उत्तराधिकार की जंग में अखिलेश की 'अग्निपरीक्षा'

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समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव के करीबी किरणमय नंदा सोमवार को जिस वक्त ये जानकारी दे रहे थे कि मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार होंगे, तकरीबन उसी वक्त अखिलेश सरकार के कद्दावर मंत्री और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान बीबीसी से बातचीत में मुख्यमंत्री पद की ताकत का बयान कर रहे थे.

आज़म खान के मुताबिक, "बहुत बड़ा होता है मुख्यमंत्री का कद, पद, उसका वकार वो हिंदुस्तान का दूसरा वज़ीर ए आजम होता है."

लेकिन, उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी का बीते चार साल का इतिहास कुछ और ही कहता है. समाजवादी पार्टी के अंदर से ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कद, पद और वक़ार को चुनौती देने की कोशिशें एक दो बार नहीं बल्कि बार-बार हुई हैं.

पार्टी के अंदर उत्तराधिकार को लेकर शुरु हुई जंग में भी अखिलेश के हिस्से कामयाबी कम और नाकामी ज्यादा आई हैं.

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अखिलेश के विरोध के बाद भी कौमी एकता दल को समाजवादी पार्टी में जगह मिली. उनसे प्रदेश अध्यक्ष का पद लेकर वर्चस्व की लड़ाई में उन्हें चुनौती दे रहे शिवपाल यादव को दे दिया गया. बलराम यादव और गायत्री प्रजापति जैसे हटाए गए मंत्रियों को दोबारा मंत्रिमंडल में जगह देनी पड़ी.

स्थिति यहां तक आ गई कि मुलायम सिंह यादव ने ये बयान भी दे दिया कि मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कौन होगा इसका फैसला पार्टी पार्लियामेंट्री बोर्ड करेगा.

लेकिन, इस बार तीन दिन के अंदर ही पार्टी को अपना रूख बदलना पड़ा. पार्टी को कहना पड़ा कि अखिलेश ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे.

स्थिति में आए इस बदलाव को लेकर 'हिंदुस्तान' अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार केके उपाध्याय कहते हैं, "अखिलेश यादव इनकी मजबूरी हैं. अखिलेश यादव पर कोई दाग धब्बा नहीं है. परिवार के इस झगडे में अखिलेश के लिए सहानुभूति बनी है. मुलायम सिंह ने जो कहा उसका फीडबैक अच्छा नहीं आया. तत्काल रामगोपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव को एक पत्र लिखा. वो बात भी कर सकते थे. लेकिन पत्र जनता में संदेश देने के लिए लिखा."

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लेकिन क्या पार्टी के आला बड़े नेताओं रूख सिर्फ जनता के बीच गए संदेश को ठीक करने के लिए बदला है. राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि इसकी बड़ी वजह अखिलेश की रणनीतियां भी हैं. परिवार की जंग में कई झटके खाने के बाद भी सरेंडर करने को तैयार नहीं हुए. वो लगातार संकेत देते रहे कि अगर उन्हें दरकिनार किया गया तो वो अपना अलग रास्ता चुन सकते हैं.

दशहरे के ठीक एक दिन पहले जब अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के सर्जिकल स्ट्राइक पर दिए गए बयान का बचाव किया तो राजनीतिक पंडितों ने इसे उनके और राहुल गांधी के बीच गठजोड़ की संभावना के तौर पर देखा.

इसके बाद अखिलेश ने अकेले चुनाव प्रचार शुरू करने का बयान देकर परिवार के वरिष्ठ लोगों को संदेश दिया कि वो पीछे मुड़ने को तैयार नहीं. अखिलेश यादव ऐसी ज़िद साल 2012 में विवादित नेता डीपी यादव की समाजवादी पार्टी में एंट्री रोकने के लिए भी दिखा चुके हैं.

लेकिन, क्या परिवार के अंदर जारी वर्चस्व के मुक़ाबले के दौरान अखिलेश ने कड़े तेवर दिखाने में देरी कर दी?

उत्तर प्रदेश की राजनीति पर करीबी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "समस्या ये हुई कि अखिलेश ने डीपी यादव का विरोध करने में जो तेवर दिखाए थे वो इन साढ़े चार सालों में मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं दिखा सके. नतीजा ये हुआ कि उनकी स्थिति कमजोर होती गई और विरोधी लॉबी हावी होती गई. आखिर के छह महीने में उनको समझ में आया कि सब कुछ हाथ से निकला जा रहा है तब उन्हें जोश आया."

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शरद प्रधान कहते हैं कि स्थिति ये हो गई कि मुख्यमंत्री न तो मंत्री और न ही ब्यूरोक्रेट नियुक्त कर सकते हैं. वो मुलायम सिंह और अखिलेश के बीच भी कथित 'दीवार' का भी जिक्र करते हैं.

शरद प्रधान कहते हैं, "अखिलेश जो अपने पिता के साथ रहते थे निकलकर अलग आ गए. दोनों के घर पास-पास हैं लेकिन अलग हैं."

मुलायम का झुकाव भले ही विरोधियों की तरफ दिखता हो लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी की अब भी अखिलेश यादव के पास है. शिवपाल यादव से लोक निर्माण विभाग वापस लेकर और दीपक सिंघल को चीफ सेक्रेट्री के पद से हटाकर 'परिवार' को उसकी ताकत भी दिखा चुके हैं. ऊपरी तौर पर ही सही लेकिन कुनबे को एक साथ दिखाने में कहीं न कहीं ये ताकत भी भूमिका निभा रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी आकलन है कि रामगोपाल यादव जैसे अखिलेश समर्थक भी पार्टी को याद दिलाते हैं कि अखिलेश को किनारे करने का बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता है.

शरद प्रधान कहते हैं, "सीनियर नेता ये भूल रहे हैं कि पिछले चुनाव में अखिलेश की वजह से जितना वोट मिला वो पहले कभी नहीं मिला. अखिलेश ने उम्मीद जगाई कि समाजवादी पार्टी की साख सुधर जाएगी. युवा अखिलेश के साथ बहुत ज़ोरों से आया. "

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पार्टी में एकजुटता की कोशिश में लगे नेताओं को भी लगता है कि उम्मीदें दरकीं हैं लेकिन बिखरी नहीं हैं.

आज़म खान भी कहते हैं, "हम खुशगुमान लोग हैं. हम मायूस ज़िंदगी गुजारने के हक में नहीं हैं. हमने साढे चार साल बहुत अच्छी सरकार चलाई है. बहुत विकास का काम हुआ है. हम चाहते हैं कि ये आगे बढ़े. मैं इतना जानता हूं कि ये बिखरेगा नहीं मामला. "

तो क्या अखिलेश का चेहरा आगे करने के बाद परिवार की कलह थम गई है. इस सवाल के जवाब में केके उपाध्याय कहते हैं, "अभी तो ये चुनाव में जा रहे हैं. 5 नवंबर को समाजवादी पार्टी के 25 साल पूरे होने जा रहे हैं उसमें पूरा परिवार एकजुटता दिखाने की कोशिश करेगा. फिलहाल डेमैज कंट्रोल की कोशिश की जा रही है. "

शरद प्रधान भी कहते हैं कि चुनाव तक पार्टी में बिखराव की संभावना कम है लेकिन उत्तराधिकार की लड़ाई में बढ़त बनाने के लिए अखिलेश यादव को दम दिखाना होगा.

शरद प्रधान कहते हैं, "राजनीति में तो हारने के बाद जीतने का बूता होना चाहिए . अभी तो उन्हें मुख्यमंत्री का पद तश्तरी में मिल गया था. अब उन्हें मेहनत करके लीडरशिप बनानी पड़ेगी ."

वो कहते हैं कि उत्तराधिकार की लड़ाई में अगर आपने ये नहीं साबित किया कि आप नेता हैं तो आपका भविष्य नहीं है.

तो क्या पार्टी से खुद को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कराते हुए अखिलेश ने भविष्य की तरफ पहला मजबूत कदम बढ़ा दिया है?

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