'कट्टर लोगों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सकते हम'

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इमिली ज़ोला एक शानदार शख़्स थे और उतने ही महान लेखक. 1898 के उनके लिखे 'जे एक्यूज' जिसमें उन्होंने फ्रांसीसी सत्ता प्रतिष्ठान की यहूदी विरोध भावना का संकेत दिया था, को पत्रकारिता में मिसाल के तौर देखा जाता है.

मैं एक पत्रकार हूं लेकिन न तो मैं ज़ोला जितना निपुण हूं और ना ही साहसी. मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के बारे में संकेत देने के लिए बहुत कुछ है लेकिन मैं इसे दूसरे साहसी पुरुष-महिलाओं पर छोड़ता हूं. ज़ोला ने जहां लिखा था - आई एक्यूज (मैं आरोप लगाता हूं), मैं इसे आई कंफेस(मैं ग़लती स्वीकार करता हूं) लिखता हूं.

शुक्रवार की सुबह तक मैं उन सरकार समर्थक टीवी एंकरों और अभिनेताओं से नाराज़ था जो पूरे बॉलीवुड को धमका दे रहे थे कि वे लोग पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम करना बंद कर दें. मुंबई में गुंडे मवाली जब ये कह रहे थे कि वे पाकिस्तानी अभिनेताओं वाली किसी फ़िल्म के प्रदर्शन की इजाजत नहीं देंगे, तो मैं चिंतित हुआ.

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मुंबई फ़िल्म फेस्टिवल में जब 1959 में बनी पाकिस्तानी क्लासिक फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लग गई, तो मुझे यह नीचतापूर्ण लगा. मैं तब उदास हुआ जब मेरे कॉलेज मेयो कॉलेज ने लाहौर के एटिकसन कॉलेज के साथ दोस्ताना क्रिकेट मैच को रद्द कर दिया. भारतीय लोगों की दिमाग की इन संकीर्णताओं से देश की सीमा की सुरक्षा कैसे हो पाएगी, ये सवाल मुझे अचरज में डाल रहा था.

लेकिन जब मैंने देश के सूचना एवं प्रसारण मंत्री का बयान पढ़ा तो मुझे अपनी सोच में खामी दिखी. वैंकया नायडू ने कहा, "ये कहना बहुत आसान है कि कला की कोई सीमा नहीं होती, लेकिन देशों की सीमाएं तो होती है. मैं ये नहीं कहता कि आप किसी का बॉयकॉट करें लेकिन लोगों की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए. जब युद्ध चल रहा हो तो तब उस देश का कोई आदमी आपके यहां नाटक फ़िल्म करे, इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती."

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मेरे जैसे लोगों से क्या उम्मीद होनी चाहिए, इस पर वैंकेया जी की सलाह और मौजूदा समय में राष्ट्रवादी भावनाओं को देखते हुए मैं ने अपनी पूरी स्वीकारोक्ति को जाहिर करने का फ़ैसला लिया.

मैं ग़लती स्वीकार करता हूं कि पहली बार किसी पाकिस्तानी से लंदन में 1982 में मिला था. वह मेरे साथ कॉलेज में था, हम आपस में कई चीज़ों पर लड़ते झगड़ते और बहस करते थे, ख़ासकर विभाजन और कश्मीर के मुद्दे पर. मैं ये भी स्वीकार करता हूं कि हम बेहतरीन दोस्त थे. उसके बेटे की शादी अगले साल होने वाली है और मैं उसमें हिस्सा लेने के लिए उस देश जाने की सोच रहा हूं.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स में पढ़ने के दौरान मैं कई अन्य पाकिस्तानियों से मिला और वे सब भी अच्छे दोस्त बन गए.

मैं ये ग़लती स्वीकार करता हूं कि मैं उनके कई जोक्स पर हंसता था, उनमें कुछ गंवार और देहाती किस्म के जोक्स भी होते थे.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि मैंने गंभीर विषयों पर हिंदी-उर्दू में बहस करना भी पाकिस्तान दोस्तों के साथ की गई बहसों से सीखा.

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मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि 1983 में मैंने एक धार्मिक प्रवृति वाले पाकिस्तानी को वह खाने से रोका था, जिसे हराम माना जाता है. उसने लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स की कैंटीन में ख़ाना सर्व करने वाली से पूछा था- क्या ये सूअर का मांस है, तो उसने प्लेट में खाना डालते हुए कहा था- नहीं प्यारे, ये केवल सॉसेज (कबाब) है.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि मैं ने एक धार्मिक पाकिस्तानी को पहली बार ड्रिंक्स लेने में मदद की थी.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि 1986 में लंदन की गलियों में मैं पाकिस्तानी कवि अहमद फराज़ से मिला था, उनसे बात की. मैं ये भी मानता हूं कि मैं उनसे मिलकर अभिभूत हो गया था.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि 1983 में एक पाकिस्तानी दोस्त के हॉस्टल रूम में जब पहली बार कैसेट पर फैज़ अहमद फैज़ की कर्कश आवाज़ सुनी तो मुझे उनसे प्यार हो गया. इसके बाद मैंने भारत में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनकी किताबों को तलाशा और जब मुझे अर्थशास्त्र पढ़ना था, तब मैं घंटों उनकी कविताएं पढ़ता और सुनता था.

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मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि हाल ही में उस हिंदी विद्वान से मिला जिन्होंने फैज़ के सारे सुखन हमारे का उर्दू से देवनागरी में अनुवाद किया. मैं ये भी मानता हूं कि मैंने बिना सोचे समझे एक व्हाट्सएप वीडियो दोस्तों से शेयर किया. 'बहुत देर कर देता हूं मैं' जैसी बेहतरीन कविता के कवि को मैं पहचान नहीं पाया लेकिन वे पाकिस्तान के मुनीर नियाज़ी निकले. ये 'सर्जिकल स्ट्राइक्स' के तुरंत बाद हुआ था.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि 1983 में लंदन में अंडर ग्रेजुएट का छात्र होने के दौरान मैं एक पाकिस्तानी दोस्त के घर खाना खाने गया, जहां मैं बेनज़ीर भुट्टो से मिला. वह उस समय वहां निर्वासित थीं. मैं ये भी स्वीकार करता हूं कि मैंन शराब के नशे में उनसे उनका नाम पूछ लिया था, वह इससे ख़ुश नहीं हुई थीं.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि उर्दू लिपि के बारे में मैंने बच्चों की किताब क़ायदा से सीख हासिल की थी- ये किताब मुझे एक पाकिस्तानी दोस्त ने 1984 में दी थी. मैंने एक दूसरे दोस्त को 1986 में देवनागरी लिपि सीखने में मदद की, वह एक भारतीय युवती के प्रेम में पड़ गया था.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि मैंने अख़्तर चानाल और कोमल रिज़वी का गाया बलूचिस्तानी लोकगीत ट्विटर पर शेयर किया था. मैंने ये काम प्रधानमंत्री मोदी के बलूचिस्तानी और भारतीय लोकगीत को एक जैसा बताने से पहले किया था.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि पाकिस्तानी छात्रों के साथ मिलकर लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स में दक्षिण एशियाई फोरम बनाया. 1985 में हमने भारतीय और पाकिस्तानी लोगों के लिए एक सांस्कृतिक आयोजन किया था, जिसमें शहीद भगत सिंह को सेलिब्रेट किया गया था.

Image caption लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स की फ़ाइल तस्वीर

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि कई पाकिस्तानी दोस्तों से संपर्क में हूं, ज़्यादातर कॉलेज के दिनों के दोस्त हैं. मैं अपने एक दोस्त के निधन पर कराची में शोक बैठक में शामिल हुआ था. पाकिस्तान से आए चरमपंथियों द्वारा पठानकोट पर किए हमले के बाद अप्रैल, 2016 में मैं एक दोस्त की शादी में शामिल होने भी वहां गया था.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि मेरी मां मोहनजोदड़ो की यात्रा कर चुकी हैं, वहां उनका अच्छा समय बीता था. मैं ये भी मानता हूं कि दिल्ली या मुंबई का जिमखाना क्लब के मुकाबले कराची का सिंध क्लब शानदार और बेहतर है.

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मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि कराची में मेरे दोस्त के पिता, जो प्रतिष्ठित भी थे, ने 1997 में अपनी चिंतित पत्नी से कहा था कि सिद्धार्थ के जांग में हीर के पवित्र स्थान पर जाने में कोई समस्या नहीं है. यह इलाका चरमपंथी समूह लश्करे झांगवी का गढ़ है. उन्होंने कहा था, "उन्हें शियाओं से समस्या है, सिद्धार्थ हिंदू है." तब मुझे हंसी आई थी.

मुझे तब भी हंसी आई थी, जब कराची के एक दोस्त ने मुझे संदेश भेजा था कि 'सर्जिकल स्ट्राइक' के बारे में पहली बार किसी से सुनने पर उसने यही सोचा कि लियाकत मेडिकल कॉलेज के सर्जन काम क्यों रोक रहे हैं? मुझे उसके संदेश पर भी हंसी आई थी.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि 1990 में जब दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति थी, तब न्यूयार्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में मैंने भारत-पाकिस्तान दोस्ताना कंसर्ट आयोजित कराने में मदद की थी, उस कंसर्ट में मरहूम उस्ताद सलामत अली ख़ान के साथ भारत के दो संगीतकारों ने हिस्सा लिया था. मैं भारतीय संगीतकारों के नाम नहीं लेना चाहता हूं वरना उनके आयोजन को बाधित किया जा सकता है.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि कॉलेज के एक पाकिस्तानी दोस्त को जब कैंसर होने की ख़बर मिली तो 2015 में मैं एक तिहाई दुनिया की हवाई उड़ान करके उससे मिलने पहुंचा ताकि, उसे थोड़ी ख़ुशी मिले.

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मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि मैं उसके और कुछ अन्य पाकिस्तानी दोस्तों के साथ लंदन में पाकिस्तानी दूतावास के सामने सबीन महमूद की हत्या के बाद विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ था. उसके बाद स्थानीय पब में बैठकर हमने अपने दुख बांटे थे.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि कराची का मेरा एक पाकिस्तानी दोस्त 2014 में दिल्ली में मेरे पिता के गुजरने के बाद आयोजित अंतिम प्रार्थना में मेरे भाई, बहन और मेरे साथ ही बैठा था. वह हिंदू भी नहीं था.

मैं ये भी ग़लती स्वीकार करता हूं कि जब अंतिम बार मैं अपने पाकिस्तानी दोस्तों से मिला था, तब हमने अपने देश के कट्टरपंथियों की आलोचना की थी, उन्होंने अपने देश के. हम लोग इस बात पर भी सहमत थे कि कट्टर लोगों के ख़िलाफ़ कुछ भी करने में असक्षम हैं.

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