'ये बेटी को लेकर समाज का दोहरा चरित्र है'

दिल्ली के एम्स अस्पताल का एक इन्क्यूबेटर आजकल एक नवजात बच्ची का घर बना हुआ है.

इस बच्ची को 19 अक्टूबर की सुबह पुलिस एम्स के ट्रॉमा सेंटर लेकर आई थी.

जब मैं उसके डॉक्टर जीवा शंकर के साथ एम्स के उसके कमरे में पहुंची तो वह जाग रही थी और उसने अपनी आंखें मुझ पर टिका दीं.

बच्ची की बाईं कलाई में लगा बैंड बताता है कि ये एक 'अज्ञात बच्ची' है.

शिशुरोग विशेषज्ञ जीवा शंकर कहते हैं, "ये हमारी बच्ची है".

बच्ची को देखकर मैंने कहा, 'यह मुमकिन ही नहीं है कि इससे प्यार न हो जाए, ये बहुत खूबसूरत है'.

मेरी इस बात पर हेड नर्स वीना बाहरी हंस पड़ीं और कहने लगीं कि हर कोई यही कहता है.

जिस वक़्त हम लोग वहां खड़े-खड़े बातें कर रहे थे, बच्ची ने रोना शुरू कर दिया.

उसे भूख लग रही है. एक नर्स उसे सहलाते हुए उठाती है. उसे एक बोतल से दूध पिलाती है और बच्ची फ़ौरन ही रोना बंद कर देती है. बिस्तर पर लेटते ही वो अपनी मुट्ठी बंद कर लेती है और अंगुलियां चूसने लगती है.

कुछ ही मिनट बाद वो उबासी लेने लगती है. डॉक्टर जीवा शंकर कहते हैं कि अब ये सोने जा रही है.

एम्स के इस कमरे में जहां बाक़ी सभी बच्चों को उनके मां-बाप का प्यार मिल रहा है, यह बच्ची यहां अकेली पड़ी है.

वो इस दुनिया में 'अनचाही' आई है और उसका भविष्य भी अनिश्चित है.

पुलिस अधिकारी सोमनाथ पारुथी ने बीबीसी को बताया, "हमें रात एक बजे के बाद एक अज्ञात फोन आया और बताया गया कि दक्षिणी दिल्ली के मुनिरका इलाक़े की सड़क पर एक बच्ची पड़ी है".

जब पुलिस घटना स्थल पर पहुंची तो उन्हें एक प्लास्टिक बैग में पड़ी यह नवजात बच्ची मिली. उसके बदन पर कोई कपड़ा नहीं था, वो ठंड से अकड़ गई थी और रो रही थी.

एक महिला पुलिसकर्मी ने उसे कपड़ों से ढंका और फिर पुलिसवाले अस्पताल की ओर भाग पड़े.

एम्स के नवजात शिशु विभाग के प्रमुख डॉक्टर विनोद कुमार पॉल ने बताया, "जब उसे यहां लाया गया था तो वो ठंड से थोड़ी अकड़ गई थी और उसका ब्लड शुगर कम था."

बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट से पता चलता है कि अब वो पूरी तरह से स्वस्थ है. उसके शरीर पर किसी बाहरी चोट का निशान नहीं है.

डॉक्टर पॉल ने बताया, "हमने उसे सभी ज़रूरी टीके लगाए हैं और क्योंकि हमें इसकी मेडिकल हिस्ट्री पता नहीं है, इसलिए हम संक्रमण या जन्म से जुड़ी बीमारी की कुछ और जांच कर रहे हैं."

डॉ. पॉल कहते हैं, "बच्ची ठीक है, वो खुश है, वो ठीक से दूध पी रही है और मुस्कुराती भी है. अगले कुछ दिनों में जब सभी जांच के रिज़ल्ट आ जाएंगे तो अस्पताल की तरफ से उसे डिस्चार्ज के लिए फ़िट घोषित कर दिया जाएगा."

उसके बाद बच्ची को राज्य सरकार की एक चाइल्ड वेल्फ़ेयर कमेटी के सामने पेश किया जाएगा जो उसे एक अधिकृत वेल्फ़ेयर होम को सौंप देगी.

कमेटी पुलिस को भी यह आदेश देगी कि वो एक तय समय-सीमा में बच्ची के माता-पिता का पता लगाए और अगर उनका कोई पता नहीं चलता है तो यह बच्ची गोद लेने के लिए उपलब्ध होगी.

पुलिस अधिकारी पारुथी ने बताया, "जब से इस बच्ची की कहानी अख़बारों में आई है, मेरे पास कम से कम दो दर्ज़न फोन आए हैं और लोगों ने बच्ची को गोद लेने की इच्छा जताई है या फिर उसकी मदद के लिए पैसे भेजे हैं."

पुलिस ने बच्ची के अज्ञात माता-पिता के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कर लिया है और उन्हें तलाशने की कोशिश की जा रही है.

उन्होंने बताया कि हम इलाक़े के मैटरनिटी होम से 'बेटियों' के जन्म की जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं.

पुलिस अधिकारी पारुथी का मानना है, "यह बेटी को छोड़ देने का मामला लगता है, हो सकता है कि उसके मां-बाप की और बेटियां होंगी और वो एक और बेटी नहीं चाहते होंगे."

पूरे भारत में बेटियों के मुक़ाबले बेटे की ज़्यादा इच्छा देखी जाती है. लोग मानते हैं कि बेटा ही ख़ानदान के नाम को आगे बढ़ाएगा और वो बुढ़ापे में मां-बाप का सहारा बनेगा. जबकि बेटी के लिए उन्हें दहेज़ देना पड़ेगा और फिर वह अपने ससुराल चली जाएगी.

बेटियों को लेकर इसी भेदभाव की वजह से भारत में बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण हत्या और नवजात बेटियों की हत्या होती है जिसकी वजह से भारत में लिंग अनुपात का संतुलन बुरी तरह से बिगड़ गया है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ भारत में एक हज़ार लड़कों के मुक़ाबले 927 लड़कियों का जन्म होता है, जबकि इसी साल जारी किए गए नए आंकड़े के मुताबिक़ यह तादाद 918 तक गिर गई है.

बेटियों को बचाने के लिए आंदोलन करने वाले इसे एक तरह का 'संहार' कहते हैं. उनका कहना है कि भारत में हाल के बरसों में लाखों की तादाद में कन्या भ्रूण हत्या हुई है.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे राष्ट्रीय शर्म बताया था और बेटियों को बचाने के लिए धर्मयुद्ध छेड़ने की बात कही थी. उनके फौरन बाद 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से बेटियों की हत्या रोकने की अपील की थी.

उसके बाद से मोदी कई बार इस बात को दोहरा चुके हैं और उन्होंने बेटियों के लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना भी शुरू की.

हालांकि उनके संदेशों का बहुत ही कम असर देखने को मिल रहा है.

पारुथी गुस्से में कहते हैं, "हाल ही में जब एक महिला ने ओलंपिक मेडल जीता तो लोगों ने खुशी मनाई और अब हमें सड़क पर मरने के लिए छोड़ी गई एक बच्ची मिलती है. हम ऐसे दोहरे चरित्र के लोग हैं".

उन्होंने बताया कि पुलिस ने इस बच्ची का नाम 'स्वधा' रखा है, जिसका मतलब है ईश्वर की सौगात.

डॉ. पॉल का कहना है कि हर साल क़रीब चार से छह त्यागी गई बच्चियां एम्स लाई जाती हैं.

मैंने उनसे पूछा कि जब ऐसा होता है तो क्या आपको तकलीफ़ होती है?

उनका जवाब था, "हां होती है. ऐसा नहीं होना चाहिए. एक बच्चे को ऐसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए. लेकिन यही भगवान की मर्जी है और हमें अपना काम करना है. यह पुण्य का भी काम है. उसे मरने के लिए छोड़ दिया गया था और अब उसे दूसरी ज़िंदगी मिली है."

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