विदेश से फ़ोन पर तीन तलाक़, मुफ़्ती की मंज़ूरी

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फ़ोन पर तीन तलाक़, उठे कई सवाल

मुज़फ़्फरनगर के एक गांव में एक औरत का कहना है कि सऊदी अरब गए उसके पति ने फ़ोन पर तीन तलाक़ दे दिया.

ये आम घटना तब ख़ास हो गई जब औरत के गांव के लोगों ने इस तरह दिए गए तलाक़ पर सवाल उठाए और बड़ा विवाद खड़ा हो गया.

उत्तर प्रदेश में मुज़फ्फ़रनगर के इस मुस्लिम बहुल इलाके से मर्दों का नौकरी के लिए मध्य-पूर्व जाना आम बात है.

हाल के दिनों में अनेक स्थानीय लोग शिकायत कर रहे हैं कि मध्य-पूर्व गए कई पुरुषों के फ़ोन पर तलाक़ देने के मामले सामने आ रहे हैं.

बीबीसी ने जिस मामले की पड़ताल की उसमें पाया कि शायद पहली बार ऐसा हुआ कि फ़ोन पर दिए जाने वाले तलाक़ को स्थानीय लोगों ने चुनौती दी है.

Image caption गांववालों के बीच तीन तलाक़ की पीड़िता को समर्थन देने पर सहमति.

लेकिन ये चुनौती तीन तलाक़ को नहीं, तलाक दिए जाने के तरीके पर है.

महत्वपूर्ण है कि कॉमन सिविल कोड लागू करने की कोशिश के तहत, हाल में भारत के विधि आयोग ने एक प्रश्नावली जारी की है जिसमें तीन तलाक सहित कई और मुद्दों पर समाज से सवाल पूछे गए हैं.

मुसलमानों का कई मामलों में प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक की वैधता पर उठ रहे सवालों का विरोध किया है. वहीं कई सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिक नेताओं ने इस पर अपने-अपने विचार रखें हैं.

इस तरह तीन तलाक के मुद्दे पर भारत में बड़ी बहस हो रही है.

Image caption अस्मा कहती हैं कि शौहर चाहे भी तो अब वो उसके पास नहीं जाना चाहती.

बीबीसी ने फ़ोन पर दिए तीन तलाक के ताज़ा मामले की पड़ताल में पाया कि बीस साल की अस्मा की पास के गांव में रहनेवाले शाहनवाज़ हुसैन से दो साल पहले शादी हुई थी.

एक साल पहले दोनों को एक बेटी हुई. अस्मा के मुताबिक तभी सब कुछ बदल गया.

आंसू पोंछते हुए अस्मा ने आरोप लगाया, "उन्हें बेटा चाहिए था, पर बेटी हुई तो बहुत परेशान करने लगे, मारपीट भी करते थे, कभी हाथों, कभी लातों से तो कभी लकड़ी से."

अस्मा के मुताबिक अचानक डेढ़ महीना पहले, उसे बिना बताए, उसके पति सऊदी अरब चले गए और वहां से फ़ोन किया और तीन बार तलाक़ कह दिया.

उनका कहना है कि दो साल की शादी एक झटके में टूट गई. लेकिन पास के गांव में रहने वाला अस्मा के पति का परिवार हर आरोप को ग़लत बताता है.

Image caption शाहनवाज़ हुसैन के परिवार के मुताबिक अब वो उसके संपर्क में नहीं हैं.

उनके मुताबिक तलाक़ की वजह मारपीट नहीं, मियां-बीवी के बीच की अनबन है.

अस्मा के जेठ, मोहम्मद शाह नज़र के मुताबिक बातें छिपाने के लिए झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं.

Image caption मुज़फ़्फ़र नगर के नियामू गांव से बहुत मर्द नौकरी के लिए मध्य-पूर्व जाते हैं.

फ़ोन पर तीन तलाक़ पर उनकी कोई राय नहीं है.

वो कहते हैं, "हम तो अनपढ़ हैं, हम क्या कहें, मौलवी और पढ़े-लिखे लोग बताएं कि ये सही है या नहीं."

Image caption मोहम्मद इरफ़ान जैसे गांव के बुज़ुर्ग अब एक बार में तीन तलाक़ दिए जाने का विरोध कर रहे हैं.

गांव में ये बहस वहां के सरपंच लियाक़त प्रधान ने छेड़ी है और आस्मा उनकी भांजी हैं.

सरपंच के सालों से चली आ रही पुरानी समझ पर सवाल उठाने के बाद गांववालों ने भी अपना रुख़ बदला है.

गांव के बुज़ुर्ग भी अब फ़ोन पर तलाक़ को औरत के साथ नाइंसाफ़ी बता रहे हैं.

गांव के एक बुज़ुर्ग मोहम्मद इरफ़ान ने ऐसे तलाक़ दिए जाने को बिरादरी में फैली एक बुराई तक़ करार दिया.

Image caption सरपंच लियाक़त प्रधान के ज़ोर देने पर गांववालों ने बदली पुरानी सोच.

उन्होंने कहा, "ऐसी घटनाओं को रोका नहीं गया तो ये बढ़ती जाएंगी और औरतों के लिए परेशानियां बढ़ेंगी."

उनके मुताबिक ऐसे कई मामले हैं जहां एक आदमी के अपनी पत्नी को फ़ोन पर तलाक़ देने के बाद भी दूसरे परिवार अपनी बेटी की शादी उससे कर देते हैं क्योंकि वो पैसेवाला है.

मोहम्मद इरफ़ान कहते हैं इससे ऐसे आदमियों को बढ़ावा मिलता है और इसे रोकना ज़रूरी है.

यहां तक कि गांववाले देवबंद के इस्लामी केंद्र तक चले गए, ये मालूम करने के लिए कि मारपीट के आरोपों के बीच फ़ोन पर इस तरह दिया गया तलाक़ जायज़ है भी या नहीं.

Image caption देवबंद ने अपने फ़तवे में कहा कि फ़ोन पर दिया ये तीन तलाक़ जायज़ है.

लेकिन देवबंद ने इसे जायज़ ठहराया.

ये समझना ज़रूरी है कि सुन्नी मत की चार शाखाओं में से एक, हनफ़ी मत है, जिसे देवबंद मानता है. बाक़ी तीनों सुन्नी शाख़ाएं एक बार में ज़बानी तौर पर तलाक देने को अब जायज़ नहीं मानती हैं.

भारत की अलग-अलग अदालतों ने भी कई मामलों में एक बार में दिए गए तीन तलाक को ग़लत करार दिया है.

लेकिन जब तक ये जानकारी गांव-गांव तक नहीं पहुंचती, मुसलमान औरतें अपने हक़ की लड़ाई कैसे लड़ेंगी?

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