स्टालिन बने करुणानिधि के सियासी वारिस

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डीएमके प्रमुख मुथुवेल करुणानिधि ने अपने बेटे एम.के. स्टालिन को सियासी वारिस घोषित किया है.

करुणानिधि ने साथ ही स्पष्ट किया कि इसका ये मतलब नहीं है वे खुद सन्यास ले रहे हैं. ये घोषणा पार्टी कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश है कि पार्टी का उत्तराधिकारी मौजूद है.

करुणानिधि राजनीति में वक्त की नज़ाकत पहचानने और गूढ़ संदेश देने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपने फ़ैसले से स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी विपरीत परिस्थिति को संभालने में डीएमके की स्थिति एआईडीएमके से कहीं बेहतर है.

मुख्यमंत्री जे. जयललिता अस्पताल में भर्ती हैं तो डीएमके के पास कोई कारगर नेतृत्व नहीं है जो राज्य को संभाल सके.

राजनीतिक विशलेषक के.एन. अरुण ने बीबीसी को बताया, "वे स्पष्ट कर रहे हैं कि डीएमके के पास ठोस नेतृत्व है और उन्हें ये भी लगता है कि अगर मुख्यमंत्री जयललिता जल्द ठीक होकर अपनी ज़िम्मेदारियों को नहीं संभालती हैं तो एआईडीएमके में उथल-पुथल मच जाएगा".

एक अन्य राजनीतिक जानकार रामसुब्रमणी का कहना है, "उनके एलान नए नहीं हैं. उन्होंने ऐसा ही एक बयान जनवरी 2013 में दिया था. लेकिन इस बार मौक़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि जयललिता राजनीतिक रूप से कमज़ोर हैं".

इस घोषणा के समय के कई अन्य कारण भी हैं.

92 साल के करुणानिधि ने पैगाम दिया है कि वे अब भी डटे हुए हैं. उनके नहीं रहने पर ही स्टालिन पार्टी की कमान पूरे तौर पर संभालेंगे. इसका मतलब है कि वे स्टालिन के समर्थकों के दबाव के आगे नहीं झुके.

अरुण कहते हैं, "पिछले विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी संगठन के भीतर ऐसा दबाव था कि वे अपने उत्तराधिकारी के रूप में स्टालिन के नाम का एलान करें".

रामसुब्रमणी कहते हैं, "जैसा सबको पता है विधानसभा चुनावों के बाद स्टालिन पार्टी में ताक़तवर हुए हैं. परिवार में भी स्टालिन का कद बढ़ा है".

करुणानिधि की घोषणा से ये भी साफ़ हो गया है कि एम.के. अलागिरी की पार्टी में पकड़ नहीं बना पाए.

अलागिरी और स्टालिन लंबे समय से उत्तराधिकारी घोषित करने की मांग कर रहे थे. एक वक़्त ऐसा था जब अलागिरी पार्टी की दक्षिणी राज्य इकाई को संभालते थे.

लेकिन जिस तरह से स्टालिन ने पार्टी संगठन पर पकड़ बनाई और इसे संभाला और जनसंपर्क के कार्यक्रम चलाए वो उन्हें उनके भाई के साथ-साथ दूसरों से भी अलग बनता है.

दूसरे नेता सिर्फ़ जनसभाओं को संबोधित किया करते थे और लोगों से बात करने से परहेज़ करते थे, इसके उलट स्टालिन सड़क किनारे पानी के नल पर भी लोगों से मिलते-जुलते थे जिससे वे लोकप्रिय हुए.

स्टालिन ने बड़े स्तर पर पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया और डीएमके ने 89 सीटों पर जीत हासिल की.

ज़ाहिर तौर पर तमिलनाडु में मतदाता राज्य में सरकार चलाने के लिए इन्हीं दो पार्टियों में से एक को चुनते हैं, डीएमके या फिर एआईडीएमके.

जब वे ऐसा करते हैं तो दूसरी पार्टी सत्ता से बेदखल हो जाती है. कई बार तो विधानसभा में उनके सीटों की संख्या एक अंक तक सिमट जाती है.

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