'मंटो की ज़िंदगी इतनी दिलचस्प कि फ़िल्म बनाई'

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साल 2008 में जब मैं बतौर निर्देशक अपनी पहली फ़िल्म 'फ़िराक़' कर रही थी, तभी मैंने सोच लिया था कि मंटो की कहानियों पर एक फ़िल्म बनाऊंगी. लेकिन जैसे-जैसे मैं मंटो को पढ़ती गई, उन्हें जानती गई तो लगा कि उनकी ख़ुद की ज़िंदगी इतनी दिलचस्प है कि उन पर फ़िल्म बन सकती है.

फिर क्या था साल 2012 में मैंने मंटो के बायोपिक पर काम करना शुरू किया. स्क्रिप्ट लिखी. स्क्रिप्ट क्या थी बस उनके बारे में रिसर्च थी जिसे मैं पिरोती जा रही थी.

अब 2016 आ गया है और हम एक स्क्रिप्ट के साथ तैयार हैं.

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मेरी क्रिएटिव टीम के साथ इस बात को लेकर बहुत लड़ाई होती है कि किस हिस्से को निकालूं, किसे नहीं. मुझे सब ज़रूरी लगता है. जबकि उन्हें कमर्शियल वैल्यू के हिसाब से फ़िल्म की लेंथ भी देखनी है. ख़ैर, अब फ़िल्म जल्दी ही फ़्लोर पर आ सकती है. इसके लिए नवाज़ुद्दीन का नाम भी तय हो गया है.

मुझे मालूम है कि आप पूछेंगे कि मैंने नवाज़ को ही क्यों चुना. नवाज़ुद्दीन को ही इस रोल में लेने के कई कारण थे, लेकिन पहले आपको मंटो को समझना पड़ेगा.

बतौर निर्देशक मेरा मंटो बेबाक है, आज़ाद है. वो जैसा कहना चाहता है वैसा ही कहता है. मंटो एक जगह कहते हैं, "अगर आपको मेरी कहानियां क़ाबिल-ए-बर्दाश्त नहीं लगती हैं तो वो इसलिए क्योंकि ये वक़्त, ये दौर ही क़ाबिल-ए-बर्दाश्त नहीं है."

तो मंटो की कहानियां एक आईना, एक प्रतिबिंब थीं उस समाज का. वो सच कहती थीं, जैसे आप और हम कहना चाहते हैं, शायद कह नहीं पाते.

दूसरी ओर मंटो के किरदार में रेंज भी बहुत हैं. वो एक संजीदा इंसान हैं जिसमें कई भाव हैं, वो चालाक हैं, गुस्से वाले हैं, मज़ाक़ करते हैं, डरे हुए हैं और ऐसे में उन्हें परदे पर ज़िंदा करने के लिए एक ऐसे शख़्स की ज़रुरत थी जो इतनी शख़्सियतों को जी सके. और नवाज़ में वो हुनर है.

ख़ैर वो परदे पर दिखेगा, लेकिन ज़िंदगी में मंटो एक दिलचस्प इंसान हैं. उनके बारे में आप पढ़ना शुरू करेंगे तो स्तब्ध हो जाएंगे.

एक बात जो मंटो के बारे में बड़ी दिलचस्प है वो यह कि भले ही आज पाकिस्तान और हिंदुस्तान उन्हें अपने-अपने मुल्क का बताने पर तुले हों, लेकिन मंटो ख़ुद को मुंबई का मानते थे.

वो बंटवारे से ख़ुश नहीं थे. और बस एक शहर मुंबई से राबता रखना चाहते थे. कहते थे, "मुझे हिन्दुस्तान से कुछ नहीं लेना और न लेना पाकिस्तान से, ये शहर मुंबई जिधर घूमेगा मैं वहां चला जाऊंगा." सो उनको किसी मुल्क में बांटना मंटो के साथ नाइंसाफ़ी हो जाएगी. और फ़िल्म में मैं इस बात का ध्यान रखूंगी.

मंटो को लेकर जो सबसे अच्छी बात कही गई है, वो कही है सलमान रुश्दी ने. वो कहते हैं, "मंटो न सिर्फ़ हिन्दुस्तान के, न सिर्फ़ पाकिस्तान के, वो तो दक्षिण एशिया के सर्वश्रेष्ठ लघु कहानीकार हैं."

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एक बात और, कई लोगों को लगता है कि मंटो महिलाओं को लेकर बहुत ख़राब लिखते हैं या वो महिला विरोधी हैं. लेकिन मैं कहती हूं कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि उनको तो फ़ेमिनिस्ट लेखक कहा जाता है.

अपनी कहानियों में उन्होंने औरतों को जैसे दिखाया है और ख़ासतौर से सेक्स वर्करों को, जिन्हें आज भी हमारे समाज में हाशिए पर रखा गया है, उन्हें वो अपनी कहानी में एक ऐसी सम्माजनक जगह देते हैं जिससे मालूम चलता था कि वो औरतों को भी एक इंसान, एक व्यक्तित्व समझते थे.

उनमें औरत की नज़र से दुनिया को देख सकने का माद्दा था. वरना कितने ऐसे लेखक हैं जिन्होंने युद्ध की विभीषिका में राजनीति, मुल्कों, धन-दौलत से परे हटकर युद्ध या बंटवारे की आड़ में औरतों पर हो रहे ज़ुल्मो-सितम की कहानी लिखी? इसी से पता चलता है कि वो महिलाओं को लेकर कितने संवेदनशील थे.

और अब सबसे अहम सवाल कि मुझे मंटो की कौन सी कहानी सबसे पसंद है? तो जनाब मंटो ने तक़रीबन 300 कहानियां लिखी हैं और किसी एक को पसंदीदा कह देना बाक़ी कहानियों के साथ नाइंसाफ़ी हो जाएगी.

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लोग टोबा टेक सिंह, बू, ठंडा गोश्त जैसी कहानियों को याद करते हैं लेकिन सरकंडों के पीछे असाइनमेंट, लाइसेंस जैसी कितनी ही बेहतरीन कहानियां हैं जिन्हें आप पढ़ेंगे तो वो आपको पिछली कहानी से अच्छी और बेहतर लगेगी. तो बस ये अपराध न करवाइए कि कोई एक कहानी चुनो.

हर वो कहानी जिसमें मंटोयियत है, वो कहानी मेरी पसंदीदा है!

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