सपा की उथल पुथल पर सैफई चुप है

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समाजवादी पार्टी के अंदर मचे घमासान के बाद मुलायम सिंह के गांव सैफ़ई में क्या चल रहा है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया, उसके प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव के बारे में एक बात समान है- वो ये कि सभी एक ही गांव और एक ही परिवार के हैं.

यही नहीं, परिवार में राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों की एक लंबी लिस्ट है और कहा ये जाता है कि इस परिवार का शायद ही कोई ऐसा सदस्य हो जो उम्र की अर्हता पूरी करता हो और 'जनप्रतिनिधि' न हो.

यह राजनीतिक परिवार इतना अब इतना बड़ा हो गया है कि सभी की महत्वाकांक्षाएं जोर मारने लगी हैं और नतीजा परिवार में गुटबाज़ी और विवाद खुलकर सड़क पर आ गया है.

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पिछले एक महीने से यादव परिवार के भीतर दो गुटों में जिस तरह से शह और मात का खेल चल रहा है वो प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में चर्चा का विषय है.

ये लड़ाई देश भर में भले ही सुर्खियां बटोर रही हो और इस पर संपादकीय लिखे जा रहे हों, लेकिन यादव परिवार के पैतृक गांव सैफ़ई में लोगों को इस बारे में कुछ नहीं पता, या यों कहें कि कोई कुछ बताना नहीं चाहता.

महानगरों जैसी चमचमाती सड़क के ज़रिए इटावा शहर से सैफ़ई पहुंचने के बाद जब इस बात की पड़ताल करने की कोशिश की गई तो दो दिन घूमने के बावजूद कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो कि माइक पर इस पारिवारिक विवाद के बारे में कुछ बता सके. हालांकि 'ऑफ़ द रिकॉर्ड' लोगों ने बात की लेकिन वो भी बहुत सावधानी से.

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गांव में प्रवेश करते ही तीन पहिये वाली साइकिल पर घूम रहे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति राम रतन से हमारा सामना हुआ. कुछ लोगों ने बताया कि ये गांव के सबसे उम्रदराज़ व्यक्ति हैं. ख़ुद राम रतन का कहना था कि वो सौ साल के हैं.

उन्होंने सैफ़ई गांव के विकास की लंबी चर्चा की लेकिन यादव परिवार में चल रही खींचतान के बारे में सीधे कहते हैं, "इस बारे में हम कुछ नहीं कहेंगे. राजाओं की लड़ाई में हमारी क्या दिलचस्पी? टीवी में देख लेते हैं बस."

गांव में आगे बढ़ने पर कुछ लोग हमें बातचीत करते दिखे. ऐसा लगा कि इन लोगों की राजनीति में दिलचस्पी होगी. सभी लोग बार-बार कान में मोबाइल फ़ोन पर बातचीत कर रहे थे, पास जाने पर ऐसा समझ में भी आया कि इनकी बातचीत के मुद्दों में ये भी शामिल होगा जिस पर हम इनसे बात करना चाहते हैं, लेकिन हमें कुछ पता नहीं चल सका.

इस समूह में युवा से लेकर बच्चे तक थे. माइक ऑन करने से पहले ये ख़ूब बातें कर रहे थे, लेकिन उसके बाद साफ़तौर पर कह दिया, "हमें क्या पता, क्या हो रहा है. हम तो अख़बार भी कभी-कभी पढ़ते हैं और टीवी देखते नहीं."

हालांकि इन लोगों की हँसी ये भी बता रही थी कि ये जो कह रहे हैं, उसका यक़ीन न किया जाए.

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Image caption सैफई में मुलायम सिंह यादव का घर

वहीं जब हमारी मुलाक़ात सैफ़ई मेडिकल कॉलेज के एक डॉक्टर अक्षय यादव से हुई तो उन्होंने इस पर कुछ बताने की कोशिश ज़रूर की, लेकिन नफ़ा-नुक़सान तौलकर. वो कहते हैं, "कोई लड़ाई, कोई तक़रार नहीं है. नेताजी पार्टी के मुखिया हैं और अखिलेश यादव उनके संघर्ष के उत्तराधिकारी. बाकी सब कार्यकर्ता हैं."

बहरहाल, हम इस वीआईपी गांव के प्रधान दर्शन सिंह यादव से मिलने की भी इच्छा लेकर यहां दाखिल हुए थे. दर्शन सिंह यादव लंबे समय से इस गांव के निर्विरोध प्रधान हैं और बताया गया कि वो जब तक जीवित रहेंगे तब तक निर्विरोध बनते रहेंगे, क्योंकि इस संबंध में नेताजी ने नियमों तक में बदलाव करा दिया है.

नेताजी यानी मुलायम सिंह के बेहद क़रीबी हैं दर्शन सिंह और पिछले दिनों उन्हें यश भारती पुरस्कार भी दिया गया था. मुलायम सिंह के परिवार में वो एक सम्मानित बुज़ुर्ग की हैसियत रखते हैं.

गांव के चौराहे पर एक चाय की दुकान पर वो हमसे मिलने के लिए ख़ुद आए. बोले, "घर की लड़ाई है, हम बीच में क्यों टांग अड़ाएं. आज लड़ रहे हैं, कल फिर एक हो जाएंगे."

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Image caption सैफ़ई के ग्राम प्रधान दर्शन सिंह यादव मुलायम परिवार के नज़दीकी हैं

दरअसल गांव के लोग इस बारे में चर्चा करने से कतरा रहे हैं. वहीं इलाक़े के दूसरे राजनीतिक दलों के लोग कहते हैं कि ऐसा तो होना ही था.

प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और इटावा ज़िला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सूरज सिंह यादव उपनिषद के एक श्लोक का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "जहां सब महत्व की इच्छा रखते हों, उस परिवार को पतन की ओर जाना ही है. मुलायम सिंह यादव भले ही लीपा-पोती करने की कोशिश करें, लेकिन ये दरार अभी और चौड़ी होगी. ये सीधे तौर पर सत्ता पाने की लड़ाई है."

क़रीब चार हज़ार की आबादी वाले इस गांव की ख़ासियत ये है कि जितने जन प्रतिनिधि इस समय इस गांव में हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी और गांव में हों. और गांव वालों की दुविधा ये है कि वो किसके पक्ष में या किसके विरोध में खड़े हों?

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Image caption इटावा कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष अर्जुन सिंह यादव के मुताबिक समाजवादी पार्टी में सत्ता पाने की लड़ाई बढ़ रही है.

बातचीत के दौरान गांव के ही एक व्यक्ति ने गांव वालों की इस स्थिति की तुलना राम रावण युद्ध के समय देवताओं से की, जो सिर्फ़ 'जय हो' बोल रहे थे- न तो राम की और न ही रावण की.

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