शिवराज के एमपी में सबसे अधिक बच्चे कुपोषित

श्योपुर ज़िले के सुबकरा गांव के 10 माह के सन्नी की मौत 16 जून को हो गई थी. श्याम आदिवासी के पुत्र सन्नी को एक दिन पहले ही पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया गया था.

श्याम आदिवासी ने बीबीसी से कहा, "उसकी तबीयत ठीक नहीं थी. हमने उसे 15 तारीख़ को भर्ती कराया और वो अगले ही दिन चल बसा. उसका इलाज सही तरह से नहीं किया गया. मौत के बाद हमें गांव भेज दिया गया."

मध्य प्रदेश का श्योपुर फिर से सुख़ियों में है, वजह है कुपोषण से हो रही मौतें.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने श्योपुर ज़िले के तीन विकास-खंडों में पांच माह में 116 बच्चों की मौत पर राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.

बताया जा रहा है कि क्षेत्र में चिकित्सकों और सुविधाओं का भारी अभाव है.

मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह ने माना है कि राज्य में 70 हज़ार बच्चे अति कुपोषित हैं, लेकिन वो ये भी कहते हैं कि इसकी वजह क्षेत्र में फैला अंधविश्वास है. उन्होंने कहा कि लोग इलाज कराना नहीं चाहते हैं.

मध्य प्रदेश देश का वो राज्य है जहां सबसे ज्यादा शिशुओं की मौत होती है.

रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के सैम्पल रजिस्ट्रेशन सर्वे की 2014 के लिए पिछले माह जारी रिपोर्ट के मुताबिक़ मध्यप्रदेश शिशु मृत्युदर के मामले में देश में सबसे ऊपर है.

मध्यप्रदेश वो राज्य है जहां हर एक हज़ार बच्चों में से 52 बच्चे अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते हैं.

निसेफ़ के मनीष माथुर बताते हैं, "मध्य प्रदेश में पांच वर्ष से छोटे बच्चों की बाल मृत्यु दर, एक वर्ष से छोटे बच्चों की शिशु मृत्यु दर और एक माह से छोटे बच्चों की नवजात शिशु मृत्यु दर - राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा है. नवजात शिशु मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत 26 है जो कि मध्यप्रदेश में 35 है. शिशु मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत 39 है जो मध्य प्रदेश में 52 है और पांच वर्ष से छोटे बच्चों की मृत्यु दर देखें तो मध्य प्रदेश में ये 65 है जबकि देश में 45 है. इससे प्रतीत होता है कि ये एक ऐसा क्षेत्र है जहां हमें काफी काम करना होगा."

सबसे ज्यादा चिंताजनक हालात ग्रामीण क्षेत्रों में है जहां शिशु मृत्यु दर 57 है. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति ऐसी है कि हर एक हज़ार लड़कियों में से 58 लड़कियों की मौत एक साल की होने से पहले ही हो जाती है.

कुपोषण के मामले में भी मध्य प्रदेश की स्थिति अच्छी नहीं है. देश में कुपोषण में प्रदेश का स्थान दूसरे नंबर पर है.

भोजन के अधिकार के लिए काम करने वाले सचिन जैन कहते हैं, "बच्चों के स्वास्थ्य और कुपोषण के मामले को प्रदेश में राजनैतिक रूप से बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता. ये एक वजह है कि हम लगातार पिछड़े हुए नज़र आते हैं. हम भले दावा करते रहें, प्रदेश का कृषि क्षेत्र में जो विकास है वो तक़रीबन 22 या 24 प्रतिशत है पर वो इसमें कहीं नहीं दिखाई देता है. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार का ज़ोर स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण पर है जो किसी भी तरह से फ़ायदा नहीं पहुंचाएगा. निजी क्षेत्र मुनाफ़े के लिए ही आएगा."

वहीं सरकार ने कुपोषण और मातृ और शिशु मृत्यु दर के हालात को लेकर श्वेत-पत्र जारी करने की बात कही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने महिला एवं बाल विकास और स्वास्थ्य विभाग के साथ आम लोगों को लेकर कुपोषण के ख़िलाफ अभियान चलाने को भी कहा है.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संचालक वी. किरण गोपाल ने बताया, "हम कई तरह की कोशिश कर रहे हैं ताकि शिशु मृत्यु दर को कम किया जा सके. इसके तहत महिला स्वास्थ्य शिविर और रोशनी क्लिनिक लगाए जा रहे हैं. ये काम बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं. इसमें कोशिश की जा रही है कि दूरदराज़ के लोगों तक भी पहुंचा जा सके ताकि स्थिति में सुधार हो."

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