केदारनाथ: भक्ति कम विवाद ज़्यादा

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Image caption आयोजनों को लेकर विवादों में छाया केदारनाथ

हिंदुओं के सबसे पवित्र धर्मस्थलों और उत्तराखंड के चार धामों में से एक केदारनाथ पिछले कुछ समय से विवादों की भूमि बनता जा रहा है.

पहला विवाद नवरात्र की अष्टमी, 9 अक्टूबर को केदारपुरी में लोकप्रिय गायक कैलाश खेर के भजनों से शुरू हुआ. कैलाश खेर की दिल मोह लेने वाली आवाज़ पर कार्यक्रम में मौजूद लोगों के साथ मुख्यमंत्री हरीश रावत भी झूमते दिखाई दिए.

लेकिन उनकी ख़ुशी तब काफ़ूर हो गई जब एक आरटीआई जानकारी वायरल होने लगी जिसके अनुसार कैलाश को इस कार्यक्रम के लिए करीब 3 करोड़ 66 लाख रुपये के भुगतान की बात कही गई .

इस पैसे का भुगतान ज़िला आपदा प्रबंधन कार्यालय द्वारा किया गया है. रुद्रप्रयाग के ज़िला आपदा प्रबंधन अधिकारी के अनुसार शासन से मिले आदेश के अनुसार यह भुगतान किया गया.

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बीजेपी इसे लेकर हमलावर हो गई और कहा कि राज्य सरकार को आपदा पीड़ितों को राहत देने की चिंता नहीं, पर्यटकों को लुभाने का शौक है.

मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार सुरेंद्र कुमार अग्रवाल ने सरकार के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा कि राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार पर्यटन है और उसे बढ़ाने के लिए किए जाने वाले फ़ैसलों पर उंगली नहीं उठाई जानी चाहिए.

उन्होंने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा कि गुजरात में प्रचार के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च करने वाले और गंगा किनारे हीरोइन से सांसद बनी अदाकारा के नृत्य पर करोड़ों बहाने वाली पार्टी को इस मुद्दे पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है.

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Image caption केदारनाथ-त्रियुगीनारायण ट्रैकिंग रूट पर मिले नरकंकाल

ये मुद्दा शांत भी नहीं हुआ था कि केदारनाथ-त्रियुगीनारायण ट्रैकिंग रूट से हटकर कुछ नरकंकाल मिलने से सनसनी फैल गई. दरअसल केदारनाथ की ट्रैकिंग पर निकले कुछ ट्रैकर रास्ता भटक गए तो उन्हें ये नरकंकाल दिखे.

माना जा रहा है कि ये 2013 की बाढ़ की आपदा में मारे गए लोगों के ही नरकंकाल हैं. इसके बाद सरकार तुरंत हरकत में आई और गढ़वाल के पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंज्याल इन नरकंकालों को बरामद करने और उनकी अंत्येष्टि करने के लिए 15 अक्टूबर को घटनास्थल पर पहुंच गए.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बताया कि पुलिस मुख्य ट्रैकिंग रूटों से हटकर अन्य स्थानों पर मानव अवशेषों की खोज के लिए एक हफ़्ते तक खोजबीन अभियान चलाएगी.

पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंज्याल ने ये भी बताया कि रुद्रप्रयाग के एसएसपी प्रह्लाद सिंह मीणा और उनके नेतृत्व वाले दो खोजबीन दलों को कुल 31 नरकंकाल मिले जिनका डीएनए सैंपल लेकर उनका मौके पर ही धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कर दिया गया.

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Image caption नरकंकालों का पुलिस ने किया अंतिम संस्कार

इस पर भी राजनीति शुरू हो गई और बीजेपी ने फिर सरकार पर कंकालों पर उत्सव करने का आरोप लगाया.

पिछले हफ़्ते भर में केदारनाथ में पैदा हुआ तीसरा विवाद पूरी तरह धार्मिक था. दशहरे के दिन केदारघाटी में पहली बार रावण का पुतला फूंका गया.

इससे पहले केदार घाटी ही नहीं रुद्रप्रयाग ज़िले में भी रावण का पुतला नहीं फूंका जाता था क्योंकि रावण को शिव का भक्त माना जाता है और कहा जाता है कि शिव के सामने उनके अनन्य भक्त को फूंकना ग़लत है.

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Image caption केदारनाथ में पहली बार फूंका गया रावण का पुतला

केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी शिवशंकर ने कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है और यह आयोजन भी मंदिर से डेढ़-दो किलोमीटर दूर जीएमवीएन के बेस कैंप में हुआ क्योंकि मंदिर के पुजारियों और तीर्थ-पुरोहितों ने इसका विरोध किया.

वो कहते हैं कि रावण दहन का मतलब बुराइयों और अहंकार का दहन होता है, उसे व्यक्ति विशेष पर केंद्रित करना ग़लत है.

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शिवशंकर यह भी कहते हैं कि रावण न सिर्फ़ महापंडित था बल्कि बड़ा शिवभक्त था और शिव पुराण में कहा गया है कि जो मेरे भक्तों का अनिष्ट करेगा मैं उसको सज़ा दूंगा.

लेकिन केदारनाथ में दशहरे में रावण पुतला दहन के आयोजन में शामिल रहे केदार सभा के पूर्व अध्यक्ष किशन बग्वादी इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मामला बताते हैं. वह कहते हैं कि अगले साल से अन्नकूट मेला, भैरव पूजा, नवदुर्गा पूजा और रावण पुतला दहन को भव्य रूप से मनाया जाएगा.

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