करते हैं और सरकारी कर्मचारियों के बारे में सोचते हैं कि वे भिखारी होते हैं. नीतीश हमेशा कहता था कि, 'मम्मी लड़की में क्या ख़राबी है, ये बताइए.' मैं भारती से बहुत कम मिली थी. वो चाहता भी था कि किसी तरह का कोई विवाद न हो जाए.

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मैंने कहा कि भारती में तो कोई बात नहीं थी. जैसे और बच्चे होते हैं वो वैसी ही थी. मैं किसी बच्चे के बारे में बुरा क्यों सोचती. तब वो कहता था कि, 'मम्मी वो वहां से निकलना चाहती है, उसे वहां अच्छा नहीं लगता.' भारती हमारी जैसी ज़िंदगी से बहुत प्रभावित थी. जैसे बर्थ डे पर हम चारों लोग डिनर पर चले जाते थे या फिर हम कहीं घूमने चले जाते थे. लेकिन भारती उसे कहती थी कि वो कुछ भी करे उसे घर में खर्च का हिसाब नहीं देना होता था.

वो अपने दोस्तों को फाइव स्टार होटल में ले जा सकती थी. लेकिन उसे इस बात का दुख रहता था कि उसके पिता कभी उसे भाई-बहनों के साथ कभी चाट खिलाने भी नहीं ले गए. हमारे परिवार की यही बात उसे बहुत प्रभावित करती थी. मतलब परिवार का साथ साधारण ज़िंदगी.

उसने दिसंबर में मुझे ये सब बताया था और कहा था कि 'भारती अपने परिवार में भाई की शादी और चुनाव निपटने के बाद मार्च में हमारे रिश्ते के बारे में बताना चाहती है.' लेकिन मार्च की नौबत ही नहीं आई. सब 16-17 फ़रवरी को ही हो गया. भारती को भाइयों से डर था. उसे लगता था कि भाई जब विदेश चले जाएंगे तब वो अपने पिता से बात करेगी.

मनोबल

जब मैंने मृत नीतीश का शरीर देखा था, वो बुरी तरह जला हुआ था. वो इतनी ख़राब हालत में था कि नीतीश लग ही नहीं रहा था. उससे पहले जब मैं उससे मिली थी तो शादी के लिए तैयार होकर अपने दोस्त के घर गया था, जहां से उसका अपहरण किया गया. उसे देखकर मैं खुद पर संतुलन नहीं रख पाई और लगा जैसे मैं गिर जाऊंगी.

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Image caption भारती के पिता डी पी यादव राजनेता हैं

फिर मुझे लगा कि मैं अगर टूट गई तो फिर उसे न्याय नहीं मिलेगा. वो दूसरों के न्याय के लिए आवाज़ उठानेवाला बच्चा था. उसे बर्दाश्त नहीं होता था कि कोई किसी के साथ बुरी तरह से पेश आए, खासतौर से किसी कमज़ोर के साथ. मैंने यही सोचा कि जिसने भी ये किया है उसे सज़ा मिलनी चाहिए. उसे बचना नहीं चाहिए.

वो फैसला मेरा था या ऊपरवाले का, मैं नहीं जानती, लेकिन उसके बाद ऐसा लगा कि ऊपरवाला मुझे आगे बढ़ा रहा है. मैं जब उसकी शिनाख्त करके लौट रही थी तो मैंने एक डॉक्टर दोस्त से बात की कि दिल्ली में डीएनए टेस्ट कहां होता है. मेरे साथ के लोग हैरान थे मुझे उस वक्त ये बातें करता देखकर. लोगों ने कहा भी कि घर जाकर ये बातें कर लेना. ना मैं रोई, ना चीखी.

आज मैं खुद सोचती हूं कि ये सब कैसे हुआ. मुझे ध्यान था कि जेसिका लाल हत्याकांड में विकास यादव थे और फोरेंसिक सबूतों के साथ कुछ छेड़छाड़ हुआ था - ऐसा न्यूज़ में आया था. दूसरी बात मैंने ये कही कि बॉडी दिल्ली लाई जाए, वो ग़ाज़ियाबाद नहीं रहेगी. फिर उसे दिल्ली लाकर एम्स में रखा गया था. मुझे डर था कि ये बॉडी भी बदल जाएगी. तो फिर डीएनए का क्या होगा. इस तरह का मेरा दिमाग़ उस समय चल रहा था.

जब इस तरह से दिमाग़ चलता है तो ये ऊपरवाला ही चला रहा होता है. आज मैं खुद सोचती हूं कि ये कैसे हुआ. उसके बाद तो यही था कि न्याय दिलाना है. तरह-तरह की धमकियां आती थीं - कभी छुपा के कभी लिखी हुई. मैंने तय कर लिया था कि मैं अज्ञात फोन करनेवालों से बात ही नहीं करूंगी और अज्ञात लोगों की चिट्ठियों का जवाब नहीं दूंगी.

मैं बस उन्हें फाइल में रख लेती थी. ऐसी भी चिट्ठी आती थी कि, 'आपको आपके पति के साथ आपके बेटे के पास पहुंचा दिया जाएगा.' तारीख़ भी होती थी. इन सब में इतना समय लग चुका था और इतनी बर्बादी हो चुकी थी कि मैंने सोच लिया था कि आख़िर तक लड़ना है.

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