बीसीसीआई के लिए 'इधर कुआं, उधर खाई'

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बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल फ़ॉर क्रिकेट इन इंडिया या बीसीसीआई के लिए ये करो या मरो की स्थिति है.

अदालत में चली लंबी बहसों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई से कहा था कि वह लोढा समिति की सिफ़ारिशों को पूरी तरह लागू करे. इन सिफ़ारिशों में यह भी शामिल था बीसीसीआई अधिकारियों के पद संभालने की अधिकतम सीमा तय हो.

सिफ़ारिशों में 'एक व्यक्ति एक पोस्ट' और हर राज्य को बराबर वोट देने की बात की गई थी. लेकिन बीसीसीआई ने इन सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर बीसीसीआई ख़ुद को क़ानून से ऊपर समझता है तो वह ग़लत है. आख़िर पूरा मामला किधर जा रहा है?

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने इस बारे में वरिष्ठ खेल पत्रकार अयाज़ मेमन से बात की.

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट बीसीसीआई से बहुत ख़फ़ा है. अगर कोई आदेश आता है तो सुप्रीम कोर्ट एक निष्पक्ष प्रबंधक नियुक्त कर सकती है. अगर बीसीसीआई ख़त्म हो जाती है तो सभी को अपने पदों से हटना पड़ेगा.

सवाल है कि बोर्ड कौन चलाएगा?

बहुत बड़े सीज़न आने वाले हैं. इंग्लैंड के खिलाफ़ टूर है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ एक सिरीज़ है. भारत न्यूज़ीलैंड सिरीज़ अभी चल रही है.

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट बंद हो जाएगा. क्रिकेट को जारी रखना है. लेकिन सवाल है कि यह कैसे होगा. बीसीसीआई पद अलाभकर हैं या फिर पॉवर के लिए? अगर आप प्रोफ़ेशनल लाना चाहते हैं तो क्या आप सिस्टम रिवाइज़ करेंगे? क्या लोगों को पैसे दिए जाएंगे? ये सब मुद्दे आसान नहीं हैं.

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Image caption अनुराग ठाकुर, अध्यक्ष, बीसीसीआई

क्या बीसीसीआई को साफ़ किया जा सकता है?

हो सकता है. शायद बीसीसीआई को ऐसा खुद ही करना चाहिए था.

यह मामला न्यायालय के पास जाता ही नहीं अगर 2013 में आईपीएल विवाद के बाद बीसीसीआई ख़ुद ही इसकी जांच बिठा देती. अगर बीसीसीआई खुद ही जांच करके दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करती तो मामला न्यायालय के पास नहीं जाता.

लेकिन बीसीसीआई ने यह पोज़िशन ली कि वह कोई ग़लती कर ही नहीं सकती. उन्होंने कहा कि हमारा आदमी शामिल ही नहीं है, और अगर है तो किसी और की ग़लती है. ऐसे ही मामला बढ़ता गया और सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जहां ये लंबे समय तक रहा.

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एक और वजह थी कि बीसीसीआई के जवाब में अनुरूपता नहीं रही.

इसका कारण हो सकता है कि बीसीसीआई के तीन बोर्ड प्रेसिडेंट रहे. पहले जगमोहन डालमिया, फिर शशांक मनोहर और अब अनुराग ठाकुर.

दो हफ़्ते पहले कपिल देव और सुनील गावस्कर ने कहा था कि वे 'एक राज्य एक वोट' के मामले में बीसीसीआई का समर्थन करते हैं. वे यही बात एक साल पहले भी कह सकते थे.

मामला कितना अलग है?

बीसीसीआई के सामने कई परेशानियां आईं. लेकिन ऐसी स्थिति कभी नहीं आई. इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि बीसीसीआई कहती आई है कि वह एक सोसाइटी है. एक डेढ़ साल पहले तक अदालत ने भी यही पोज़ीशन ली थी.

लेकिन इस बार अदालत ने कहा कि आप सोसाइटी हैं और यह राष्ट्र हित का मामला बन गया है. यह केवल बीसीसीआई का मामला नहीं रहा. इस बार यह सबसे प्रमुख और मूल बदलाव है.

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बीसीसीआई और राजनीतिज्ञ

भारत की गली गली में क्रिकेट का बोलबाला है. जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन को भी हर साल बीसीसीआई के 25-26 करोड़ मिलते हैं. पैसे देने वाले को भी इस ताक़त का एहसास होता है.

यह रिश्ता क्रिकेट के बाहर भी फ़ायदेमंद हो सकता है क्योंकि आप एक नेटवर्क बनाते हैं. जिस राज्य ईकाई को पैसे मिलते हैं, उसे सत्ता का एहसास होता है.

भारतीय खेलों में राजनीतिज्ञ हर जगह हैं. राजनेताओं को एक रास्ता मिलता है आम लोगों के साथ जुड़ने का. साथ ही उन्हें सत्ता का भी एहसास मिलता है. बीसीसीआई की मदद से इन लोगों को बहुत सारा धन उसका संचालन करने का मौक़ा मिलता है.

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