शादीशुदा ज़िंदगी में क्या है क्रूरता

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भारत में तलाक़ के एक केस में सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले की खूब चर्चा हो रही है. इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पूरे परिवार को जोड़कर रखने की ज़िम्मेदारी, जीवनसाथी के बार-बार आत्महत्या की धमकी देने और एक दूसरे के चरित्र पर सवाल उठाने के मुद्दों की चर्चा की है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में 'क्रूरता' का ज़िक्र किया है. भारत में तलाक़ के लिए किए जाने वाले मुकदमों में क्रूरता को आधार बनाना सबसे आम वजहों में से एक है.

क्रूरता की कोई परिभाषा देना शायद सबसे मुश्किल काम होगा. कानूनी तौर पर क्रूरता का पैमाना और इसकी परिभाषा हर केस में अलग-अलग होती है. यह किसी शादी की किसी ख़ास अवस्था और सामाजिक-आर्थिक हालात पर भी निर्भर करता है.

जहां तक शारीरिक क्रूरता का सवाल है तो इसे पीड़ित के शरीर पर पड़े निशान के रूप में साफ़तौर पर देखा जा सकता है.

लेकिन असल मामला मानसिक क्रूरता या प्रताड़ना का है, जिसे किसी की शादीशुदा ज़िंदगी के जीवन में पहचान पाना मुश्किल होता है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिशा-निर्देश तय किए हैं . इसके आधार पर वैवाहिक जीवन में क्रूरता की पहचान की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग आदेशों के मुताबिक़ इन बातों को क्रूरता माना जा सकता है.

1. किसी शारीरिक या उचित कारण के बिना जीवनसाथी के साथ लंबे समय के लिए शारीरिक संबंध न बनाने के एकतरफा फ़ैसले को मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

2. पति या पत्नी का शादी के बाद कोई बच्चा पैदा न करने के एकतरफ़ा फ़ैसले को मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

3. अत्यधिक मानसिक तनाव, दर्द और दुख, जिसकी वजह से पति पत्नी का एक साथ रह पाना मुमकिन न हो पाए तो उसे भी मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

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4. पूरी शादीशुदा ज़िंदगी का विस्तार से मूल्यांकन करने पर यदि यह साफ़तौर पर ज़ाहिर हो कि पति या पत्नी में जो भी पीड़ित हो तो उसे साथ रहने और सब कुछ सहने के लिए नहीं कहा जा सकता. तो यह हालात मानसिक क्रूरता को बयां करता है.

5. केवल सामान्य बर्ताव या जीवनसाथी से कम लगाव होने को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता है, हालांकि लगातर रूखा व्यवहार, चिड़चिड़ापन, बेरुख़ी और उपेक्षा से शादीशुदा ज़िंदगी ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जो पीड़ित के लिए असहनीय हो तो इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

6. पति या पत्नी के गहरे शोक, दुख या मायूसी की वजह यदि लंबे समय से उसके जीवनसाथी का बर्ताव है तो इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

7. लगातार गाली-गलौच और अत्याचार या उत्पीड़न जिससे किसी एक की ज़िंदगी तकलीफ से भर जाए, तो उसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

8. जीवनसाथी में से किसी एक की मानसिक या शारीरिक सेहत इतनी बिगड़ गई हो, जिसका उचित कारण नहीं बताया जा सकता हो. जिसका ज़िक्र इलाज में बहुत गंभीर तौर पर, ठोस और सख़्त तरीके पर किया गया हो तो उसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

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9. अगर कोई पति स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी वजह के बगैर या अपनी पत्नी को बिना बताए और उसकी सलाह के बगैर बंधियाकरण (स्टेरलाइजेशन) करा लेता है तो इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

10. इसी तरह अगर कोई पत्नी किसी चिकित्सकीय कारण के बिना ही अपने पति को बिना बताए या उसकी अनुमति के बगैर नसबंदी या गर्भपात कराती है तो उसे भी मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

11. अगर किसी को बहुत ही बुरा बर्ताव सहना पड़ा हो, उसकी उपेक्षा की गई हो, या फिर उसके साथ शादीशुदा ज़िंदगी के आम बर्ताव से पूरी तरह अलग बर्ताव रहा हो. जिसकी वजह से उसके मानसिक स्वास्थ्य या उसके यौन सुख पर बुरा असर पड़ा हो तो उसे भी मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

यह भी दिलचस्प है कि इन बातों को शादीशुदा ज़िंदगी की आम समस्याओं के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. असल में हर किसी को शादीशुदा ज़िंदगी में थोड़ी बहुत परेशानियों के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि यह शादी के बाद ख़ुद को ढालने का समय होता है. हर परेशानी को मानसिक क्रूरता नहीं समझा जाना चाहिए.

क्रूरता का कोई तय पैमाना नहीं है. यह नई शक्ल में आता रहता है. असल में ये क़ानून भी बदलते दौर के साथ सामने आए हैं.

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