ब्रिक्स : रूस, चीन से उम्मीदें ज़्यादा थीं भारत को ?

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Image caption ब्रिक्स सम्मलेन के दौरान नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के साथ

गोवा में हुए 'ब्रिक्स' शिखर सम्मेलन को लेकर ऐसी हवा भारत में बनी जैसे इस सम्मलेन में शामिल देश पाकिस्तान को एक स्वर में अलग थलग करने की बात करेंगे.

मगर सम्मलेन के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इससे मिला क्या ?

हालांकि ऐसी हवा को बनाने का ठीकरा मीडिया के सर ही फोड़ने की कोशिश की गयी मगर विदेश मामलों पर नज़र रखने वाले इसे भारत की कूटनीतिक चूक के रूप में भी देख रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान और नेपाल में भारत के राजदूत रह चुके राकेश सूद मानते हैं कि भारत के लिए 'ब्रिक्स' सम्मलेन से हासिल वो सब कुछ नहीं हुआ जिसकी लोग उम्मीद किये बैठे थे.

वो कहते हैं: "भारत में इस सम्मलेन को लेकर उम्मीदें बहुत ज़्यादा थीं. इस लिए लोग चर्चा भी कर रहे हैं."

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Image caption ब्रिक्स सम्मलेन के उद्घाटन समारोह का दृश्य

राकेश सूद कहते हैं कि कूटनीतिक हलकों में इस सम्मलेन का नतीजा भी पहले से मालूम था. "इतनी 'हाइप' की गयी मगर पहले ही मालूम था कि नतीजा कुछ ख़ास निकलकर नहीं आने वाला है."

ब्रिक्स सम्मलेन के समापन भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ज़ोर देते हुए कहा था कि ब्रिक्स के सभी सदस्य इस बात पर सहमत हैं कि 'आतंकवाद का पोषण करने वाले, पनाह देने वाले, समर्थन और प्रायोजित करने वाले हमारे लिए उतने ही खतरनाक हैं जैसे आतंकवादी.'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के सदस्यों से आतंकवाद से निपटने के लिए निर्णायक कार्रवाई का आह्वान करते हुए पाकिस्तान को 'आतंकवाद की जननी' करार दिया था.

उम्मीद की जाने लगी थी कि सम्मलेन के समापन पर जारी किए जाने वाले साझा बयान में प्रधानमंत्री मोदी की उम्मीदों की झलक मिलेगी. मगर ऐसा नहीं हुआ.

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Image caption 'गोवा डिक्लेरेशन' में संयुक्त राष्ट्र द्वारा सूचीबद्ध किए गए उन तमाम चरमपंथी संगठनों की चर्चा की गई जिनसे चीन और रूस को ख़तरा है.

इस साझा बयान में न तो उड़ी हमलों के बारे में कुछ कहा गया और न ही 'पोषण', 'पनाह', 'समर्थन' और 'प्रायोजित' जैसे शब्द ही साझा 'गोवा डेक्लेरेशन' का हिस्सा बने.

साझे बयान में कहा गया है कि "आतंकवाद के वित्त पोषण के स्रोतों जैसे मादक पदार्थ की तस्करी, आपराधिक गतिविधियों जैसे संगठित अपराधों, आतंकवादी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के साथ ही आतंकवादी इकाइयों द्वारा सोशल मीडिया सहित इंटरनेट के दुरुपयोग पर बल दिया जाए. आतंकवाद से सफलतापूर्वक निपटने के लिए एक समग्र रुख की आवश्यकता है. आतंकवाद के खिलाफ कदमों में अंतरराष्ट्रीय क़ानून बरक़रार रखा जाना और मानवाधिकारों का सम्मान.''

इसी को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में बहस छिड़ी हुई है.

विपक्षी कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि ब्रिक्स के साझा बयान में पकिस्तान से संचालित चरमपंथी संगठनों का नाम तक नहीं लिया जाना 'दुर्भाग्यपूर्ण' है.

हालांकि विदेश मंत्रालय के सचिव अमर सिन्हा ने सम्मलेन के बाद स्पष्ट करते हुए कहा कि 'सिर्फ आतंकवाद' ही 'ब्रिक्स' का एजेंडा नहीं था.

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उन्होंने कहा कि आपसी व्यापार, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा और काले धन पर भी सम्मलेन के दौरान व्यापक चर्चा हुई.

लेकिन जानकारों को लगता है कि ब्रिक्स और बिम्सटेक के बहाने पकिस्तान को अलग-थलग करने की उम्मीदें खुद भारत सरकार ने जगाईं. उनका कहना है कि सम्मलेन से पहले और उसके दौरान दिए गए बयानों ने एक माहौल बना दिया था.

अक्टूबर 16 की सुबह जब इस सम्मलेन की शुरुआत हुई तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरुप ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हवाले से कहा 'भारत का एक पड़ोसी आतंकवाद की जननी' है.

सम्मलेन के दौरान विदेश मंत्रालय के बयानों से ऐसा समझ में आने लगा कि ब्रिक्स के देशों के बीच बातचीत का मुख्य केंद्र चरमपंथ ही है.

दो दिनों तक चले ब्रिक्स और बिम्सटेक सम्मलेन के दौरान प्रधानमंत्री ने भाषण में पाँच बार 'सीमापार आतंकवाद' की चर्चा की.

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Image caption ब्रिक्स और बिम्सटेक के बहाने पकिस्तान को अलग-थलग करने की उम्मीदें खुद भारत सरकार ने जगाईं

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में पत्रकार प्रवीण स्वामी लिखते हैं कि 'गोवा डिक्लेरेशन' में संयुक्त राष्ट्र द्वारा सूचीबद्ध किए गए उन तमाम चरमपंथी संगठनों की चर्चा की गई जिनसे चीन और रूस को ख़तरा है.

मगर भारत पर हमला करते रहने वाले संगठनों की कोई चर्चा नहीं हुई.

चीन ने तो भारत की एनएसजी की सदस्यता को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट नहीं किया. जबकि सम्मलेन से ठीक पहले रूस के साथ हुए कई रक्षा समझौतों से उम्मीद की जा रही थी कि वो तो कम से कम भारत से सरोकारों को समझेगा.

विदेश मंत्रालय में सचिव रह चुके आर एस काल्हा कहते हैं कि उम्मीदें पालना अलग बात है. कूटनीति और विदेश नीति अपनी तरह से चलते हैं. उनका कहना है कि साझा बयान सर्वसम्मति से ही बनाया जाता है.

इसलिए इसकी भाषा को लेकर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

वो कहते हैं: "द्विपक्षीय वार्ता और बहुपक्षीय वार्ता में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है. द्विपक्षीय वार्ता के दौरान चीन का लहजा अलग था. मगर लहजा वैसा भी नहीं था जैसा भारत चाहता था. उसी तरह रूस भी है. उसके लिए पाकिस्तान से भी सम्बन्ध महत्वपूर्ण हैं और भारत के साथ भी. इस लिए कूटनीतिक रूप से वो तटस्थ रहने की कोशिश करता है जबकि रक्षा को लेकर रूस के साथ भारत के बहुत पुराने और गहरे सम्बन्ध हैं. "

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