'क्या आप कभी किसी पाकिस्तानी से मिले हैं?'

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पाकिस्तानी कलाकारों को भारतीय सिनेमा में काम करना चाहिए या नहीं, आजकल भारत में इस मुद्दे पर हर कोई अपनी राय दे रहा है.

मैं सोचता हूं कि जो लोग बॉलीवुड में पाकिस्तानियों के ख़िलाफ़ हैं या सीधे तौर पर भारत-पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान के ख़िलाफ़ हैं, उनमें से कितने लोग कभी किसी पाकिस्तानी से मिले हैं.

यह एक दिलचस्प बात है कि ज़्यादातर भारतीय हक़ीक़त में कभी भी किसी पाकिस्तानी से नहीं मिले हैं और ज़्यादातर पाकिस्तानियों ने कभी भी किसी भारतीय को नहीं देखा है.

हमारा एक-दूसरे से पहली बार मिलना एक अनोखा अनुभव होता है.

हम एक ही तरह के इंसान हैं, जो केवल एक सीमा रेखा के आर-पार रहते हैं, लेकिन फिर भी हम एक दूसरे से कितने दूर हैं.

यह फ़रवरी 2005 की बात है जब मैं एक पाकिस्तानी शायर हैरिस खलीक़ के साथ इंटरनेट के माध्यम से संपर्क में आया था.

उन्होंने किसी के हाथों अपनी शेरो शायरी की एक किताब मुझे भिजवाई थी. किताब को मेरे पास लाने वाले व्यक्ति दिल्ली में पाकिस्तान इंडिया पीपुल्स फ़ोरम फ़ॉर पीस एंड डेमोक्रेसी के सातवें समारोह में भाग लेने आ रहे थे.

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मैं उस वक़्त काफ़ी उत्साहित हुआ और लगा कि कई पाकिस्तानियों से मिल सकता हूं.

पता नहीं मुझे हमेशा एक-दो पाकिस्तानियों से मिलने की इच्छा क्यों होती है. राजनीतिक या व्यक्तिगत विचारों में मैं कौन हूं, यह जानने के लिए मुझे पाकिस्तानियों से मिलना था.

शायद इसका संबंध मेरा पाकिस्तान बनने के बाद भारत आए शरणार्थियों की दूसरी पीढ़ी से होना है. ऐसा शरणार्थी जिसकी परवरिश लखनऊ की एक शरणार्थी कॉलोनी में हुई, जहां के लोग 1990 के दशक में भी यह समझते थे कि वो एक ऐसे इलाक़े से आए हैं, जहां वो अब नहीं जा सकते. या शायद पाकिस्तानियों के लिए मेरे मन में मौजूद इच्छा, कुछ खो देने की वजह से है.

मैं पीआईपीएफ़पीडी समारोह के अंदर केवल ख़ुद जैसे दिखने वाले लोगों को ढूंढने के लिए चला गया. मैंने एक शख़्स से पूछा कि क्या वो पाकिस्तान से आए हैं, लेकिन उनका जवाब था कि वो दिल्ली के हैं. उसके बाद मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं अपनी शर्मिंदगी कहां छिपाऊं.

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आप कल्पना करें कि एक भारतीय से आप पूछ रहे हैं कि क्या वो पाकिस्तानी हैं? इसलिए उसके फौरन बाद ही किताब लाने वाले पाकिस्तानी को बताकर मैं अपने कॉलेज हॉस्टल लौट आया.

उस घटना के बाद से मैं कई पाकिस्तानियों से मिल चुका हूं, जबकि मैं कभी भी पाकिस्तान नहीं गया. पूरी तरह से अजनबी लोगों से दोस्ती कराने में सोशल मीडिया ने मेरी काफ़ी मदद की है.

मैं दिल्ली और उसके आस पास पाकिस्तानियों से मिलना पसंद करता हूं. मैं अपने शहर और अपने देश को उनकी आंखों से देखता हूं. मैं उन चीज़ों के बारे में पूछता हूं, जिस पर कभी लोगों ने ध्यान दिया हो या नहीं दिया हो.

सवालों और जवाबों के बीच पाकिस्तानियों के साथ समय गुज़ारना मेरे लिए बेहतरीन अनुभव होता है.

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कई पाकिस्तानी जब पहली बार दिल्ली आते हैं तो वो पुरानी दिल्ली ज़रूर जाना चाहते हैं ताकि देखें कि क्या कोई आज भी ग़ालिब की तरह उर्दू बोलता है. लेकिन उन्हें निराशा होती है. शॉपिंग पर जान देने वाले ही दिल्ली हाट में ख़रीददारी करने के लिए जाते हैं.

दिल्ली आए ज़्यादातर पाकिस्तानी दो जगहों - पवित्र निज़ामुद्दीन दरगाह और ख़ान मार्केट ज़रूर जाना चाहते हैं. निज़ामुद्दीन की दरगाह के बाहर वो अल्लामा इक़बाल के लिखे गए कलाम का आनंद लेते हैं, जिसका अनुभव ख़ान मार्केट में नहीं मिलता है.

ख़ान मार्केट की स्थापना ख़ान अब्दुल जब्बार ख़ान के नाम पर 1952 में की गई थी. वो बादशाह ख़ान के बड़े भाई थे और पश्चिमी पाकिस्तान के पहले मुख्यमंत्री थे.

दिल्ली में वो एक अपनापन महसूस करते हैं, लेकिन फिर भी यह उनका घर नहीं है. उन्हें लगता है कि ये कैसी जगह है जहां के लोग उन्हीं की ज़ुबान में बात करते हैं, फिर भी यह अलग है. यह शहर जो लाहौर की तरह महसूस होता है लेकिन फिर भी कोई 'फ़ारिग़' शब्द का मतलब नहीं जानता है.

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हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और हुमायूं के मक़बरे के इस शहर में ज़्यादातर लोगों का नाम बालीवुड के नामों की तरह होता है. यह शहर ज़्यादातर पाकिस्तानियों को थोड़ा हैरान- थोड़ा परेशान करता है.

मैं ऐसे नास्तिक पाकिस्तानी मुसलमान से मिला हूं जो दिल्ली के जामा मस्जिद में ईद की नमाज़ पढ़कर ख़ुद को तकदीर वाला समझता है. मैं ऐसे कट्टर धार्मिक पाकिस्तानियों से भी मिला हूं जो हिन्दू मंदिर दिख जाने पर उससे फौरन ही अपनी नज़र हटा लेते हैं.

मैं ऐसे उर्दू लेखकों से मिला हूं जो जानना चाहते हैं कि क्या भारत के मुसलमान क्रिकेट और जंग में पाकिस्तान की तरफदारी करते हैं. मैं ऐसे लाहौरी वामपंथी से भी मिला हूं जो नहीं चाहता है कि उसके ज़हन में जो सेक्यूलर भारत की छवि है वो चूर चूर हो जाए.

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मैं ऐसे पाकिस्तानी से भी मिला हूं जो भारत के बारे में जानना चाहते हैं. वे लोग यहां महिलाओं को स्कूटी चलाते देखकर हैरान होते हैं और यहां के भोजन से मायूस होते हैं. वो यह भी कहते हैं कि पाकिस्तानी लोग दिखने में बहतर होते हैं.

फिर भी पाकिस्तानी लोग हल्दीराम का काजू कटली लेकर लौटते हैं और कुछ लोग वीर-ज़ारा जैसी अपनी ही एक कहानी पर हैरान होते हैं.

पाकिस्तानी लोग घर से दूर होकर भी यहां की गलियों में आज़ादी से घूमना पसंद करते हैं, जबकि यह एक विदेशी धरती है लेकिन यहां उनके लिए घर जैसा एहसास मौजूद है.

भारत के बार में एक पाकिस्तानी कहता है कि उसे भारत में आज़ादी का एहसास होता है. लेकिन एक अनय पाकिस्तानी को सड़क पर अकेले निकलने से डर लगता है, वह घबराता है कि अगर किसी को पता चला कि वो पाकिस्तानी है तो क्या होगा?

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आख़िरकार मुझे ऐसा लगता है कि भारत आए पाकिस्तानियों से बात कर के मुझे पाकिस्तान को समझने में कोई मदद नहीं मिलेगी.

उन लोगों से मिलने पर मुझे यही पता चला है कि हर इंसान चाहे वो भारतीय हो या पाकिस्तानी एक अलग शख़्सियत है. हमारे पासपोर्ट का रंग उन कई चीज़ों में से बस एक है जो हमारी इंसानियत की परिभाषा देता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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