मुलायम 'अकबर' के सामने 'सलीम' अखिलेश?

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समाजवादी पार्टी में हालात कुछ मुग़लिया सल्तनत के उस दौर जैसे हैं जब अकबर हिन्दुस्तान के शहंशाह हुआ करते थे और सलीम को ख़ुद की पहचान के लिए बग़ावत करनी पड़ी थी.

राजनीतिक विश्लेषक समाजवादी पार्टी की बैठक के दौरान अखिलेश यादव के तेवर में बग़ावत की बू पाते हैं.

बैठक के दौरान पार्टी सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव द्वारा पुत्र को सार्वजनिक फटकार, और अखिलेश यादव की चाचा शिवपाल यादव से हुई नोक झोंक से समझ साफ है कि समाजवादी पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषक प्रमोद जोशी कहते हैं कि अखिलेश यादव का राजनीतिक भविष्य उनकी बग़ावत में ही है.

प्रमोद जोशी कहते हैं, "अखिलेश यादव की बग़ावत उसी तरह की है जैसी शहज़ादे सलीम ने अकबर के ख़िलाफ़ की थी. अगर वो झुक जाते हैं तो उनका राजनीतिक भविष्य ख़त्म हो जाएगा."

सूबे की राजनीति पर नज़र रखने वालों को लगता है कि जिन बिंदुओं को लेकर अखिलेश ने विरोध के स्वर बुलंद किये हैं वो उनके पक्ष में जा रहे हैं.

उनको लगता है कि अमर सिंह और मुख़्तार अंसारी का विरोध करने से युवाओं और आम लोगों के बीच अखिलेश की छवि बेहतर हुई है.

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Image caption अखिलेश यादव

प्रमोद जोशी को लगता है कि अखिलेश का आधार ज़्यादा मज़बूत नज़र आ रहा है, ज़्यादातर विधायक और मंत्री उनके साथ दिख रहे हैं.

मगर कुछ जानकारों को लगता है कि अखिलेश के ख़ेमे में मज़बूत नेता नहीं हैं और वैसे ज़्यादातर लोग शिवपाल यादव के साथ ही दिख रहे हैं. मुलायम भी शिवपाल का ही समर्थन कर रहे हैं.

हालांकि रामगोपाल यादव अखिलेश के साथ खरे दिख रहे हैं लेकिन वो समर्थन उतना मायने नहीं रखता है.

अखिलेश के पीछे उनकी सांसद पत्नी डिंपल और रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव ही नज़र आ रहे हैं जो फ़िरोज़ाबाद से सांसद हैं.

वहीं विश्लेषकों का कहना है कि शिवपाल यादव को अखिलेश यादव की सौतेली माँ साधना गुप्ता और सौतेले भाई प्रतीक का समर्थन हासिल है.

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Image caption शिवपाल यादव को मुलायम सिंह का सर्मथन हासिल है

समाजवादी पार्टी के हलक़ों में चर्चा है कि साधना पुत्र प्रतीक को मुलायम का उत्तराधिकारी बनाना चाहती हैं, जबकि अखिलेश खुद को मुलायम का उत्तारधिकारी मानते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश मानते हैं कि सारी कटुता के बावजूद मुलायम और अखिलेश ने एक दुसरे के लिए अभी भी जगह रखी हुई है.

हालांकि वो कहते हैं कि मुलायम ने शिवपाल और अखिलेश को गले मिलवाकर जिस कटुता को दूर करवाने की कोशिश की है, उससे पार्टी के अंदरूनी हालात बेहतर होने वाले नहीं हैं क्योंकि अमर सिंह के सवाल पर मुलायम और शिवपाल एक ही पायदान पर हैं.

उर्मिलेश कहते हैं, "अगर समाजवादी पार्टी के अंदरूनी हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले विधानसभा के चुनावों में उन्हें नुक़सान का भी सामना करना पड़ सकता है. मगर दूसरी ओर एक बड़ा फ़ैकटर ये भी है: अगर मुलायम के कहने पर अखिलेश सबको साथ लेकर चलते हैं तो राजनीतिक रूप से वो हाशिये पर चले जाएंगे. इसलिए अगर अखिलेश को अपना राजनीतिक भविष्य बचाना है तो रास्ता एक ही है - बग़ावत."

हालांकि शिवपाल के गुट का कहना है कि पुरे मामले में मुलायम शाहजहां हैं जबकि अखिलेश औरंगज़ेब.