दहाड़ पाएंगे अखिलेश-मुलायम के 'शेर'?

इटावा ज़िले की ग़िनती कभी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के उन ज़िलों में होती थी जहां के बीहड़ों में डकैतों का ख़ौफ़ रहता था. लेकिन जब बीहड़ डकैतों से आज़ाद हुए और इटावा ज़िले के सैफ़ई गांव से मुलायम सिंह यादव और उनका परिवार देश और प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आया तो अपने गांव और इस शहर में इन लोगों ने तमाम ख़्वाब देखे.

उन्हीं ख़्वाबों में से एक ये भी था कि जिन बीहड़ों में डकैतों का ख़ौफ़ था और कभी वहां से बंदूकों की आवाज़ें आती थीं, उन्हीं बीहड़ों में शेरों की दहाड़ सुनाई दे.

इटावा ज़िला मुख्यालय से क़रीब छह किमी. दूर क़रीब साढ़े तीन सौ हेक्टेयर के बीहड़ इलाक़े में बन रहे लायन सफ़ारी में शेरों के रहने लायक़ माहौल तैयार करने की ख़ूब कोशिश की गई, लेकिन शेर हैं कि रहने का नाम नहीं ले रहे.

पिछले दो साल के भीतर अब तक कुल नौ शेरों की मौत हो चुकी है, जिनमें चार गुजरात के वन्य जीव अभयारण्यों से लाए गए शेर और बाक़ी उनके बच्चे थे.

लगातार शेरों के मरने के बाद लायन सफारी का नाम बदल कर इटावा सफ़ारी पार्क कर दिया गया और उसके बाद यहां चार अन्य सफ़ारी बनाए जाने का निर्णय लिया गया.

गत छह अक्टूबर को मुख्यमंत्री ने हिरण सफ़ारी का उद्घाटन भी किया और उसके लिए दस हिरणों को यहां लाया भी जा चुका है.

Image caption इटावा लायन सफ़ारी पार्क के उपनिदेशक अनिल कुमार पटेल

इटावा लायन सफ़ारी पार्क के उपनिदेशक अनिल कुमार पटेल बताते हैं कि ज़्यादातर शेरों की मौत कैनाइन डिस्टेंपर नामक बीमारी के कारण हुई है जो कि एक वायरल बीमारी है. पटेल कहते हैं कि ये बीमारी इन शेरों को पहले से थी या फिर यहां आने पर हुई - पता नहीं, लेकिन शेरों में ये बीमारी अक्सर पाई जाती है और गुजरात में भी कई शेर इस बीमारी से मर चुके हैं.

अनिल कुमार पटेल बताते हैं, "गुजरात से कुल 11 शेर मँगाए गए थे, जिनमें से चार की अब तक मौत हो चुकी है. बाक़ी पांच मरने वाले शावक थे और उनमें तीन शावक मरे हुए ही पैदा हुए थे जबकि दो शावकों की मौत पैदा होने के क़रीब एक दिन बाद हुई."

इटावा में लायन सफ़ारी का प्रस्ताव समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उस वक़्त रखा था जब वो 2003 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने थे.

इटावा के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शाक्य बताते हैं, "इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2003 में हुई और 2005 तक इस पर काम भी शुरू हो गया. लेकिन सरकार जाने के बाद ये प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में चला गया. 2012 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस पर तेज़ी से काम शुरू हो गया."

वन्य जीवों के कुछ जानकार कहते हैं कि ये इलाक़ा और यहां का पर्यावरण शेरों के अनुकूल नहीं है, बावजूद इसके शेरों को जबरन गुजरात से लाया जा रहा है. इनका दावा है कि वातावरण के अनुसार ख़ुद को न ढाल पाने के कारण ही शेरों की मौत हो रही है.

लेकिन लॉयन सफ़ारी पार्क के निदेशक के. प्रणव राव कहते हैं कि गुजरात और इटावा के मौसम में कोई बहुत अंतर नहीं है. सिर्फ़ जाड़ों में ही दिक़्क़त होती है और उसके हिसाब से यहां पूरी व्यवस्था की गई है. राव कहते हैं कि गर्मी का तापमान इटावा और गुजरात का लगभग बराबर है, इसलिए शेरों के मरने के लिए मौसम की प्रतिकूलता की बात सही नहीं लगती.

चूंकि लायन सफ़ारी मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया जाता है, इसलिए शेरों के मरने पर दोनों ख़ासे चिंतित भी थे. मुलायम सिंह यादव तो सार्वजनिक रूप से और संसद में भी इसे व्यक्त कर चुके हैं.

वहीं अखिलेश यादव ने शेरों के मरने के कारणों की जांच और उनके इलाज के लिए अमरीका और ब्रिटेन से भी विशेषज्ञ बुलाए. इसके लिए पिछले दिनों ब्रिटेन की लॉगलीट सफ़ारी के जाने-माने विशेषज्ञ डॉक्टर जोनाथन क्रैकनेल को ख़ासतौर पर बुलाया गया था. ब्रिटेन के विशेषज्ञों ने लायन सफ़ारी आ कर यहां के शेरों के अलावा कर्मचारियों और अधिकारियों को भी प्रशिक्षित किया है.

जिस कैनाइन डिस्टैंपर बीमारी से ज़्यादातर शेरों की मौत हुई है, वो कुत्तों में भी पाई जाती है. शेरों को इस बीमारी से बचाने के लिए अमरीका से वैक्सीन मंगाई गई और शेरों के अलावा तमाम कुत्तों को भी ये वैक्सीन दी गई ताकि वो शेरों में बीमारी न फैला दें.

बताया जाता है कि इटावा के इस इलाक़े में कभी शीशम के पेड़ों के घने जंगल हुआ करते थे, लेकिन कथित जंगल माफ़िया के चलते अब यहां शीशम के पेड़ ढूंढने पर भी नहीं मिलते.

दिनेश शाक्य बताते हैं कि जिस जगह पर लायन सफ़ारी बनाया जा रहा है वो कभी अंग्रेज़ अफ़सरों की शिकारगाह हुआ करता था. इटावा और उसके आस-पास के कथित संभ्रांत लोग इन अफ़सरों के साथ यहां शिकार करते थे और यहीं मांस पकाकर खाते थे. बाद में यही बीहड़ डकैतों की पनाहगाह बन गए तो उन्हें भागने से रोकने के लिए यहां बबूल के पेड़ लगा दिए गए.

जानकारों का कहना है कि ये बबूल के पेड़ ही आज शेरों को जीवित रहने लायक़ उपयुक्त माहौल मिलने में दिक़्क़त कर रहे हैं. हालांकि वन विभाग इन बबूल के पेड़ों की जगह छायादार पेड़ लगाने पर तेज़ी से काम कर रहा है.

विशेषज्ञों के अलावा लायन सफ़ारी के लिए राज्य सरकार पर राजनीतिक रूप से भी कई आरोप लगे हैं. शेरों के मरने के बाद विपक्षी दलों की ओर से अक्सर ऐसी प्रतिक्रियाएं आई हैं कि सरकार नक़ली लायन सफ़ारी बनाने की ज़िद पर अड़ी है और लुप्तप्राय शेरों को मार रही है. लेकिन लायन सफ़ारी के अधिकारी इस बात से सहमत नहीं हैं.

जहां तक शेरों का सवाल है तो वन्य जीव विभाग के अधिकारी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शेरों को नए वातावरण में ढलने में दिक़्क़त आ रही है. यही नहीं, जानकार ये भी कहते हैं कि गुजरात से लंबा सफ़र तय करके आने के बाद थकान से भी शेर बीमारी के शिकार हो जाते हैं.

इसीलिए राज्य सरकार के निर्देश पर लायन सफ़ारी में शेरों का मन बहलाने के लिए तमाम तरह के इंतज़ाम किए जा रहे हैं. यही नहीं, शेर के बच्चों का जन्म होने के बाद उनकी ख़ास देखभाल के लिए भी करोड़ों रुपए ख़र्च करके नया सेंटर बनाया गया है.

बहरहाल, इटावा लायन सफ़ारी को सरकार ने भी लायन सफ़ारी पार्क में तब्दील कर दिया है और अब शेरों के अलावा हिरण, चीतल जैसे जानवरों को भी यहां रखा जाएगा. लेकिन जहां तक शेरों का सवाल है तो फ़िलहाल यहां चार मादा और तीन नर शेर हैं.

कुछ दिन पहले ही दो शावक और पैदा हुए हैं, जिससे अधिकारी काफ़ी उत्साहित हैं और उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में लोग लायन सफ़ारी देखने के लिए इटावा आएंगे और उन्हें शेरों की दहाड़ भी सुनने के मिलेगी.

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