भारत में ऊंचे पदों पर महिलाएं कम क्यों?

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की प्रमुख अरुंधति भट्टाचार्य

क्रेडिट स्विस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2015 में भारतीय कंपनियों में 11.2 फ़ीसद महिलाओं को बोर्ड का सदस्य बनाया गया, जो कि 2010 के मुक़ाबले दोगुना था.

भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक यानी स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की प्रमुख अरुंधति भट्टाचार्य ने इस बारे में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा, "हमें और कुछ साल तक इस नियम का सहारा लेना पड़ेगा, ताकि हमारी उम्मीदों के मुताबिक़ इसका असर हो सके".

साल 2013 के एक नियम के बाद यह ज़रूरी हो गया है कि सूचीबद्ध कंपनियों के बोर्ड में कम से कम एक महिला सदस्य ज़रूर हो, ताकि बोर्ड में महिलाओं और पुरुषों के अंतर को कम करने में मदद मिल सके.

क्रेडिट स्विस की एक रिपोर्ट में दुनियाभर की 2400 कंपनियों का विश्लेषण किया गया है. इसमें पाया गया है कि साल 2015 में भारतीय कंपनियों में 11.2 फ़ीसद महिलाओं को बोर्ड का सदस्य बनाया गया, जो कि 2010 के मुक़ाबले दोगुना था.

इस रिपोर्ट के मुताब़िक दुनियाभर में यह औसत 14.7 फ़ीसद का था. जिसमें नॉर्वे में सबसे ज़्यादा 46.7 फ़ीसद और उसके बाद फ़्रांस में 34 फ़ीसद महिलाओं को कंपनियों के बोर्ड में जगह दी गई.

भारत ने चीन और दक्षिण कोरिया के मुक़ाबले इसमें ज़्यादा कामयाबी हासिल की है. हालांकि वह अब भी दक्षिण एशिया के दूसरे कई देशों, जैसे थाइलैंड और मलेशिया से पीछे है.

महिलाओं को निदेशक बनाने से हक़ीक़त में कई फ़ायदे हुए हैं. अरुंधति मानती हैं कि जिन कंपनियों की निदेशक महिलाएं हैं, वो ज़्यादा बेहतर फ़ैसले ले सकती हैं, क्योंकि महिलाओं का दृष्टिकोण काफ़ी व्यापक होता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत में एचएसबीसी की पूर्व प्रमुख नैना लाल क़िदवई भी अरुंधति की बातों से इत्तेफ़ाक़ रखती हैं. नैना फ़िलहाल भारत में कई कंपनियों के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक हैं.

वो कहती हैं, "इस नए समीकरण से तालमेल बिठाने में हर किसी को थोड़ा वक़्त लगेगा, लेकिन मर्द इस बदलाव का स्वागत कर रहे हैं".

उन्होंने बताया, "कई महिला निदेशकों ने मुझसे कहा है कि यह आसान काम नहीं है, लेकिन वो इसका आनंद ले रही हैं. कई बार मर्द भी उनका बहुत उत्साह बढ़ाते हैं, जो कि एक अच्छा संकेत है".

अरुंधति भट्टाचार्य की तरह की नैना क़िदवई भी महसूस करती हैं कि कंपनियों को महिलाओं को महज़ एक ही निदेशक पद नहीं देना चाहिए.

वो कहती हैं, "नियम कहता है कि कम से कम एक महिला निदेशक हो, लेकिन इसके लिए आदर्श संख्या दो होगी. इससे महिलाओं को बोर्ड में ज़्यादा ताक़त मिलेगी".

भारत में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर हुए हालिया सुधारों को आगे बढ़ाने के पीछे हक़ीक़त यह भी है कि यहां ऊंचे पदों पर महिलाओं की तादाद बहुत ही कम थी.

इसके पीछे एक और वजह यह भी है कि पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों, जिनकी तादाद भारत में सबसे ज़्यादा है, उनमें मां, पत्नी और बेटी जैसी परिवार की महिला सदस्यों को निदेशक का पद दिया गया है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

मसलन भारत के सबसे धनी आदमी और रिलायंस ग्रुप के प्रमुख मुकेश अंबानी ने अपनी पत्नी नीता अंबानी को साल 2014 में कंपनी के बोर्ड में शामिल किया था. इसके अलावा रेमण्ड ग्रुप और गॉडफ़्रे फिलिप्स ने भी ऐसे क़दम उठाए हैं.

रिसर्च कंपनी प्राइम डाटा के एमडी प्रणव हल्दिया कहते हैं, "कई कंपनियों ने ऐसा केवल नए नियम की वजह से किया है".

उनके मुताब़िक, "परिवार से संबंध रखने वाली महिला निदेशक के पास बोर्ड में कोई ताक़त नहीं होती है. कुछ मामलों में कंपनियों ने स्वतंत्र महिला निदेशकों को नियुक्त कर रखा है. हो सकता है कि ऐसी महिला परिवार से ताल्लुक़ नहीं रखती हों, लेकिन उनका मालिक के साथ अच्छा संबंध होता है".

नैना क़िदवई इस बात को लेकर बहुत चिंतित नहीं दिखती हैं. उनका मानना है कि भारत का पुरुष प्रधान सोच वाला समाज, ख़ानदानी बिज़नेस में महिलाओं को महत्व नहीं देता है.

वो कहती हैं कि बोर्ड में महिलाओं को शामिल करने से उनके पास भी एक मौक़ा होता है. महिलाएं साबित कर सकती हैं कि अपने पति और भाइयों की तरह वो भी कंपनी को चला सकती हैं.

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

नैना कहती हैं, "यह बहुत आम बात है कि बेटा ही परिवार के बिज़नेस को आगे बढ़ाएगा, लेकिन अब परिवार की बेटी को अपनी क़ाबिलियत दिखाने का मौक़ा मिलेगा. भविष्य में कारोबार के उत्तराधिकार की योजना पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है".

हालांकि बोर्ड में महिलाओं को शामिल करने के मुद्दे पर भारत ने विकास किया है, लेकिन प्रबंधन में ऊंचे पदों पर महिलाओं की तादाद से भारत का यह विकास मेल नहीं खाता है.

क्रेडिट स्विस के अध्ययन के मुताबिक़, हक़ीक़त तो यह है कि ऊंचे पदों पर बैठी महिलाओं की संख्या कम हो गई है. यह आंकड़ा साल 2014 में 7.8 फ़ीसद था, जो कि साल 2016 में 7.2 हो गया.

दुनियाभर में ऊंचे पदों पर औसतन 13.8 फ़ीसद महिलाएं मौजूद हैं.

अरुंधति भट्टाचार्य कहती हैं कि इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि कई महिलाएं घर की ज़िम्मेदारियों के लिए बीच में ही नौकरी छोड़ देती हैं.

इमेज कॉपीरइट DRAGON IMAGES

वो कहती हैं, "भारत में आज भी परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी के मामले में महिलाओं की ओर ही देखा जाता है. अगर परिवार में किसी को देखभाल की ज़रूरत हो तो उम्मीद की जाती है कि इसके लिए महिलाएं ही अपने करियर का बलिदान करेंगी".

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के मुताब़िक, साल 2005 से 2014 के बीच भारत में कामकाजी उम्र की महिलाओं के नौकरी करने में 10 फ़ीसद की गिरावट आई है. इस दौरान यह गिरावट दुनिया के सभी देशों में सबसे ज़्यादा थी.

हालांकि कुछेक कंपनियों ने घर की ज़िम्मेदारी निभाने के साथ ही नौकरी को जारी रखने के लिए महिलाओं के काम के समय को लचीला बनाया है, फिर भी कई बार ज़्यादातर महिलाओं के सामने एक मुश्किल विकल्प होता है कि वो करियर या परिवार की ज़िम्मेदारियों में से किसी एक को चुनें.

नैना किदवई कहती हैं, "महिलाएं इस तरह के फ़ैसले लेने में मर्दों के मुक़ाबले ज़्यादा अपराधबोध महसूस करती हैं. इसके लिए उन्हें घर में ज़्यादा सहारे की ज़रूरत है".

भारत में क़रीब एक करोड़ लोग हर साल नौकरी के बाज़ार में आ रहे हैं और उनमें क़रीब आधी महिलाएं होती हैं.

मर्द जब तक घर की ज़्यादा ज़िम्मेदारी नहीं लेंगे, भारत का एक आर्थिक शक्ति बनने सपना शायद पूरा नहीं हो पाएगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)