जाति प्रथा पर क्या कहते हैं स्वयंसेवक?

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कई दशकों से दशहरे के दिन महाराष्ट्र के नागपुर में एक सिलसिला चला आ रहा है. विजयादशमी पर्व पर यहाँ दो विशाल आयोजन दिखाई देते हैं.

पूर्वी नागपुर के रेशमबाग मैदान से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों गणवेशधारी स्वयंसेवकों का पथ संचालन होता है और यहीं सरसंघचालक का कार्यक्रम भी होता है.

सन 1925 में दशहरे के दिन डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने इस मैदान से कुछ दूरी पर महाल इलाके में संघ की स्थापना की थी.

उधर पश्चिम नागपुर की दीक्षाभूमि में देश दुनिया के कोने कोने से आये दलित वर्ग के लोगों का हुजूम उमड़ता है.

यह वही स्थान है जहाँ दशहरे के दिन 1956 में डॉ भीमराव आम्बेडकर ने हिन्दू धर्म का त्याग कर लाखों दलित अनुयाइयों के संग बौद्ध धर्म को अपनाया. दलित एक्टिविस्ट इस दिन को अशोक विजयादशमी कहते हैं और धम्म चक्र प्रवर्तन दिन भी.

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नागपुर में दीक्षाभूमि पर विजयादशमी के आसपास प्रायः हर वर्ष कई लोग बौद्ध धर्म अपनाते हैं. इनमें अधिकतर दलित होते हैं. इस बार कुछ अन्य शहरों में भी ऐसे आयोजन हो रहे हैं.

पिछले कई वर्षों से लगातार संघ के सरसंघचालक अपने भाषण में जाती-भेद की खाई पाटने का आह्वान करते आये हैं.

इस दौरान अमूमन संघ के समरसता मंच के कार्यों की बात होती है, जिनमें दलित बस्तियों में जाकर जाति प्रथा के खिलाफ किये जा रहे काम भी शामिल होते हैं.

इस बार सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने आरएसएस के स्वयंसेवकों के किए गए सर्वे का उल्लेख करते हुए अपने भाषण में छुआछूत की प्रथा का जिक्र किया.

उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों के सर्वेक्षण के नतीजों का हवाला देते हुए कहा, ''अभी मध्य भारत में सर्वेक्षण हुआ. मध्य भारत यानी मध्य प्रदेश राज्य का एक भाग-मालवा और महाकौशल छोड़कर उस प्रांत में नौ हजार गांवों में सर्वेक्षण किया गया. इसमें पता चला है कि 30 प्रतिशत गांवों में अब भी पानी भरने की जगह पर भेदभाव वाला आचरण होता है. मंदिरों में भी 25-30 प्रतिशत तक भेदभाव होता है और श्मशान घाटों में भी.''

उन्होंने बताया कि इसे खत्म करने के उपाय किए जाएंगे. सरसंघचालक का कहना था कि ऐसे ही सर्वेक्षण तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर कर्नाटक और दक्षिण तमिलनाडु में हुए हैं और राजस्थान में ये चल रहा है.

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दलितों के बारे में आरएसएस प्रमुख के इस बयान पर बीबीसी ने कुछ स्वयंसेवकों से बात की.

18 वर्षीय स्वयंसेवक सर्वे लोहकरे ने जाति प्रथा के सवालों के बारे में कहा, ''शाखा में मैं पहली क्लास से आ रहा हूँ. और शाखा में कभी मुझसे किसी ने मेरी जाति के बारे में पूछा नहीं. यानी ऐसा कभी हुआ नहीं किसी ने पूछा हो - तुम किस जाति के हो या किस धर्म के हो. ऐसा महसूस हुआ कि यहाँ सबको समान अधिकार और अवसर हैं."

आजमगढ़ (यूपी) से आये दयाशंकर सिंह एक व्यवसायी हैं और स्वयंसेवक के तौर पर नए गणवेष में नागपुर के रेशमबाग मैदान पर पहुँचे थे.

उन्होंने माना कि हिन्दू समाज में जाति प्रथा आज भी वास्तविकता है. उनके अनुसार, कुछ लोग छुआछूत का अब भी पालन करते हैं इसलिए कई दलित लोग हिन्दू समाज से दूरी बनाकर रखते हैं. उनका कहना था कि संघ उन तक पहुँच रहा है और उन्हें समझा रहा है.

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मराठा समाज से स्वयंसेवक रवि डम्भारे को मराठा मार्च और बीबीली ने उनसे दलितों के बौद्ध धर्म में प्रवेश करने की घटनाओं पर पूछा.

उन्होंने कहा, ''हम सामाजिक समरसता का काम कर रहे हैं. जैसा अभी भाषण में आया है कि हर गाँव में एक कुआँ सबके लिए हो, वहाँ श्मशान भूमि एक ही चाहिए. मंदिर भी एक ही चाहिए, तभी तो हम एक होंगे. बाकी जो बातें चल रही हैं वो नफरत फैलाने वाली चीजें हैं, पॉलिटिकली मोटिवेटेड लोग हैं जो फैला रहे हैं. ये नहीं होना चाहिए.''

कुल मिलाकर संघ के स्वयंसेवक मानते हैं कि इस दिशा में अभी बड़ा काम बाकी है.

उधर दशहरे के ही दिन दीक्षाभूमि पर उमड़ी भीड़ डॉ आम्बेडकर को याद कर रही थी.

बाबा साहब से जुडी किताबें, कैलेंडर और मराठी लोक गीतों की सीडी, डीवीडी के स्टाल्स पर ख़ासी भीड़ देखी गई.

इन गीतों में डॉ अम्बेडकर का जिक्र 'माझा भीमराया', 'दलितों के मसीहा', 'प्रज्ञा सूर्य' और 'महामानव' के तौर पर किया जाता है.